मीना ऊँ

हे मानव ! ज्ञान सीप में छुपा मोती बीनना सीख। जीवन सिर्फ जीकर ही बिता देना नहीं है जीवंत हो जीना है। ज्ञान मार्ग है उस महानतम सत्य सच्चिदानंद, सत् चित् आनन्दस्वरूप को पाने का जो न खुशी है न गम न दुख न सुख न ही अहम या त्वम एक अलौकिक दिव्य अनुभूति सब कुछ जान समझ लेने की, न प्रश्न, न जिज्ञासा, न संशय, न उत्सुकता, बस प्रफुल्लता ही प्रफुल्लता। परा चेतना से
आगे पढ़ें
घनेरे बादल छू रहे तन को अतुल प्रेम से भरते मन को अंक में बादलों के यह शरीर नश्वर ठंडी-ठंडी सीली-सीली अनुभूति मधुर चारों ओर पेड़ ही पेड़ पौधे ही पौधे झूमती लताएँ औ’ रंगीन फूलों के बूटे दिखते दूर-दूर जहाँ तक दृष्टि समाए मीना जीव के चारों ओर घेरा-सा बनाए नि:शब्द समर्पण में रहे भीग पर्वत महायोगी आँखें मींच मेरा अस्तित्व इस सम्पूर्णता का हृदय जैसा साक्षी केवल नश्वर शरीर का स्पंदन शाश्वत प्रकृति
आगे पढ़ें
मानव मन की संकीर्णता व बुद्धि की क्रूरता न जीने दे न मरने दे न खुद को न किसी और को पर जिसके साथ कृष्ण चेतना का हाथ वो क्यों करे प्रतिकार क्योंकि वही नकारात्मकता वही आतंकवाद वही तो बनता उत्थान का आधार प्रभु तेरा आभार देता सदा वृश्चिक दंश दर्द की उठा लहरें बढ़ा देता रक्त संचार जो खोल देता गाँठें मन की अनेक औ’ देता बुद्धि विस्तार बुद्धि विस्तार अपार जितना आतंक होता
आगे पढ़ें
उड़ चल मीन मना उड़ जाएगा हंस अकेला हे मन मनमोहन अब कहीं और ले चल हो गये भारी-भारी से कुछ कठिन-कठिन से पल कितना पुकारा ओ मानव अब तो संभल… संभल पर बस मैं ही मैं का राग मेरा ये ठीक हो जाए मेरा वो ठीक हो जाए कुछ भी ऐसा हो जाए जिससे मुझे बस मुझे ही मुझे कैसे भी चैन व आराम मिल जाए सारा जीवन सुखी हो जाए यही हाहाकार सब
आगे पढ़ें
खूब देख रही हूँ दुनिया का खेला झूठ का मेला अहम् का झमेला कैसे कैसे खेल देखे मीना का मन अकेला कैसे-कैसे खेल देखे मीना का मन अकेला यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
आगे पढ़ें
युगों का खेला देखूँ मायावी मेला सत्य भाव संकल्प बन जाते सत्य भाव संकल्प बन जाते समय रथ कालचक्र पहिए ध्यान की रास विचार घोड़े सत्य की ओर ही तो दौड़े जहाँ पहुँची हूँ जहाँ पहुँचा है मेरा मन वहाँ से तो केवल दृष्टा बन बस देखना ही होता है हर पल की होनी के प्रति पूर्ण चैतन्य सदा चैतन्य सत् चित् आनन्द का मूर्तरूप धरे ऊर्जा की उर्मियाँ ज्ञान की रश्मियाँ भृकुटि की प्रत्यंचा
आगे पढ़ें
एक ऐसे संवेदनशील हृदय की जो सबसे नि:स्वार्थ प्रेम करे ऐसे सुंदर हाथों की जो सबकी श्रद्धा से सेवा करें ऐसे सशक्त पदों की जो सब तक प्रसन्नता से पहुँचें ऐसे खुले मन की जो सब प्राणियों को सत्यता से अपनाए ऐसी मुक्त आत्मा की जो आनन्द से सबमें लीन हो जाए यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
आगे पढ़ें
जो दिखे नहीं फिर भी दीखे पाँचों तत्वों से पाँचों इन्द्रियों से झलके सृष्टि की हर छटा से वो प्यारा-प्यारा मधुर-मधुर अहसास जिसके आगे होते सारे के सारे अहसास फीके-फीके से जो न टिके न रुके न झुके कहीं भी पर बन स्मरणीय स्मृति की नाद गूँजे घट भीतर भिगोता गात सींचता प्रेम-वर्षा से आत्मवृक्ष कभी भी न रीते संसारी मायावी जीवन जीते-जीते भागदौड़ में न जाने कब हो जाते नयन भीगे-भीगे तो जान जाना
आगे पढ़ें
हुई अवतीर्ण एक मनु धरती पर खिली प्रकृति की मानसपुत्री-सी प्रकृति की इच्छास्वरूप मूर्तमान रूप आप ही अपने को जाना-माना देखा-परखा समझा-बूझा और कस-कस कर जीवन को कसौटी पर तत्पर हुई माना मार्ग चलाने को चल पड़ी अकेले ही अकेले सत्य की राह बनाने को होने लगे रूपांतरित इस आभामंडल से संसारी कर्मों के आकार-प्राकार अज्ञान की घोर अँधेरी रातों में प्रकृति के शाश्वत नियम स्थापन सत्यदीप प्रज्वलन को संकल्पित हुई धरा पर ओ मानव
आगे पढ़ें
मीना जाने और माने मानव में अपनी क्षमताओं से भी परे जाने की क्षमता है सारी शक्तियाँ हैं मीना ने देखा एक प्रफुल्लतापूर्ण प्रफुल्लित आनन्दमय प्रभु परमेश्वर बुद्धि और उसके आकर्षण से परे परे ही परे आत्मा का वैभव आत्मा का ऐश्वर्य न भय न असमर्थता न छोटेपन का भाव सब कुछ कर पाने की समर्थता का आनन्द सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशमय करने को तैयार एक युगातीत भारत सम्पूर्ण वेदमय-मेरा भारत यही सत्य है यहीं
आगे पढ़ें