मीना ॐ
हम स्वयं उत्तरदायी हमारे साथ होने वाली प्रत्येक घटना सुघटना या दुर्घटना के हम स्वयं ही उत्तरदायी हैं। हमारे शत्रु या मित्र हमारे अन्दर ही तो हैं। जो कुछ हम मनसा वाचा कर्मणा करेंगे उसी का फल हमें मिलता है। सब कुछ वापस घूमकर वार करता है। बाहर से कुछ नहीं होता, किसी के करने से कुछ नहीं होता। किस्मत को दोष देना या किसी और को दोष देना, अपने किए का उत्तरदायित्व ना लेना है। अपने पर काम न करने का बहाना है। अपना सच देखने का प्रयत्न न करने का आलस्य है। अपने अंदर झांकने से बचने का ही बहाना है। यह सच नहीं जानता कि जितना जल्दी झांक लेगा उतना ही शीघ्र सत्य से साक्षात्कार कर लेगा। जय सत्येश्वर प्रणाम मीना ऊँ
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280-150-2
प्रणाम एक अभियान है जिसका कार्य प्रकृति के नियम सत्य प्रेम व प्रकाश को, निरंतर उन्‍नत होती हुई युग चेतना की आत्मानुभूति के द्वारा, स्थापित करना है। प्रणाम का उद्देश्य है पूर्ण रूपांतरण-धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक। जो कि प्रकृति के अविनाशी सत्य पर आधारित है।

दोस्तों द्वारा संपन्न रूपांतरण

120-120-2
मीना ॐ
जो बाँटता फिरता है जमाने को उजाले उसके दामन में लेकिन अँधेरा भी बहुत है क्या कमी की मेरे कृष्ण ने विश्व को उजागर करने में सत्य का आधार देने में अनन्त प्रकाश से प्रकाशित करने में मगर किसने देखा किसने जाना उनके दामन उनके मन का अँधेरा घना अँधेरा मैं जानूँ मैं समझूँ मैं भोगूँ उस दिल का घना अँधेरा जो लाए सवेरा यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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मीना ॐ
शोक का कारण क्या है? न जानना ही अज्ञानता हैइसका अनुभव स्वयं से ही होता है।अपने आपसे प्राप्त दुख-कष्टï सब तपस्या के ही रूप हैं।समबुद्धि दुख-सुख में सम संतुलन समबुद्धि-समबुद्धि को सिद्ध करने से जन्म-मरण भय से मुक्ति!! एक निश्चय वाली बुद्धि ही प्रभु प्राप्ति का मार्ग आसक्ति से उत्पन्न अनन्त बुद्धि वाली बुद्धि एक निश्चय वाली बुद्धि हो जाए। इसके लिए :- सकाम कर्मों से रहित राग द्वंद्वों से रहित परमात्मा तत्व
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मीना ॐ
हे मानव ! कहां ढूंढ़ता है तू स्वर्ग। बड़ी प्रबल है तेरी स्वर्ग की इच्छा चाहे मर के मिले बस पाना ही है। तेरे काल्पनिक स्वर्गसम जीवन से अपेक्षाओं की कमी नहीं। एक दिवास्वप्न जैसी भ्रमित करने वाली मृगमरीचिका। अरे प्रभु ने तुझे वह सब क्षमताएं प्रदान की हैं जिससे तू अपने व अपने सम्पर्क में आने वाले सभी जीवों के लिए स्वर्गसम वातावरण उत्पन्न कर सकता है। अपना स्वर्ग आप बना सकता
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मीना ॐ
स्मृति अनंत सागर स्मरण की बना मथनी बुद्धि की बना काल का चक्र घुमा पाया अनमोल रत्न ज्ञान का मानव विधान का अवचेतन मन की परतें हटाकर ही उस प्रकाश या नूर के दर्शन होते हैं जो सब में व्याप्त है और एकत्व जगाने का तत्व है। मानव की प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया जिसका वो कारण नहीं जान पाता वो सब अवचेतन मन से ही संचालित होती है। ध्यान योग को प्राप्त मानव इस सारी
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दिशा निर्देश चाहिए. क्या आप दोराहे पर हैं, किस रास्ते पर चलना है मालूम नहीं, भ्रमित परेशान व दुविधा में हैं। हम सब जानते हैं कि ऐसे में उन्नत गुरुओं की विवेकपूर्ण परामर्श वस्तुस्थिति को बदल सकती है। उनकी शिक्षाएं, जो हमें जानना आवश्यक है उसे दर्शा व बता सकती हैं। हो सकता है वह सब वो ना हो जो हम सुनना चाहते हैं।

कहा जाता है कि आध्यात्मिक गुरुओं की शिक्षाएं उनकी आत्मिक शक्ति से ओत प्रोत होती हैं। खुले मस्तिक से स्वीकार कर ईमानदारी से धारण करने पर अशांत मन को धीरज और शान्ति प्रदान करती हैं और उत्तरोत्तर आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है।

यहां हम मीना जी की कही बातों का संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं।

मार्ग दर्शन कैसे प्राप्त करें।

एकांत स्थल में शांति से बैठें। गहरी श्वासें लें। अपने में स्थित हों। अब अपने प्रश्न पर ध्यान लगाएं। एक छोटी सी प्रार्थना “परम चेतना मेरा मार्ग दर्शन करो' के साथ नीचे का बटन दबा दें।

मीना जी का दर्शन आपके साथ होगा। आपको अपना उत्तर प्राप्त होगा।

कार्यक्रम

100-130-2

प्रणाम सकारात्मकता

वाट्सअप आधारित कम समय का कोर्स

तीन स्तरों 1. 2. 3. पर है

प्रत्येक स्तर प्रगतिशील ध्यान, चैतन्यता व सचेतनता की ओर ले जाता है।

इस कार्यक्रम की विशिष्टता

प्रणाम के दैनिक सत्र सामूहिक प्रार्थना हेतु

मीना जी द्वारा लिखित-
सामूहिक प्रार्थना में महान शक्ति होती है

जब इसको एक दिशा दी जाए तो यह शक्ति सामूहिक रूपान्तरण के सूत्रपात में प्रयुक्त हो सकती है।

प्रणाम सबको पुकारता है कि 10 बजे रात्रि सब संयुक्त होकर मानवता की भलाई और सत्य धर्म की पुनर्स्थापना हेतु प्रार्थना करें।

प्रकाशन

90-139

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