मीना ऊँ

ओ प्रभु मुझे दृढ़ता साहस व शक्ति दो सद्विचारों व सत्य दूरदर्शिता को कर्म में बदलने की एक ऐसी अद्भुत क्षमता दो जो जड़-चेतन सबमें एकाकार हो समस्त सृष्टि में लीन हो जाए जो सब मानव-मस्तिष्कों का भाव एक कर सत्य पे्रम व प्रकाश द्वारा शान्ति और आनन्द के प्रसार का सर्वत्र जन अभियान चला दे यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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झूला जरा धीरे से झुलाओ ओ सांवरिया प्रभो तुम ही तो भेजते हो जगह-जगह क्यों कृष्ण क्यों जगह-जगह फिराए तुम्हारा विरह जो भी काम कराने हैं जिनके भी कर्म धुलवाने हैं ज्ञानचक्षु खुलवाने हैं तुमने मेरे कदम वहीं पहुँचाने हैं क्यों चुन लिया मुझे ही यही तो बात है मीना के मुस्कुराने की अन्तर में दर्द छुपाने की दिल में अपार विरह ऊपर मनोहारी मुस्कान करे निसदिन तेरा गुणगान प्रभो न देना अभिमान मेरा तेरा
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आओ मिलकर करें सृजन जान लो सब आया संदेशा माई का जो सुनेंगे पाएँगे जीवन का दर्शन ज्ञान-ध्यान वेद विज्ञान सत्य प्रेम औ’ कर्म का महामंत्र जो देगा शक्ति अनन्त करने को स्थापित प्रकृति का सत्य मानव का कृत्य इस धरा पर सुखदां वरदां शस्य श्यामला वसुंधरा पर या किसी से कुछ सीखो या कुछ सिखाओ यही जीवन का ज्ञान है पाँच तत्व पूर्ण प्रणव प्रमाण प्रत्यक्ष प्रणाम यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम
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हे मानव! शब्द के सार से ही संचालित है समस्त संसार का व्यवहार, इसकी महिमा जानकर जीवन सुधार। एक-एक शब्द में संसार समाया है। एक भावपूर्ण प्रेममय शब्द में असीम शक्ति निहित है। आज विज्ञान भी शब्दों की ध्वनि व भाव से उत्पन्न कम्पन गति (वाइब्रेशन) का सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त होने को मान रहा है। हमारे वैज्ञानिक ऋषियों ने सदियों पहले इसी ऊर्जा का ध्यान द्वारा अनुभव कर मंत्रों की कुंजियाँ हमें प्रदान कीं।
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हे मानव! सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि जब पराशक्ति मानवों को अपने ही बनाए हुए चक्रव्यूहों से निकालकर किसी महान उद्देश्य की ओर इंगित व अग्रसर करने का सत् संकल्प किसी एक उन्नत मानव के अन्तर, अस्तित्व में प्रस्फुटित करती है तो भावानुसार वैसे ही कुछ मानवों को भी अवश्य ही तैयार कर लेती है जो स्वेच्छा से स्वत: ही उसमें योगदान को तत्पर होते हैं। जो परमबोधिनी शक्ति सत्य को अवतरित करती है
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मैं अपने सृजनहार की ओर अनुकम्पा के लिए मुड़ी मुझे प्रकृति में ही सांत्वना मिली और देखो तो प्रकृति ने मुझे सब कुछ दिया मेरी सारी भावनात्मक आवश्यकताओं को थपथपाया ऊर्जा दी सांसारिक कर्मों व दिव्य कृत्यों के लिए तृप्त किया मेरी ज्ञान पिपासा को भेदा मेरी दुविधाओं के बादलों को मिटा डाले सभी संशय और भ्रम इसी धरती पर मेरे अस्तित्व और ब्रह्माण्ड के रहस्यों के उत्तरित हुए प्रश्न सभी तब किया जाकर आलिंगन
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परमदाता परमेश्वर प्रभु सिर्फ देता ही देता है किसी को कुछ किसी को कुछ किसी को खुशी किसी को गम किसी को साथ किसी को अकेलापन किसी को धन किसी को मन किसी को आराम किसी को कर्म किसी को सेवा किसी को ज्ञान किसी को भक्ति किसी को मर्म जलवायु आकाश मिट्टी ताप विस्तार प्रसार वरदान शाप सुपात्र अनुरूप जीवन का अंत तभी तो उसके रूप अनंत यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम
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प्रणाम में भाव बीज बोया जाता है मन का मैल धोया जाता है आत्मा का बोझ हटाया जाता है जीवन जीवन्त हो जीया जाता है अपना आपा खोया जाता है राग-द्वेष संताप-क्लेश मिटा पुरुषार्थ को उद्यत हुआ जाता है अपना आपा खोया जाता है राग-द्वेष संताप-क्लेश मिटा सृष्टि से एकत्व जगाया जाता है यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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ओ मनमोहन शब्दों का चयन वाणी का संयम मन का भोलापन ही मोहता है मन सत्यं वदं प्रियं वदं हितं वदं यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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भाप उड़-उड़ मिलजुल बादल बनी भूरी-सफेद-सलेटी परियाँ बनी-ठनी भारी-भारी तरल जल हल्का होता बन बादल घुमड़े आकाश आकाश पवन झोंकों पर सवार गुनगुनाता गीत मल्हार टकराता कोई सुपात्र जब झूम-झूम बरसता तब मन भर-भर खिलखिलाता सब उँड़ेल हल्का हो जाता यही है चिरन्तन नियम प्रकृति का ज्ञान भरो उठो फिर हल्के हो जाओ सदा उन्मुक्त विचरण करना जहाँ-जहाँ नियति की हवा घुमाए मिले जब कोई सुजान निद्राजयी अर्जुन समान नि:स्वार्थ ज्ञान वर्षा प्रेषित करना तन-मन
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