मीना ऊँ

जब हमारा मन भ्रमण करता है तो हम मनुष्यों को मनोरंजन लगता है, दिवास्वनमनोरंजक हो सकता है… और कई बार हमें एहसास भी नहीं होता कि यह हो रहा है।और हम इसे बढ़ाते जाते हैं… “उसने यह कहा’, “मैं बदले में यह करूंगा’ और विचारघूमते रहते हैं, कभी छोड़कर नहीं जाते। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि मन एक बेचैनबंदर की तरह है जिसने शराब की सैकड़ों बोतलों का सेवन किया है और उसके ऊपरकई बिच्छुओं
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सभी में एक नकारात्मक धारा होती है जो उनसे मूर्खताएं करवाती है। इस अंधकारमय तत्व के प्रति सचेत रहें । चेतन प्रयास करें, इसे बाहर फेंकने के लिए साधना करें। अंधेरे तत्व से प्रभावित होकर आचरण ना करने के बारे में सोचना अपने अंतर से इसेजड़ समेत उखाड़ना नहीं है। बस अपने आप को ध्यान से देखें कि कभी-कभी आपकीभावनाओं और विचारों में बहुत उदारता होती है और किसी समय निरीक्षण करें कि दूसरों की
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