जब हमारा मन भ्रमण करता है तो हम मनुष्यों को मनोरंजन लगता है, दिवास्वनमनोरंजक हो सकता है… और कई बार हमें एहसास भी नहीं होता कि यह हो रहा है।और हम इसे बढ़ाते जाते हैं… “उसने यह कहा’, “मैं बदले में यह करूंगा’ और विचारघूमते रहते हैं, कभी छोड़कर नहीं जाते। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि मन एक बेचैनबंदर की तरह है जिसने शराब की सैकड़ों बोतलों का सेवन किया है और उसके ऊपरकई बिच्छुओं
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