मीना ऊँ
मूलरूप ज्ञान : वास्तविक ज्ञान जो ज्ञान ध्यान में प्राप्त होता है उसी का प्रसार ही मानव को उत्थान व ख्याति के उच्चतम स्तरों तक पहुंचाता है। मानव जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करता है। संसार से सीखा जाना अभ्यास किया गया ज्ञान व्यवसायिक दृष्टिकोण से अच्छा सिद्ध हो सकता है। परंतु मानव के आध्यात्मिक उत्थान के लिए या मानव को उत्कृष्टता प्रदान कर उत्थान की चरम सीमा तक ले जाने में उसकी उपयोगिता कम ही
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हे मानव ! इतने सारे बुद्धिमान मानव होते हुए भी विश्व विवेकहीन महामूर्खों की बस्ती बन कर रह गया है। एक ओर महामारी कोविड-19 कोरोना से लड़ने हेतु अंधाधुंध व्यय कर रहा है। सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त कर आधी-अधूरी व्यवस्थाएं कर रहा है। उनको बचाने हेतु जिनका कि शायद मानव समाज देश और विश्व हित में कोई भी योगदान न हो। दूसरी ओर अपरिमित धन व्यय कर रहा है युद्ध के लिए आयुधों पर उनको मारने
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सर्व मांगलिक प्रतीक स्वस्तिक प्रतीक अपने आप में पूर्ण भावानुभूति है। वैदिक संस्कृति आध्यात्म और वेद-विज्ञान का अनूठा सत्य है। प्रत्येक सम्प्रदायों मतों व धर्मानुयायियों ने प्रतीकों का महत्व समझा और अपनी अपनी प्रमाणिक पृष्ठिभूमि के अनुसार इनको प्रतिष्ठित किया है। परंतु भारतीय वेद संस्कृति के परम कल्याणकारी मंगलकारी शुभ व पवित्र स्वस्तिक समान शक्तिमान व दीप्तिमान कोई नहीं है। क्यों कि यह अविष्कृत नहीं है। वैदिक काल के ऋषि मुनी वैज्ञानिकों द्वारा सभी दिशाओं
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हे मानव ! तू बहुत चतुर व बुद्धिमान बनता है। अत्यधिक सुख-सुविधाएं धन साधन आदि संग्रह कर लिया। प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का भी किन स्वार्थ हेतु खूब दोहन कर लिया। पर कभी यह ध्यान न आया कि जब प्रकृति अपना हिसाब मांगेगी तो कया होगा। प्रकृति का बाह्य व आंतरिक आपदाएं लाकर अपूर्णताएं संहार कर संतुलन लाने का अपना ही विधान है। बाह्य आपदाएं-भूचाल बाढ़ तूफान अग्नि प्रकोप ओलावृष्टि भूस्खलन आदि। आंतरिक आपदाएं-आधि व्याधि ताप
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मानवता का सफाया स्वर्ग प्राप्ति हेतु कलियुग में आतंकवाद एक अमरबेल की तरह सम्पूर्ण मानवता पर छाता जा रहा है। कहां नहीं है यह राक्षस, निम्नतम स्तर से लेकर उच्चतम स्तर तक पूरी मानवता इससे त्रस्त है। धमकाकर डराकर उकसाकर बहलाकर दबाव डालकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना, अपनी पाश्विक प्रवृतियों को तृप्त करना, मानव अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने लगा है। इसके इतने प्रकार प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे व्याप्त हो गये हैं कि बिना अपराध बोध
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सामूहिक प्रार्थना में महान शक्ति होती हैजब इसको एक दिशा दी जाए तो यह शक्ति सामूहिक रूपान्तरण के सूत्रपात में प्रयुक्त हो सकती है।प्रणाम सबको पुकारता है कि 10 बजे रात्रि सब संयुक्त होकर मानवता की भलाई और सत्य धर्म की पुनर्स्थापना हेतु प्रार्थना करें।10 अंक पूर्णता का द्योतक होने के साथ-साथ 10वें अवतार श्री विष्णु का भी प्रतिनिधित्व करता है। जो कि इस युग में सचेतन है। मानव शरीर में भी मुख्य 10 प्रणाली
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वाट्सअप आधारित कम समय का कोर्सतीन स्तरों 1. 2. 3. पर हैप्रत्येक स्तर प्रगतिशील ध्यान, चैतन्यता व सचेतनता की ओर ले जाता है।इस कार्यक्रम की विशिष्टता-प्रणाम की आकांक्षा है मानव की सभी क्षमताओं को उस उत्थान बिन्दु तक प्रगति हो जहां वो योग्यताएं बन जाएं और मानव की संवेदनाएं उन्नत संवेदनशीलता में बदल जाए जिससे कि प्रकृति के नियमों पर आधारित पूर्ण रूपांतरण की प्राप्ति हो।यह प्रत्येक मानव का उत्तरदायित्व है कि परिवर्तन की ओर
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सामूहिक शक्ति में बड़ी क्षमता होती है। जब चैनलाइज किया जाता है, तो इस बल का उपयोग बड़े पैमाने पर परिवर्तन शुरू करने के लिए किया जा सकता है।प्रणाम हर रात 10 बजे कनेक्ट करने के लिए हर रात मानवता की चिकित्सा करने और सच्चे धर्म को फिर से जीवित करने के लिए कहता है।10 की गिनती पूर्णता के प्रतिनिधि होने के अलावा, इस युग में सक्रिय विष्णु के 10वें अवतार को भी दर्शाता है।
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एक व्हाट्सएप आधारित लघु अवधि पाठ्यक्रम स्तर – 1,2, 3प्रत्येक स्तर प्रगतिशील ध्यान, जागरूकता और मनमर्जी की दिशा में काम करता है। इस कार्यक्रम की विशिष्टता : प्रणाम मानव क्षमताओं को उस विकासवादी बिंदु पर विकसित करने की इच्छा रखते हैं जहां वे क्षमता बनते हैं, और मानवीय संवेदनाओं को चैनलाइज करते हैं जहां वे संवेदनशीलता बन जाते हैं ताकि प्रकृति के नियम के आधार पर कुल परिवर्तन प्राप्त कर सकें। परिवर्तन की दिशा में
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हम सभी पाँच तत्वों से बने हैं, इनमें से चार – वायु जल अग्नि और ईथर सार्वभौमिक हैं और पूरे ब्रह्मांड में विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं, जबकि यह केवल पृथ्वी तत्व है, जो हमारे ग्रह का पंच-महाभूत पूरा करता है – सृष्टि के लिए आवश्यक हैं पांचों तत्व। आज पृथ्वी दिवस है… लेकिन वास्तव में इस ग्रह पर हमारे लिए, प्रतिदिन ही पृथ्वीदिवस होना चाहिए। भारतीय संस्कृति ने हमेशा प्राकृतिक ऊर्जा को देवताओं
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