मीना ऊँ

कलियुग में गीता का उद्घोष करने मन से मन की जोत जलाने सत्य, प्रेम व कर्म का पाठ पढ़ाने प्रणाम पूर्ण तत्पर हुआ सतत् कर्म ही धर्म है। ऐसा कर्म जिसका आधार हमारे प्राकृतिक स्वभावगत संस्कार ही हों। ऐसी ही वेदों की मान्यता है। वह कर्म जो सबका भला करे, सुख शान्ति की स्थापना व कामना करे। चाहे व्यापार हो राजनीति हो या धर्म हो। सब सत्यता की नींव पर ही आधारित हों नि:स्वार्थ व
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सत्य का ज्ञान पा लेना अधूरा ही है यदि उसे कर्म करके अनुभव में परिवर्तित न किया जाए। सत्य-कर्म, अपूर्णता को सम्पूर्णता से नकारना ही धर्म-कर्म है। धर्म का पालन, समाज के बनाए नियमों को निभाना व राजनैतिक कानूनों को मानना भी अपनी जगह ठीक है पर इनमें आई हुई कुरीतियों, दिखावटीपन व राष्ट्र विरोधी नीतियों को चुपचाप स्वीकारना कर्महीनता ही है। जो धर्म सहनशीलता व संतुष्टि का पाठ पढ़ा-पढ़ा कर हमें आलस्यपूर्ण, अकर्मण्यता और नपुंसकता
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मानव जीवन एक सम्पूर्ण व्यवस्था है उसे टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता। अधिकतर मानव यही सोचता है कि समय आने पर देखा जाएगा। पूरे जीवन की तैयारी साथ-साथ ही करनी होती है। खूब काम करो भरपूर कमाओ मस्ती से जियो। पर क्या मानव किसी भी विधि से एकदम सही जान सकता है कि कैसे भविष्य पूर्ण सौभाग्यमय रहेगा। जब कठिनाइयाँ व कष्ट आते हैं तो चिन्तित व विक्षिप्त होकर भाग दौड़ मचाता है मानसिक
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हमारी वैदिक विद्या को शब्दों व तकनीक में नहीं बांधा जा सकता। वह तो अनुभव और प्रगति की निशानी है। उसको भुला देने पर ही उसकी अलौकिकता व दिव्यता खत्म होती जा रही है उसका सतत् प्रवाह रुक गया है उसी को तो अब खोलना होगा आत्मशक्ति द्वारा जन जागरण करके प्रणाम के सिपाही बनके। हमारी गंगा-जमुना जैसी निरंतर बहने वाली संस्कृति मैली हो रही है। अब रास्ते के भ्रष्ट पत्थर हटाने ही होंगे। अपने
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पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय, ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय क्या खूब कहा है कबीरदास जी ने। दुनिया में जिसने सच्चे प्रेम की झलक पा ली, समझो खुदा को पा लिया। क्योंकि सत्य अपनी चरम सीमा को पहुँचकर बस प्रेम ही प्रेम में बदल जाता है। एक ऐसी स्थिति हो जाती है कि सत्य और प्रेम एक ही हो जाते हैं। प्रकृति माँ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। गंगोत्री
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माना कि बहुत बड़ा है झूठ का मकान, हिम्मत कर सच का एक पत्थर उछालो तो सही। कौन कहता है कि आसमां में छेद हो नहीं सकता, आशा की डोर थाम कर्म की पतंग उड़ाओ तो सही। प्रणाम बढ़ चला है सत्य, प्रेम व कर्म की डगर पर, साथ आओ न आओ पर ज़मीर को अपने, जगाओ तो सही प्रभु सदा उनके साथ होते हैं, जिनकी अपने सत्-संकल्पों और अपनी दूरदर्शिता में पूर्ण आस्था होती
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पवित्र प्रेम, सबसे प्रेम, एक जैसा प्रेम, जड़-चेतन से प्रेम, कण-कण से प्रेम ही तो सृष्टि से प्रीति है। मानव को सृष्टि ने पूर्ण प्रेम से तन्मय प्रेम से मनोमय प्रेम से गढ़ा है। क्योंकि सृष्टि यह जानती है कि मानव उसी की तो अनुकृति है जो उसी का छोटा-सा अणुरूप ही है। वह अपनी सत्ता को बोल बता नहीं सकती, सुना नहीं सकती जिसको जरूरत हो उसके लिए रुक नहीं सकती, इसीलिए उसने यह
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जागो, भारतीयों! महाकाल का तांडव प्रारम्भ हुआ। बार-बार चेताया-जगाया पर मानव अपने कर्मों की डोर से बँधा प्रकृति नटनी की कठपुतली बना ही रहता है। प्रकृति का न्याय सर्वोपरि है जो मानव बुद्धि से परे है। सब कर्मों का चक्र फल यहीं पूरा होता है यही है सत्य। पर इस चक्र के जंगली स्वरूप को सुव्यवस्थित करने हेतु मानव को बुद्धि दी गई। जिससे अच्छी समाज व्यवस्था, सच्ची न्याय व्यवस्था और नीति-युक्त राजव्यवस्था का सुंदर
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प्रकृति का नियम है पका फल पेड़ पर अधिक देर तक लगा रह ही नहीं सकता वह टपकेगा ही कभी न कभी। पेड़ की फल देने की भी एक क्षमता होती है उसके बाद नए पेड़ आते हैं। यही क्रिया मानव जीवन की भी है। नई पीढ़ी को तैयार करना ही मानव धर्म है। पुरानों को जो कि अपना कर्म कर चुके होते हैं, उन्हें जाना ही होता है। उनका कर्म कैसा रहा, उनका योगदान
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सरस्वती नमस्तुभ्यम् वरदे कामरूपिणीम्विश्वरूपी विशालाक्षी विद्या ज्ञान प्रदायने। हे माँ सरस्वती नमन वंदन, कामरूप सृष्टि उत्पत्ति की समग्रता में व्याप्त विश्वरूपिणी, सर्व विद्यमान, दूरदर्शिता से परिपूर्ण विशाल नेत्रों वाली विद्या और ज्ञान का वर दें। ब्रह्म की सृष्टिï को पूर्णता तक ले जाने का मार्ग सब प्रकार की विद्याओं और कलाओं से प्रशस्त करने वाली देवी शारदे सदा ही वंदनीय हैं। दिन के आठों पहर में एक बार प्रत्येक मानव की वाणी में सरस्वती अवश्य
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