मीना ऊँ

स्मृति अनंत सागर, स्मरण की बना मथनी, बुद्धि की बना डोर, इच्छा की लगा शक्ति, ध्यान का लगा ज़्ाोर, काल का चक्र घुमा पाया अनमोल रतन तत्व ज्ञान का मानव विधान का स्वत: ही सीखो और आगे बढ़ो। यही है श्रीकृष्ण का स्वाध्याय योग। हम अपने अधूरे ज्ञान को बहुत कुछ मान लेते हैं, और उसकी अहंकारमयी चादर अपने चारों ओर लपेटकर अपना व्यवहार निश्चित कर लेते हैं। संसार से प्राप्त अपरा ज्ञान व तकनीकी
आगे पढ़ें
यही रहे प्रभु मेरो व्यवहार, रहूँ तरनतारन को तैयार स्वत: हो दुष्टों का संहार, यही कर्ममय शक्ति दो अपार करे दूर सब दुख ताप भार, सत्यमय हो सकल संसार तेरो शबद मेरो राखनहार। एक शब्द में संसार समाया है। एक प्रेममय भावपूर्ण सकारात्मक शब्द में कितनी शक्ति है इस बात को मानकर विश्वास रखें तो मानव अपने आप ही सत्य ज्ञान व तत्वविधान की सीढ़ी चढ़ जाएगा। बहुत ही तथ्यपूर्ण व गागर में सागर वाला
आगे पढ़ें
जात न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान,मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान। म्यान ही अज्ञान है और अब हाल यह है कि म्यान जितनी ज्यादा चमकदार सोने चांदी वाली हीरे मानक जड़ी होगी, उतना ही चारा डल जाएगा भेड़चाल वाली मानसिकता के सामने। ज्ञान तो बस एक ही बिन्दु समान है बाकी सब अपनी अपनी बुद्धि और अपने व्यक्तिगत हिसाब और सामर्थ्य के फैलाव ही फैलाव हैं। उपनिषद् में कहा गया है
आगे पढ़ें
जो तोकू कांटा बोए ताहि बोई तू फूलतोको फूल के फूल हैं वाको हैं त्रिशूल। तेरी राह में जो कांटे उगाए उसकी राह में तू फूल उगाता चल! तुझे तो फूल ही फूल मिलेंगे उसे त्रिशूल मिलेंगे। तीन शूल-बीमारियां व्यथाएँ व दुर्घटनाएँ उसको खुद ही सताएँगी। सब कहते हैं हम तो अच्छा ही करते हैं दूसरों का क्या करें? बाहरी परिस्थितियाँ खराब हैं, क्या करें? तो भई बुराई कौन कर रहा है, इसका निर्णय कौन
आगे पढ़ें
मनका मनका फेरता गया न मन का फेरकर का मनका गेर के मन का मनका फेर माला के मनके घुमाता रहा और मन का, हृदय का फेर न गया, चक्कर न गया। अरे बंदे कर का, हाथ का मनका छोड़कर अपने हृदय के मनके को फेर उसको घुमा उलट-पलट कर देख तभी काम बनेगा। मोको कहाँ ढूँढ़े रे बंदे मैं तो तेरे पास में, ना काबे कैलाश में न काशी मथुरा वास में, ढूँढ़ो मन
आगे पढ़ें
मान लो तुम सहज हो सुंदर हो तो हर आईना धुँधला पड़ जाता है मान लो तुम साहसी हो आत्मविश्वासी हो तो हर रुकावट हट जाती है मान लो तुम रानी हो अपने घर की तो हर दीवार सोने सी लगती है मान लो तुम अन्नपूर्णा हो तो हर व्यंजन स्वादिष्ट हो जाता है मान लो तुम सरस्वती हो तो हर पल कमल सा खिल जाता है मान लो तुम लक्ष्मी हो तो हर अभाव
आगे पढ़ें
अंधकार स्वरूप रात्रि बीतने का और नव सुप्रभात के उदय होने पर सबको जगाने का, विशेष रूप से सखी जो साथ चलने को राजी हो, इसका कितना सौंदर्यपूर्ण चित्रण किया है, महान सरस्वती पुत्र जयशंकर प्रसाद ने बीती विभावरी जाग री। नभ पनघट में डुबो रही, तारा घट उषा नागरी॥ एक ब्रह्मा ही तो पुरुष है। हम सब उसकी सखियाँ व गोपियाँ ही तो हैं। तभी तो कहा है सखी जाग री। नभ के अनंत
आगे पढ़ें
सं ज्योतिष: ज्योति यह यजुर्वेद का एक सूक्त है, जो तेज से तेज मिलाकर तेजस्विता बढ़ाने का आह्वान करता है यही तेजस्विता यज्ञ है। प्रणाम की पुकार यही है, आओ सब सत्य-योगियों प्रेमयोगियों कर्मयोगियों सब संगठनों के तेजोमय व्यक्तियों, इस अभियान यज्ञ में एकजुट हो आहुति डालो ताकि भारत माँ की शोभा फिर से स्थापित हो। भारत माँ महान सपूत जननी का गौरव पाए। जोत से जोत जलाते चलो – प्रेम की गंगा बहाते चलो
आगे पढ़ें
कलियुग में गीता का उद्घोष करने मन से मन की जोत जलाने सत्य, प्रेम व कर्म का पाठ पढ़ाने प्रणाम पूर्ण तत्पर हुआ सतत् कर्म ही धर्म है। ऐसा कर्म जिसका आधार हमारे प्राकृतिक स्वभावगत संस्कार ही हों। ऐसी ही वेदों की मान्यता है। वह कर्म जो सबका भला करे, सुख शान्ति की स्थापना व कामना करे। चाहे व्यापार हो राजनीति हो या धर्म हो। सब सत्यता की नींव पर ही आधारित हों नि:स्वार्थ व
आगे पढ़ें
सत्य का ज्ञान पा लेना अधूरा ही है यदि उसे कर्म करके अनुभव में परिवर्तित न किया जाए। सत्य-कर्म, अपूर्णता को सम्पूर्णता से नकारना ही धर्म-कर्म है। धर्म का पालन, समाज के बनाए नियमों को निभाना व राजनैतिक कानूनों को मानना भी अपनी जगह ठीक है पर इनमें आई हुई कुरीतियों, दिखावटीपन व राष्ट्र विरोधी नीतियों को चुपचाप स्वीकारना कर्महीनता ही है। जो धर्म सहनशीलता व संतुष्टि का पाठ पढ़ा-पढ़ा कर हमें आलस्यपूर्ण, अकर्मण्यता और
आगे पढ़ें