मीना ऊँ
हे माँ लक्ष्मी कर प्रकाश समृद्धि प्रेम वृद्धि का जहाँ दीपावली पर्व श्रीगणेश की विघ्नहारी सूरत और महालक्ष्मी की भव्य मूरत मन में साकार करता है वहीं मन-मस्तिष्क में पचास वर्ष पुरानी दीवाली की कसक भी मन में जगाता है। श्री लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों दीयों व खील-बताशों के अलावा कुछ भी बाजार से नहीं आता था। बरसात से बेरंग हुए घरों की लिपाई-पुताई महीनाभर पहले शुरू हो जाती थी। सफाई-सजावट सब घर के सदस्य मिलजुलकर
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ब्रह्मा-विष्णु-महेश की त्रिमूर्ति ब्रह्माण्डीय कालचक्र के कृतित्व, उसकी पूर्णता और संहार का सार तत्व है। मानव शरीर यंत्र का ज्ञान, मंत्र की ऊर्जाओं का भान और शरीर के अंदर फैली नाड़ियों के जाल का उनके उद्गम संगम और विलय के तंत्र का ज्ञान, सब कुछ ध्यान-योग की अद्ïभुत क्षमता से जानकर विश्व को देना ही श्री शिव की महानतम देन है। उनका सर्वस्व स्वरूप यही स्थापित करता है कि मानव शरीर ब्रह्माण्ड की संरचना प्रक्रिया
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सरस्वती नमस्तुभ्यम् वरदे कामरूपिणीम् विश्वरूपी विशालाक्षी विद्या ज्ञान प्रदायने। हे माँ सरस्वती नमन वंदन, कामरूप सृष्टि उत्पत्ति की समग्रता में व्याप्त विश्वरूपिणी, सर्व विद्यमान, दूरदर्शिता से परिपूर्ण विशाल नेत्रों वाली विद्या और ज्ञान का वर दें। ब्रह्मा की सृष्टि को पूर्णता तक ले जाने का मार्ग सब प्रकार की विद्याओं और कलाओं से प्रशस्त करने वाली देवी शारदे सदा ही वंदनीय हैं। दिन के आठों पहर में एक बार प्रत्येक मानव की वाणी में सरस्वती
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श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ श्री गणेश घुमावदार सूँड़, बड़ी काया व करोड़ों सूर्यों की प्रभा ज्योत्स्ना वाले, मेरा प्रत्येक कार्य सदा निर्विघ्न करो। भारतीय परम्परा है कि कोई भी कार्य व्यापार से पूजा तक गणेश वंदना से ही प्रारम्भ होता है। यह एक रीति की तरह निभाया जाता है। इसका अर्थ बहुत ही गहरा व अर्थपूर्ण है। जिसको समझना व समझाना विशेषकर नौजवान पीढ़ी को अत्यन्त आवश्यक है,
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सदैव आकांक्षा करो एक ऐसे संवेदनशील हृदय की, जो सबसे नि:स्वार्थ प्रेम करे ऐसे सुंदर हाथों की, जो सबकी श्रद्धा से सेवा करें ऐसे सशक्त पगों की, जो सब तक प्रसन्नता से पहुँचें ऐसे खुले मन की, जो सब प्राणियों को सत्यता से अपनाए ऐसी मुक्त आत्मा की, जो आनन्द से सबमें लीन हो जाए धर्म वही है जो जात-पात, ऊँच-नीच और मेरा-तेरा छोड़ सबको खुशी दे एवं उन्नत होने में सहायक हो। धर्म प्रेम
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विद्या अंधकार दूर करने का माध्यम है। अपने को समझने का दूसरे को पहचानने का, घर परिवार समाज देश राष्ट्रों और ब्रह्माण्डों को समझने-बूझने का ब्रह्मास्त्र है। सच्ची विद्या परमानंद पाने का, घर-बाहर व नक्षत्रों इन सबसे अपने को संतुलित कर, तारतम्य बना कर उनमें मानसिक रूप में समाहित होकर पूर्ण लयात्मक होने का ज्ञान है। इससे शक्ति पाकर चारों ओर परम शान्ति प्रेम और आनन्द स्थापना का महामंत्र है। परमानंद प्राप्ति व ईश्वर प्राप्ति
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सात साधे सब सधे आप साधे जग सधे। सात रंग, सात स्वर, सात आकार, सात चक्र, सात ग्रंथियाँ, सात ऋषि, सात आकाश, सात तल अंतर्मन की गहराइयों के, सात समुद्र, सात दिन, सात ग्रह, सात सोपान युग चेतना के, मानव उत्थान के और सात ही शब्द सविता मंत्र के। ऊँ भू : ऊँ भुव: ऊँ स्व: ऊँ मह: ऊँ जन: ऊँ तप: ऊँ सत्यम् इन सबका ज्ञान व महत्व जानकर इस दिशा में प्रयास स्वत:
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क्या कभी प्रकृति का मंदिर देखा है या किसी ने प्रकृति का मंदिर बनाने का सोचा भी है। जिस प्रकृति से मानव बना पोषित हुआ उसको कभी सच्चे मन से धन्यवाद किया है? जिसने सब कुछ दिया, देती रहेगी बिना कुछ लिए दिए, बिना कुछ भेदभाव किए तुम उसके लिए क्या करते हो ज़रा सोचो तो। पूजा करने मंदिर जाते हो घुसने से पहले ही हिसाब किताब शुरू हो जाता है कितनी बड़ी माला, कितने
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घट-घट में पंछी बोलता आप ही माली, आप बगीचा आप ही कलियाँ तोड़ता आप ही डंडी, आप तराजू आप ही बैठा तोलता सबमें सब पल आप विराजे जड़ चेतन में डोलता। कबीर जी की कथनी कितनी सरल और सटीक है! सब ज्ञान-विज्ञान का निचोड़ है। पर घर की मुर्गी दाल बराबर। यही हाल है पाश्चात्य सभ्यता के पीछे अंधे होकर दौड़ने वालों का। बड़ी हैरानी होती है दुनिया का तमाशा देख-देखकर। भारतीय कहलाने वाले हीलर्स
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अब समय आ गया है कि आत्मानुभूति (स्पिरिचुएलटी) व धार्मिकता का अंतर स्पष्ट किया जाए। धार्मिकता मनुष्यों की बुद्धि से पनपा अध्यात्मवाद है, पंथ है, जिसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, जबकि आत्मानुभूति सच्चे मानव को प्रकृति द्वारा अनुभव कराई प्रकृति के ही नियमों वाले शुद्ध धर्म की सच्चाई है। कलियुग में धार्मिक गुरुओं व तकनीकों की भरमार ने सब गड़बड़ घोटाला कर दिया है। पर यह स्थिति भी प्रकृति की ही देन है ताकि सबके
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