मीना ऊँ
भारत एक धर्मपरायण देश है। कोने-कोने में गीता गूँजती है। जन्माष्टमी पर तरह-तरह के आयोजन कर गीता के सृजनहार को याद किया जाता है। खूब धन व्यय किया जाता है। भजन-कीर्तन की भरमार रहती है मगर गीता के वचनों पर चलने की बात, उसे जीकर जीवन धन्य करने की बात इस पूजा-पाठ के शोरगुल में अनायास ही कहीं खो गई है। अगर गीता को गुनकर जीया जाए तो भारत की सारी समस्याएँ खुद ही हल
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नैना नीर भरे, नैना नूर भरे में बदलें यही मेरी भक्ति तथा आस्था है। प्रकृति स्वयं ही कर्म का पाठ पढ़ाएगी। जागृत चेतना स्वयं ही रास्ता दिखाएगी, दूसरों की चेतना को भी जगाएगी। दुख आता है बुद्धि का अंधकार मिटाने, बीमारी आती है शरीर का विकार मिटाने और जब प्रश्न आते हैं क्यों आती हैं त्रासदी दुर्घटना, विपत्ति और आपदा तो समझो आत्मा का अंधकार मिटाने की बारी है। जब-जब ऐसे प्रश्न उठते हैं तो
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डेमोक्रेसी का पर्याय बन गया है दे मोहे कुर्सी। भारत के सम्मान की और भारतीयता की प्राण सत्यम् शिवम् सुंदरम् वाली संस्कृति की किसी को भी चिंता नहीं है। कृष्ण के कर्मयोग के पाठ की जगह आलस्य और कर्महीनता अपनी जड़ें जमा चुके हैं। आज जो तहलका मचा है। तहलका की गतिविधियों से उससे भ्रष्टाचार व्यवस्था के सुनियोजित तथा नियमित रूप से चलने की प्रक्रिया पर सत्यता की मोहर तो लगी ही है पर एक
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होगा वही जो प्रकृति को मंज़ूर होगा और प्रकृति को सिर्फ सत्य, कर्म और प्रेम ही मंज़ूर होता है। सत्य सुकर्म करने का ब्रह्मास्त्र है। सत्यवादी ही निडर होकर सत्कर्म को तत्पर होता है- इतना बढ़े सत्य का तेज। हो सब विकृतियाँ निस्तेज॥ सत्य की तपस्या से अपने अंतर के भगवान को जगाना ही होगा। तुम सब भगवान हो पर जब तक भगवद् गुण प्राप्त कर दिव्यता धारण नहीं करते भगवान के अंशमात्र ही हो।
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हर वर्ष गणतंत्र दिवस बड़ी भव्यता से अपार धन व्यय कर मनाया जाता है जबकि सादगी राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी का संदेश है। भारत के सच्चे सपूतों के बलिदान और युगदृष्टाओं की चेतावनी का ध्यान रखकर यदि सही राह न अपनाई तो कैसे बात बनेगी। गणतंत्र का सच्चा अर्थ समझकर उसका उपयोग भारतीयों की सोई देशभक्ति को जगाने में करने में ही इस दिवस की सार्थकता निहित है। जिस प्रकार सृष्टि की सुव्यवस्था तंत्र-यंत्र-मंत्र में निबद्ध
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यह कैसी विडंबना है कि अर्जुन को तो, बिना किसी मंदिर के, खुले मैदान में ही, श्रीकृष्ण की वाणी जो सिर्फ एक बार ही बोली गई, ऐसी एक ही गीता ने जगा दिया। और आज जबकि लाखों गीताएं पढ़ी-सुनी जा रही हैं हजारों कृष्ण मंदिर हैं फिर भी कर्म के लिए तत्पर जागरण की लहर उछाल क्यों नहीं लेती। शायद अर्जुन भ्रमित है, क्योंकि उदाहरण स्वरूप कहाँ हैं? जो सत्य उदाहरण स्वरूप हैं भी, उनका
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कन्हाई का तो बस अब एक ही प्रश्न है क्या हर युग में बार-बार विराट रूप दिखाना ही पड़ेगा तभी पहचानेगा अर्जुन श्रीकृष्ण के स्वरूप को। क्या कोई अर्जुन, इतना जो ज्ञान फैला हुआ है चारों ओर, उससे ज्ञान चक्षु खोलकर दिव्य दृष्टि पाकर, स्वत: अपने आप ही उस स्वरूप को पहचान नहीं पाएगा जो राह सुझाता है, सत्य मार्ग बताता है। कौन समझता है कन्हैया का दर्द, माधव मोहन का मर्म। जिस बाल सखा
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प्रतीकों की अपनी एक अनोखी है दुनिया जो कि कुछ विशेष चिह्नों, बिन्दुओं, रेखाओं व रंगों में पूरा ग्रंथ समाए हुए होती है। प्रतीक एक सोच या विशेष विचारधारा की उत्पत्ति होते हैं। जो दिमाग से सोचकर या विशेष कला की विद्या ध्यान में रखकर नहीं बनाए जा सकते। यह अपने अंतर के सत्यभाव से प्रस्फुटित होते हैं। यह अपने आपमें पूरा संदेश लिए होते हैं जिसे वे ही समझ पाते हैं जो उस प्रतीक
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पिछले अध्याय में हवन की तैयारी बताई। उसके बाद हथेली के अमृतकुंड में जल भर कर दो उंगलियों से उसे छूकर शरीर की सब कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों को जल लगाकर प्रार्थना की जाती है कि वह सदा शुभ व मंगलमय देखें, सुनें व स्वस्थ, बलिष्ठ, पुष्ट हों। तत्पश्चात अग्निकुंड में कपूर से व घी में डुबोई लकड़ियों से अग्नि प्रज्वलित की जाती है। यह मानव शरीर भी इस लकड़ी के समान घी-पौष्टिकता का प्रतीक-ग्रहण कर
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हवन अपने अंतर्मन के सभी विकारों को भस्म करने की वैदिक प्रक्रिया है। इस पद्धति में सभी उपचार पद्धतियाँ बहुत ही सुंदर रूप में समाई हुई हैं। मनोचिकित्सा, एक्यूप्रेशर, स्पर्श चिकित्सा, ध्यान, ज्ञान, प्रार्थना, भक्ति, विवेक, संयम, व्यवस्था इत्यादि का अद्भुत संयोजन है। विचारों और प्रक्रियाओं का बहुत ही सौंदर्यमय तालमेल है। सत्य, प्रणाम की प्रमुखता है और हवन उसी का संदेशवाहक व प्रमाण है। सत्य की सच्ची साधना है जो सोचो वही बोलो वही
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