मीना ऊँ
हे मानव! यह सत्य जान ले कि :-सिंहों के नहिं लेहड़े, हंसों की नांहि पांतलालों की नहिं बोरियां, और संत न चले जमात। शेरों के लेहड़े या भीड़ नहीं होती भेड़ बकरियों की तरह जिन्हें कोई भी हांक ले जाए। हंसों की बतखों की तरह कतारें की कतारें नहीं होतीं। रत्न हीरा माणिक मोती बोरी भर भर नहीं होते। लालों (सपूतों) के ढेर नहीं होते। कोई-कोई धरती का लाल सच्चा सपूत होता है और सच्चे
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हे मानव!मानव यंत्र का सत्य जान। मानव चाहे जैसे भी गुणों में रमता हो प्रभु ने उसे एक ऐसी शक्ति दी है जिससे आठों प्रहर में एक बार अवश्य ही उसकी जिह्वा पर माँ सरस्वती उतरती है और जो भी उस समय कहा जाए वह सत्य होता है। इस पल का ज्ञान मानव बुद्धि को नहीं होता पर इसका अनुभव जीवन में सबको होता है कि कभी यूँ ही कही बात सच हो गई। इसे
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हे मानव!एक कोषाणु या सेल दूसरे कोषाणु या सेल से पूर्णतया विकसित होकर ही विभक्त होता है। फिर भी दोनों पूर्ण ही रहते हैं आकार-प्रकार में कोई भिन्नता नहीं होती। विभक्त होने का सूक्ष्मतम क्षण कोई साइंस या विज्ञान नहीं पकड़ सकता। वह तो ब्रह्माण्डीय चेतना (कॉस्मिक कॉन्श्यसनेस) का ही निर्णय होता है। एक सेल एक समय में एक ही को पूर्ण करने में पूरी शक्ति व ध्यान लगाता है। अगर मदर सेल चाहे कि
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हे मानव!यह सत्य जान वेद मानव सम्पूर्ण सृष्टि से ऐसे संवाद स्थापित करता था जैसे मानव मानव के सम्मुख होकर करता है। उसकी पूर्ण आस्था थी कि उसका संदेश ब्रह्माण्डीय ऊर्जाएँ व शक्तियाँ अवश्य ही सुनती हैं और उसी के अनुरूप सभी क्रियाएँ एवं प्रतिक्रियाएँ होती हैं। समस्त ब्रह्माण्ड से वह एकत्व अनुभव करता था क्योंकि इस एकात्म के सत्य का उसे पूर्ण आभास था। सभी दृश्य व अदृश्य ऊर्जाओं और शक्तियों को वह देवता
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हे मानव ! तू जानना चाहता है कि कैसा है उस परम का स्वरूप। वह तो केवल प्रकाशवान सत् चित् का आनन्द है। जिसे केवल सत्य से ही जाना जा सकता है और वह भी केवल अपने ही सत्य से। हाँ, उसे पहचान सकते हो इन लक्षणों के द्वारा :- – जो सदा सत्य होने की ही राह दिखाए – जो सदा उन्नत होने की प्रेरणा दे – जो पूर्ण सकारात्मक हो – जो पूर्णता
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मैं आत्मा हूँ आत्मा ही तो हूँ आत्मा में पूर्णतया संतुष्ट आत्मा के ही गुणों में रमने वाली आत्मा से ही खेलने वाली बातें करने वाली औरों की भी आत्मा से सम्पर्क साधने वाली उसी को अनुभव कर आत्मानुभूति में मगन रहने वाली आत्मा के ही गुण विस्तीर्ण करने को यह शरीर प्रभु का ही दिया हो गया प्रभु का ही दीया आयाहि सत्य आविर्भवआओ सत्य अवतरित होओ प्रणाम मीना ऊँ
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प्रणाम पूर्ण है। सत्य का विस्तार है। प्रणाम का अर्थ हुआ ‘मेरे प्रकृति स्वरूप प्राणों का विस्तार नम्रतापूर्वक ‘। प्राणों का विस्तार सत्य, निर्भय, निर्द्वन्द्व व स्वतंत्र आत्मा का फैलाव है। जब सत्यमयी आत्मा और आनन्ददायी प्राणों का विस्तार होगा तो सब इंसान अपने आप इन गुणों में आ जाएँगे। जैसे सूर्य प्रकाश फैलने पर अँधेरा अपने आप दूर हो ही जाता है क्योंकि सबकी आत्मा का गुण तो यही है, यही सत्य है सिर्फ
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बहुत कुछ कहा संकेतों में, कविताओं में और भाषा की आँखमिचौनी में। पूरा प्रयत्न किया कि नींद से जागे मानव, अर्जुन बने सत्यधर्म जाने अपना मार्ग प्रशस्त करे। समय का संदेश सुना पाऊँ ताकि प्रकृति ने जो अग्नि-परीक्षा संजो रखी है, नियत कर रखी है, आयोजित की हुई है, असत्यता व अपूर्णता के लिए, उसकी भयावहता से, त्रासदी से, असत्य में जी रहे मानव के लिए कुछ राहत का सामान कर सकूँ जैसे आक्रमण वाला
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भाग-1 स्मृति सागर मथ-मथ मोती पायो, घट भीतर ज्ञान भक्तियोग जगायो। सत्य, कर्म व प्रेम का पाठ पढ़ायो, प्रभु कृपा अनंता जान मन मुस्कायो। कोई पूछे मेरा परिचय। संबोधन पूछने वाले की श्रद्धा पर निर्भर करता है। तू कौन है, तुम क्या हो, वैसे आप करती क्या हैं आप हैं कौन? प्रश्नों के कई रूप हो सकते हैं पर उत्तर तो सिर्फ एक ही है। शायद लोग मुझे पागल समझें जो उनकी बुद्धि अनुसार, उन्हें
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स्मृति अनंत सागर भरे मन की गागर स्मरण की बना मथनी बुद्धि की बना डोर इच्छा की लगा शक्ति ध्यान का लगा जोर काल का चक्र घूमा पाया अनमोल रतन ज्ञान का मानव विधान का वेद विज्ञान का नव निर्माण का कर्म प्रधान का सत्य विहान का स्नेह समान का विश्व कल्याण का प्रणाम अभियान का आज के मानव ने विज्ञान के बल पर, अपनी लगन और मेहनत के बल पर सब भौतिक व ऐशोआराम
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