मीना ऊँ

हे मानव! समझ सच्चे गुरुओं के मन की बात जो सदा कल्याणकारी मार्ग बताने को प्रयत्नशील रहते हैं मनु कहे वही कथा- कंघे बेचूँ गंजों को, आईने बेचूं अंधों को ज्ञान बेचूँ अक्ल मंदों को, प्यार बाँटू कृतघ्नों को मान दूँ अहम् वालों को, कर्म पढ़ाऊँ कर्महीनों को कभी-कभी सोचूँ वंदनीय गुरुओं की बाबत क्या होती होगी उनके मन की हालत आज शिष्य हो गया चतुर महान जरा सा कर दिया गुरु जी का सम्मान
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हे मानव! अपने मानव होने की महत्ता जान, यदि मानव होने के आनन्द की अनुभूति इसी जीवन में एक बार भी न कर पाया तो मानव जन्म व्यर्थ ही गंवाया, जानवर की तरह चुक गया। मानव को प्रकृति ने तीन गुण अपने से अधिक दिए हैं क्योंकि प्रकृति किसी के लिए रुकती नहीं। मानव रुक सकता है इसीलिए मानव को बुद्धि दी ताकि इन तीनों गुणों को विकसित कर चारों ओर मधुरता बिखेरे। पहला है
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हे मानव! तू कब का भूल चुका है यह। सदियों से कब का ये माँ बाप के निश्छल प्रेम-व्यवहार से बढ़कर भाई-बहिन आदि खून के रिश्तों में बंधकर अपना जाल फैलाता ही गया। धीरे-धीरे सामाजिक व आर्थिक सम्बन्धों को भी अपने मकड़जाल में लपेटता गया फिर जो मनभायी कहें चाटुकारिता व मनोरंजन करें उनको भी अपने दायरे में समेटता चला गया, पता ही न चला। सारे सम्बन्धों, नातों व सम्पर्कों में आते लोग बनी बनाई
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हे मानव! सत्य, प्रेम व प्रकाश का प्रसार होता है झूठ, अंधकार व अपूर्णता का प्रचार होता है सत्य का धर्म स्थापित करने को मैं हर युग में प्रकट होता हूँ पर पहचानेगा तो कोई अर्जुन ही। प्रत्येक अवतार अपने से पहले वाले अवतार से भिन्न होता है और अपने युग की आवश्यकतानुसार कुछ नया करता है। जैसे महात्मा बुद्ध ने संसार त्यागकर अहिंसा और वैराग्य का कुछ और ही रूप समझाया जो श्रीकृष्ण की
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जाग अब तो जगाए प्रणाम, युगचेतना का संकेत जान चंचल मन की छोड़ दासता, अंतर्मन का सत्य पहचानहे मानव! कालचक्र घूमा है, समय करवट ले रहा है, सब प्रबुद्ध मानवों के दिलों में कुछ खालीपन कुछ अजीब-सी तटस्थता छाई है। खोल दो दिलों के ताले, उड़ने दो अंतरात्मा के पंछी को आज़ाद। अपने-अपने सत्य को स्वीकार कर लो। मुक्त हो जाओ दुविधाओं और संशयों से। तू बदलेगा मानव, बदलना ही होगा। यही बात जानने व
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हे मानव! अपने सत्य को जान, अपनी ही तराजू पर नाप-तोल कर। सूक्ष्मतम ज्ञान के तत्व सात हैं और गुण तीन। सात रंग, चक्र, स्वर, दिन, ग्रह, युगचेतना, मानव चेतना के सोपान, समुद्र, सूक्ष्म आकाशीय तल आदि सब सात। सप्तऋषि तारों के भी भिन्न-भिन्न सात ऋषि हर युग के अधिष्ठाता गुरु होते हैं जो सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान को संजोए रहते हैं। सातों चक्रों का उत्थान कर इनसे संकेत संदेश व सूचनाएँ पाने के लिए सुपात्र होना
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हे मानव! अपने को जान। सृष्टि की उत्पत्ति व संहार का क्रम निरंतर चलता ही रहता है। पर सब कुछ प्रकृति के अटल नियमों में लयात्मक रूप से निबद्ध होकर ही होता है। उत्पत्ति पूर्णता व संहार तीनों का प्रतीकात्मक स्वरूप ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही तो हैं। ब्रह्माण्डीय ऊर्जाएँ तो सदा ही प्रवाहित होती रहती हैं सृजन करने को। यदि परिणाम सत्यमय है और उसमें आगे उत्थान की संभावनाएँ हैं तो पूर्णता की ओर अग्रसर
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हे मानव! जीवन भरपूर जीना है घूँट-घूँट पी लेना है, आनन्द ही आनन्द लेना है और आनन्द ही देना है। कष्ट मुसीबतें समस्याएँ हैं ही कहाँ? ज़रा सोच तो पल में मर गया तो सब खत्म। तो क्यूँ नहीं जीते जी ही सोच लेता कि समस्याएँ कैसी? इनसे व्यथित होकर इन्हें बखानना, मुसीबत मानना ही भरपूर जीवन जीने से भागने का बहाना मात्र है। समस्याएँ जीवन का नमक हैं, सौन्दर्य हैं, परीक्षाएँ हैं जिन्हें देकर
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मानव जब वेद व सत्य, विज्ञान व तथ्य, विद्या व स्वाध्याय और ज्ञान व विद्वता इन चारों कोणों से परिपूर्ण हो चतुर्भुज रूप होता है तो उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व पूर्णतया प्रकाशवान हो जाता है। ऐसे मानव का परम बोधि (सुप्रीम इंटेलिजेंस) से तारतम्य स्थापित हो जाता है। उसकी चेतना का योग परम चैतन्य स्वरूप से हो जाता है। यही होती है मानव के उत्थान की पराकाष्ठा। इस स्थिति को प्राप्त मानव के द्वारा युग चेतना
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हे मानव!जान इनका सत्यस्वरूप क्योंकि यही है नवयुग की ओर अग्रसर होने का मर्म। कलियुग में सिर्फ वो ही विद्याएँ पार लगाएँगी जिनमें अपने आप पर ही काम करना होता है और यह सब तभी सम्भव होगा जब हम प्रतिपल इसके प्रति सजग रहेंगे ध्यान-योग के द्वारा। सतयुग की ओर बढ़ते समय के चुपचाप कदमों के साथ केवल वे ही कदम मिला पाएँगे जो ज्ञान, भक्ति व कर्म में पूर्णता लाने की तपस्या करेंगे। यह
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