मीना ऊँ

हे मानव ! तूने अपनी बुद्धि और ज्ञान का सारा का सारा विकास अपने चारों ओर की वस्तुओं को अपने ही मनोनुकूल बनाने में लगा दिया है। आश्रमों व तीर्थों में भी जो कुछ तेरे मन की खुशी दे, तन को सुख और आराम दे दिमाग को शान्त करे वही ढूँढ़ता है। जैसे कोई बाहरी उपाय ही तेरी इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर दे और तुझे कोई विशेष श्रम और आध्यात्मिक उपक्रम न करना
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हे मानव ! प्रेम का कोई परिचय नहीं, प्रेम की कोई सीमा नहीं न कोई मोल न तोल, प्रेम न जाने पक्ष-विपक्ष न घृणा-द्वेष न राग-विराग, ऐसे निश्छल प्रेम को ही जो परम भक्ति जानते, वह प्रभु में और प्रभु उनमें पूर्ण समरूप हो जातेनि:स्वार्थ प्रेम एक अन्तरंग साधना है जो बाह्य तपश्चर्या व सब प्रकार के सम्बन्धों के मोह से परे है। ऐसे दिव्य प्रेम को हृदय में जागृत करने के लिए पल-पल अपने
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हे मानव !सत्य का तेज करे सभी कुवृत्तियाँ निस्तेज। सत्य ही सुकर्म की शक्ति है। सत्य सुदर्शन चक्र है झूठ को काटने का ब्रह्मास्त्र है। यह भी सत्य है कि कोई कितना ही महान क्यों न हो अंतत: अकेला ही रहता है। अर्जुन जिसको श्रीकृष्ण ने मानव जीवन का ज्ञान-विज्ञान गीता के रूप में दिया वह भी युद्ध जीतने के बाद अपने परिवारवालों के साथ ही गया। अब समय आ गया है कि मानव यह
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हे मानव ! सत्य की शरण में आ। त्याग अहम् दे सत्य का साथ। सत्य की विडम्बना यही है झूठ तो झूठ का साथ देने को झट से तैयार हो जाता है और सारे क्रियाकलाप व काले धंधे सिर्फ वचनों और इशारों से ही विश्वसनीयता से सम्पन्न कर लेता है पर सत्य अकेला रह जाता है। अपने सत्य और अहम् ब्रह्मास्मि के मंदिर में बंद या फिर विवादों के अखाड़ों में अपने सत्य को औरों
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हे मानव ! पूर्णता की साधना प्रत्येक पल को सम्पूर्णता से जीने में ही निहित है। सच्ची साधना वही है कि जो भी कार्य आपको प्रभु कृपा से प्राप्त हो गया उसे ही अपनी पूरी शारीरिक व मानसिक क्षमताओं से निभाना और पूर्णता की ओर ले जाना। पूरे मनोयोग से किया गया कार्य ही बड़ाई पाता है प्रभुता प्राप्त करता है। जब भी कोई नया आविष्कार या कार्य सम्पन्न होता है तो वह इसी बात
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हे मानव! तू नहीं जानता कैसे अर्जित की जाती है एक ऐसी मनोहारी मुस्कान जो मूर्तियों और चित्रों में भी जीवंत होकर सदा राह सुझाती है। जब तुम उसके समक्ष होकर अपने कष्ट गिनाते हो तो वह रहस्मयी मुस्कुराहट जैसे कह रही होती है कि तूने तो कुछ भी नहीं झेला जो मैंने झेला है तू इतने से ही घबरा गया। जरा सोच अवतारों को तू ही तो कष्ट देता है, नकारता है, ध्यान की
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हे मानव! जरा सोच तो तू कितनी मौज की स्थिति में है। सब गुण खेलता है। हँसता, रोता, लड़ता, झगड़ता और अपने मन की करता ही रहता है। कुछ गड़बड़ हो जाए तो ऊपर वाले को दोष देने से भी नहीं चूकता। पर श्री हरि जो अवतार रूप में मानव होकर धरती पर सारी मानवता को राह दिखाने आते हैं क्या होती है उनकी नियति। विष्णु की यह विडंबना जाने मनु तभी तो कहा है:-
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हे मानव! ज्ञान सीप में छुपा मोती बीनना सीख। जीवन सिर्फ जीकर ही बिता देना नहीं है जीवंत हो जीना है। ज्ञान मार्ग है उस महानतम सत्य सच्चिदानंद, सत् चित् आनन्दस्वरूप को पाने का जो न खुशी है न गम न दुख न सुख न ही अहम् या त्वम्। एक अलौकिक दिव्य अनुभूति सब कुछ जान समझ लेने की, न प्रश्न, न जिज्ञासा, न संशय, न उत्सुकता, बस प्रफुल्लता ही प्रफुल्लता। परा चेतना से जुड़कर
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हे मानव! जान ले कि अब समय आ गया है गीता में कुछ और भी नया जुड़ने का और तूने तो अभी तक गीता को ही पूरा जानकर जीकर उसके अनुभव को नहीं जाना है तो आगे कैसे बढ़ेगी तेरी प्रगति। युग चेतना की वाणी है गीता, न प्रवचन न उदाहरण स्वरूप रोचक कथाएँ। प्रश्नों के सटीक सीधे उत्तर जो श्री कृष्ण ने वेद व शास्त्रानुसार जीवन जीकर उसी के अनुभव के आधार पर दिए
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ऐसा हो बदन कि कृष्ण का मंदिर दिखाई दे, ऐसा हो मन कि कृष्ण ही कृष्ण सुझाई दे हे मानव! आस्था की मान्यता का रहस्य जान। जीवन में आस्था ही सब कुछ है। आस्था अंध-भक्ति का नाम नहीं। आस्था से सदा सब कुछ मंगलमय हो इसके लिए सुपात्र होना ही होगा। सत्य-कर्म व प्रेम के मार्ग पर चलकर ही प्रभु का कृपा पात्र बना जा सकेगा। आस्था रखने के बाद भी बहुतों को प्रभु से
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