मीना ऊँ
हे मानव ! अब यह सत्य भली प्रकार जान-समझ ले कि कलियुग में सच्चिदानंद का सत्य स्वरूप और वेद व विज्ञान का पूर्ण रहस्य जानने के लिए सुपात्र होना ही होगा। कालचक्रानुसार कलिकाल प्रकृति व ब्रह्माण्ड के सारे सत्यों व रहस्यों का महत्व जानने का, झूठ की दुकानें बंद कराने का सारे व्यवधान व अंतराल मिटाने का मानव जीवन का सही उद्देश्य जानने का युग है। यह युग है सारी विषमताओं व दुविधाओं का वैज्ञानिक
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हे मानव ! कलियुग में इन्हीं की महिमा बखान से बेड़ा पार होगा। रावणों का कितना भी बखान कर लो ऊर्जा का हनन ही होता है। रावण व कंस अत्यंत गुणवान, ऐश्वर्यवान, अथाह सैन्यबल प्रधान थे फिर भी उनको महिमामंडित करने की अपेक्षा रामायण में श्रीराम और भागवत में श्रीकृष्ण की छोटी से छोटी बालक्रीड़ा से लेकर उनके महान व्यक्तित्व की सौम्यता, करुणा, कर्त्तव्य परायणता व सत्याचरण के एक-एक क्षण का पूरे विस्तार से वर्णन
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हे मानव ! जीवन अत्यंत सौंदर्यवान है। थोड़ा हँस कर, थोड़ा रो कर कट ही जाता है। पर जब कोई बड़ी परीक्षा की घड़ी सामने आ खड़ी होती है तभी हमारी सच्चाई व अच्छाई दोनों की सच्ची परीक्षा होती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे पढ़ाई की परीक्षा जिन्होंने खूब तैयारी की होती है उनमें एक उमंग-सी होती है। भय भी होता है परंतु व्यथित करने वाला नहीं। जिसकी तैयारी नहीं होती वही भयभीत, व्यथित और
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हे मानव !ये ज्ञान जान, प्रेम और क्रूरता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रकृति का नियम है जैसा देती है वैसा ही ले लेती है। पाँच तत्वों से पुतला रचा अंत में वैसा ही कर अपने में ही मिला लिया। प्रकृति जड़ चेतन सबको एक-सा ही प्रेम करती है अपने ही ध्येय के लिए। उसका ध्येय है सतत् प्रगति और जब इस ध्येय में व्यवधान देखती है तो अपने तांडव, भूचाल, ज्वालामुखी, बाढ़,
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हे मानव ! अब तो जाग, जगा रहा कलियुग का काल। असत्य विनाशिनी प्रकृति का तांडव प्रारम्भ हुआ। बार-बार चेताया, जगाया पर मानव अपने कर्मों की डोर से बंधा प्रकृति नटनी की कठपुतली बना ही रहता है। प्रकृति की न्याय व्यवस्था सर्वोपरि है जो मानव की साधारण बुद्धि से परे है। जब धर्म, समाज, राज्य और न्याय सबकी सारी की सारी व्यवस्थाएँ सत्ता-लोलुपता व स्वार्थ में लिप्त हो अमानवीय स्तर तक उतर आती हैं और
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हे मानव ! आज के युग में पुराने संदर्भों व प्रतीकों को नए परिवेश में समझ कर कैसे उनके सत्य से लाभ उठाया जा सकता है यह जानना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि सभी प्राचीन ग्रंथों के कथ्य व तथ्य मानव के मनोविज्ञान और उसकी शारीरिक, मानसिक व आत्मिक संरचना की प्रक्रियाओं के ज्ञान-विज्ञान को जानकर ही लिपिबद्ध किए गए हैं। यही भारत की महानतम वैदिक संस्कृति का मूल बिंदु है। जिसे आजकल टुकड़ों में भिन्न-भिन्न
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हे मानव ! सुन और ध्यान लगाकर समझ ले यह सच्चाई कि विषाद (डिप्रेशन) कोई बीमारी या व्याधि नहीं है। वैराग्य का सही अर्थ व महत्व जानने के लिए प्रकृति के दिए हुए पठार हैं। मानव के पूरे जीवन में सात से लेकर दस बार तक यह पठार की शिविर की स्थिति अवश्य आती है। इसका अंतराल आठ से बारह साल तक का हो सकता है। वैदिक संस्कृति के आश्रम विभाजन इसी वास्तविकता और मानसिकता
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हे मानव ! शब्द के सार से ही संचालित है समस्त संसार का व्यवहार, इसकी महिमा जानकर जीवन सुधार। एक-एक शब्द में संसार समाया है। एक भावपूर्ण प्रेममय शब्द में असीम शक्ति निहित है। आज विज्ञान भी शब्दों की ध्वनि व भाव से उत्पन्न कम्पन गति (वाइब्रेशन) का सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त होने को मान रहा है। हमारे वैज्ञानिक ऋषियों ने सदियों पहले इसी ऊर्जा का ध्यान द्वारा अनुभव कर मंत्रों की कुंजियाँ हमें प्रदान
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हे मानव ! अवतार को तू पहचानेगा कैसे? क्योंकि अपने मानव होने का भान उसे एक क्षण को भी विस्मृत नहीं होता और प्रत्येक मानव से उसी के गुणानुसार उससे व्यवहार करने में भी अवतार को सदा पूर्णता के विधान का ही ध्यान रहता है। सभी ज्ञानी जनों, गुरुओं के प्रति आदर, बड़ों के प्रति सेवाभाव व अन्य सबके प्रति सौहार्द व निश्छल प्रेम उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति व प्रकृति होती है। सारे सांसारिक व्यवहारों को
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हे मानव ! सृष्टि में कुछ भी खाली नहीं होता। खालीपन जैसी कोई वस्तु- स्थिति है ही नहीं। मानव शरीर कहीं से भी खाली नहीं है। नमी, वाष्प, वायु आदि तत्वों से भरा है जो सृष्टि के ही अंश हैं। जैसे एक घड़े में जब कुछ, आंखों से भरा हुआ दिखता है तो हम कहते हैं कि घड़ा भरा है। जब कुछ दिखाई नहीं देता तो हम उसे खाली कह देते हैं। स्थूल व दृष्टव्य
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