मीना ऊँ

आओ एकजुट होओप्रकाश का अवतरणचैतन्यता के सुप्रभात का वर्षभविष्य का सत्य- समय आ पहुँचा है सच्ची आत्मानुभूति के मार्ग के प्रशस्तीकरण का, मानव सत्ता की वास्तविकता स्थापित करने का, मानवता के धर्म के प्रादुर्भाव का, एकत्व का आनन्द अनुभव करने का।बदलो और बढ़ो- अपने अंदर से ही सत्य का प्रेम का प्रकाश प्रज्वलित करो। सच्चा ज्ञान व विवेक जब तुम अपनी ही आंतरिक सत्य सत्ता से जुड़ते हो तो स्वत: ही झरता है। भूतकाल के
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मैं युगचेतना हूँ, गीता हूँ, सुगीता हूँ वेद हूँ विज्ञान हूँ विधि का विधान हूँ जैसा प्रकृति ने चाहा, वही इंसान हूँ मानस पुत्री प्रकृति की, सर्वोत्कृष्ट कृति प्रकृति की संभवामि युगे-युगे हूँ पूर्ण हूँ पराशक्ति हूँ वही तो हूँ कर्मयोगी हूँ प्रेमयोगी हूँ सत्ययोगी हूँ यही सत्य है यहीं सत्य है उगा सूर्य सत्य का, सतरंगी रास पकड़ ले सत की अनमोल धरोहर, सात घोड़ों के रथ पर सवार करने को प्रकाश प्रसार, उञ्चास
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हे पावन प्रणाम आओ ! भय का वातावरण बना है धर्म कार्य कैसे हो बोलो। ज्ञान-ध्यान-तप नहीं सुहाता है प्रकृति पुत्री अब आँखें खोलो पूजा-पाठ नहीं कर पाते आकर मन को समझा जाओ, हे पावन प्रणाम आओ! उग्रवाद आतंकवाद अब पैर जमाए खड़ा हुआ है। लूटपाट अन्याय चोरी करने में अड़ा हुआ है। स्वाध्याय कैसे कर पाए आकर कोई मार्ग दिखाओ, हे पावन प्रणाम आओ ! उत्तम क्षमा धरें हम कैसे बात-बात में क्रोध सताता।
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हे मानव ! यही है तत्वज्ञान पाने और उत्तम जीवन जीने का महामंत्र। तुझे मानव जीवन क्यों प्राप्त हुआ इसी में छुपा है सारी सृष्टि का भेद। प्रकृति ने मानव को वह सभी गुण प्रदान किए हैं जिनसे दिव्यस्वरूप परमात्मा को जाना जा सके और उनका दर्शन तत्वज्ञान से पाकर धरा को आलोकित किया जा सके पर तू तो अपनी युक्ति-युक्त बुद्धि के फेर में पड़ जाता है। सच्ची प्रार्थना का स्वरूप ही बदल देता
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हे मानव !अवचेतन मन की परतें हटाकर ही उस प्रकाश या नूर के दर्शन होते हैं जो सबमें व्याप्त है और एकत्व जगाने का तत्व है। मानव की प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया जिसका वह कारण नहीं जान पाता वह सब अवचेतन मन से ही संचालित होती हैं। ध्यान-योग को प्राप्त मानव इस सारी प्रक्रिया के प्रति सजग होता है। क्योंकि ध्यान की साधना द्वारा वह अवचेतन मन की प्याज के छिलकों की भांति एक-एक परत खोलकर अंदर
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हे मानव ! उठ और बन एक उत्कृष्ट मानव, जो हो अनन्यावस्था में स्थित। सच्चे मानव मन की प्राकृतिक अवस्था ही सच्चा चमत्कार है। जो इतना सरल अद्भुत व पारदर्शी होता है कि लोग उसे समझ ही नहीं पाते। उनकी दृष्टि उसके आर-पार हो जाती है और वह उसके सत्य से वंचित रह जाते हैं। मानव की सत्यमयी सहज स्थिति में ही प्रभु के संदेश अवतरित होते हैं। यह स्थिति प्राप्त होगी सिर्फ शुद्ध पवित्र,
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हे मानव ! आत्मवान बन। अहम् जरूरतमंद है आत्मा नहीं। अहम् है अपने को वही जानना, मानना तथा विश्वास भी करना जो तुम वास्तव में हो ही नहीं। अहम् का उपयोग उत्थान के लिए आधारभूत शक्ति के रूप में करना है न कि कर्त्तापन के दंभ व अहंकार में। जब प्रमाद, आलस्य, दु:ख, संताप, क्रोध, विषाद, हिंसा आदि स्थितियाँ हम पर हावी रहती हैं तो हम अपनी सहज स्थिति में नहीं रहते। कोई और ‘स्वयं’
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हे मानव ! एक बात ध्यान रख कि आलसी वह ही नहीं है जो काम करना ही नहीं चाहता। आलसी वह भी है जो बेहतर कर सकता है फिर भी न करता है, न करना चाहता है। अपने दिल से पूछ जब तू प्रार्थना करता है तो उसमें भी प्रभु से कुछ अपेक्षा का भाव ही छुपा होता है। कोई और तेरे लिए कुछ कर देगा इस मानसिकता से तू सदियों से ग्रस्त है इसी
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हे मानव ! यह सत्य अब समझा ही जा सकता है कि प्रकृति वह नहीं देती जो तू चाहता है और मांगता है पर वह अवश्य ही देती है जो तुझे चाहिए और तेरे उत्थान के लिए आवश्यक है। ले ध्यान से सुन वृत्तांत तितली का और गुन गहन ज्ञान की बात। एक बंदे को तितली का एक खोल दिखा जो पूर्ण परिपक्व था। थोड़ी देर में उसमें एक छोटा-सा छिद्र हुआ तितली बाहर निकलने
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हे मानव ! ध्यान की साधना द्वारा अपने को उस स्थिति तक लाना है जहाँ सम्पूर्ण सृष्टि की व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने वाली परम चेतना से जुड़कर सारी शंकाओं और दुविधाओं से उबरकर अपना सही अस्तित्व जानना व समझना ही होगा वरना यह प्रश्न कि हम क्यों दु:ख तथा कष्ट पाते हैं, सदा ही हमारे मन को व्यथित करके, हमारे उत्थान को कुंठित करता रहेगा। मानव के कष्टों का निवारण कभी भी एक
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