मीना ऊँ

जागो उठो भारतीयों ! अपनी आत्मा की आवाज़ सुनो!कर्म को तत्पर होओ। विविधता की एकता जानो ! एक तुच्छ सी सेविका मानवता की एक अदना सी बन्दी, ईश्वर अल्लाह की, सभी भारतीयों से कुछ मन की बातें कहती है। यह एक सत्य है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता कि ”भारत में रहने वाला हर बन्दा पहले भारतवासी है बाद में कुछ और।” भारत की हर विरासत हर नियामत उसकी अपनी है। कश्मीर की सुन्दर
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सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तंत्र-यंत्र और मंत्र से ही निबद्ध है। मानव शरीर ब्रह्माण्ड की ही अनुकृति है। तंत्र का अर्थ है दिखाने वाले शरीर के अंदर फैला नाड़ी तंत्र शरीर, मन व आत्मा का आंतरिक स्वरूप। यंत्र का अर्थ है वो वाहन या मशीन-शरीर जो इनको धारण किए हुए जगह-जगह फिराता है कर्मों के हिसाब से। मंत्र व ब्रह्माण्डीय ध्वनि स्पन्दन है जो तंत्र और यंत्र को स्पन्दित करता है, जीवन्त करता है। ऊँ ही वो
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आज के ऐतिहासिक दिवस पर भारत के शरीर को गुलाम बनाने वाली शक्तियों से स्वतंत्रता प्राप्त हुई। पर भारत की आत्मा तो अभी भी उन शक्तियों के भार से दबी हुई है जो कि मानव के अधोपतन व गुंजल का कारण हैं। सत्ता व धन की लोलुपता उत्थान में बाधक हैं क्योंकि सत्य सुयोग्य क्षमताओं को न तो प्रेरित कर आगे लाया जाता है न सहायता की जाती है। अब समय है भारत की आत्मा
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केवल दृष्टामात्र हूँ। युगचेतना से संयुक्त उसी का भाव बीज रोपण करने को तत्पर। भागीदार तभी होती हूँ जब कोई अर्जुन संशय, दुविधा या विषाद काटने या मार्ग सुझाने हेतु प्रश्न करता है। प्रत्येक सत्य, प्रेम व कर्मयोगी की सहयोगी हूँ। आज दृष्टा बन देख रही हूँ संगम होने वाला है प्रयागराज जैसा। युवा पीढ़ी सब जानती है, जान रही है और विकृतियों को दूर करने के लिए गंगा धार है। चिन्तन, समाधान व सही
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चार दल कमल से सहस्रदल कमल तक, मूलाधार से सहस्रार तक के उत्थान की यात्रा पूर्ण करनी है मानव को, इसी कारण मानव जीवन मिला है। यही प्रणाम का कर्म है धर्म है पूर्ण मानव होना, सही मानव होना, प्रकृति ने जैसा बनाया पूर्ण, पवित्र और उत्कृष्ट वैसा ही रहना। परमबोधि ने जिस कारण बनाया उसी की चैतन्यता में रहना ताकि मानव पूर्ण होकर ही पूर्ण में मिले न कि बस पूरा हो जाए, मृत्यु
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हे मानव ! बन इन्सान, एक पूर्ण इन्सान।तू एक इन्सान है, प्रकृति की सर्वोत्तम कृति। अपने इस स्वरूप का कुछ तो मान रख। सदियों से अपनी बुद्धि के फेर में तूने अपना क्या हाल बना लिया है। जरा सोच, अगर तू अपनी बुद्धि से सृष्टि के कार्यों में कमियाँ निकाल कर उन्हें अपने मन के अनुसार चलाने की सोचता तो सृष्टि का क्या हाल होता। तू जो आज जिस मानव स्वरूप में है वह सब
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भारत जागरण अभियान- दूरदर्शिता और विवेक से परिपूर्ण पर्याप्त शब्द लिखे और बोले जा चुके। अब कर्म का समय है। आत्मज्ञान और विवेक की स्वर्णिम भारतीय परम्परा एक वृहद आकार ग्रहण कर चुकी है, इस समृद्ध परम्परा की आधारशिला प्रणाम फाउंडेशन पर भव्य प्रासाद का निर्माण अवश्यम्भावी हो गया है। वास्तव में, अब कर्म की बेला प्रारम्भ हो चुकी है। प्रणाम भारत, भारत के महान आध्यात्मिक मनीषियों व क्रांतिकारी चिन्तकों की युगदृष्टि के मर्म को
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यह सत्य है कि भारत के महान व्यक्तियों का त्याग और देशभक्तों का बलिदान व्यर्थ नहीं जा सकता। इसी सत्य की शक्ति के आधार पर प्रणाम भारत जागरण अभियान का आरम्भ हुआ है! भारत में सभी समस्याओं से उबर कर आने की पूरी शक्ति है। बात है तो बस उस शक्ति से जुड़कर सत्य कर्म करने की। इसमें प्रत्येक कर्म प्रेम व सत्य के रास्ते पर चलने वालों का सहयोग चाहिए। हमें निश्चय करना है
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परा ज्ञान-अपरा ज्ञान से परे जाकर ही पाया जा सकता है और उसे किसी तकनीक में बांधा नहीं जा सकता। परा ज्ञान मानव की सृष्टिï की ब्रह्माण्ड की अनदेखी रचना का ज्ञान है परा ज्ञान ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं, उसकी व्यवस्थाओं, कार्य प्रणालियों का, उसके रहस्यों का तथा जड़-चेतन सभी के अस्तित्व का ज्ञान है यह ज्ञान स्वत: ही सत्यात्मा के अन्तर में तब झरता है जब वो अपने स्थूल अस्तित्व बोध से परे हो जाता है
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रत्नाकर प्रभाकर सुधाकर करे ध्यान उजागर, भरे मन की गागर स्मृति अनन्त सागर, स्मरण की बना मथनी इच्छा की लगा शक्ति बुद्धि की बना डोर, ध्यान का लगा जोर काल का चक्र घुमा पाया अनमोल रत्न ज्ञान का नव निर्माण का, कर्म प्रधान का सत्य विहान का, प्रेम समान का विश्व कल्याण का प्रणाम अभियान का महाप्रयाण की इससे अच्छी तैयारी और क्या होगी पूर्ण होकर ही पूर्ण में विलय होने की पूर्ण हुई ईश्वर
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