मीना ऊँ

हे मानव, अपने को जान। कैसे जानेगा यह तो तभी जान पाएगा जब यह समझेगा कि जानने योग्य क्या है। यही आन्तरिक यात्रा का आरम्भ है जिसका आधार केवल सही ध्यान ही है। अपने शारीरिक मानसिक व आत्मिक अस्तित्व केसत्य का ज्ञान, शारीरिक क्रियाओं मानसिक प्रक्रियाओं और आत्मिक उर्जाओं का ज्ञान, उनका आपसी सम्बन्ध, एक दूसरे पर प्रभाव, उनका ब्रह्माण्ड प्रकृति व वातावरण से सम्बन्ध। यही सब जानने योग्य है इसी हेतु मानव जन्म पाया।
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मैं यहॉं क्यों हूँ क्यों आए हो तुम यहॉं क्यों हो तुम यहॉं यही तो जानना है यही जानने योग्य है सभी उस परम सत्ता-परम चैतन्य सत्ता के कर्ता कारण हैं। सभी उस परम की उर्जा शक्ति से संचालित हैं। उस परम शक्ति की बोधि – of supreme परम बोधि – supreme intelligence जो भली भॉंति जानते हैं कि तुम कितने पावर के बल्ब हो तो उसी हिसाब से उतना ही तुम्हें प्रदान करते हैं
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जो आत्मिक उत्थान चाहता है ‘एक निश्चय वाली बुद्धि से’ वह कोई बिरला ही होता है, प्रकृति का चुनाव होता है। वरना तो सब अर्जुन की भांति अपने-अपने संसारी लक्ष्यों पर ध्यान लगाए किसी ऐसे गुरु की खोज में रहते हैं जो उनका दिल भी बहलाया करे खूब मनोरंजन करे और शान्ति भी दे। उससे कुछ विशेष अपेक्षा भी न रखे वो ही अपने गुरु से सब अपेक्षाएँ रखें। पहला, पुराना दिया हुआ गुण, पाठ
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आत्मिक शक्ति ही शान्ति का आधार है, सतत् साधना ही मुक्ति का द्वार है। एक सत्यमय आत्मवान अपनी युगानुसार प्राप्त दूरदृष्टि Vision, हेतु ही जीवन जीता है और समयानुसार मृत्यु का भी वरण कर लेता है। पर उसकी उस सत्यमयी दूरदृष्टि के उद्यम व पुरुषार्थ का उसके शरीर केसाथ अन्त नहीं हो जाता। उसके शरीरान्त के उपरांत वह दूरदृष्टि हज़ारों आकारों में अवतरित होती है और उसके द्वारा धारण ध्येय को आगे बढ़ाने हेतु यह
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इस अद्भुत सत्य को किस प्रकार विद्रूपता का आवरण डालकर गरमागरम बेचने योग्य पदार्थ बनाया जा सकता है, इसका प्रमाण मिला जब कुछ वर्ष पहले अर्धनारीश्वर रूप, Androgyne, पुस्तक विमोचन के बारे में व उस पुस्तक के कुछ उद्धृत अंशों को पढ़ा। जिससे पुस्तक का आशय समझा कुछ हद तक। ऐसा लगा कि भारत की सर्वोच्च वेद-संस्कृति की धज्जियाँ उड़ाने में पाश्चात्य सभ्यता की कुछ कुरीतियों में आकंठ डूबे अधकचरे बुद्धिजीवी सतही व ओछे प्रचार
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विज्ञान के उत्थान ने निसंदेह जीवन को अत्यंत सुविधाजनक बनाया है। सम्पर्कों, सूचनाओं और प्रसारों को नए-नए आयाम दिए हैं। बहुत से साधन जुटा दिए हैं पर साथ-साथ कुछ समस्याएं भी खड़ी कर दीं हैं। प्रत्येक वस्तु के विवेकशील उपयोग से सहायता मिलती है और अंधाधुंध विवेकहीन उपयोग से या अनुकरण से हानि की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं। इसके लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि केवल भौतिकता या भोगवाद ही मानव के सौंदर्यमय
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आज के युग की समस्याओं से जूझने वाले जुझारू मानवों का नितान्त अभाव। सब ओर आरामतलबी और उदासीनता-सी छाई है कि हमें क्या हमारा काम हो जाए भाड़ में। केवल बौद्धिकता से उछाले शब्दों व वाद-विवाद से प्रत्येक विसंगति को उचित ठहराने में ही कुशलता मानी जा रही है। कलियुग में सबकी बुद्धियों का इतना विकास हो गया है कि समस्याएँ तो खूब गिना सकते हैं। स्वयंसेवी संस्थान, NGO, बनाकर सेमीनार, Seminar, गोष्ठियाँ प्रदर्शन आदि
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अहम् है जो तुम हो अपने को वही जानना और मानना तथा विश्वास भी करना। अहम् का उपयोग उत्थान के लिए आधारभूत शक्ति में करना है न कि कर्तापन के दम्भ व अहंकार में। जब प्रमाद आलस्य दुख संताप क्रोध विषाद हिंसा आदि स्थितियाँ हम पर हावी रहती हैैं तब हम अपनी स्वाभाविक स्थिति में नहीं रहते, कोई और स्व हमारे स्वयं के सत्य और दिव्यता के बीच होता है। यही कोई और स्व ही
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तुम यहाँ क्यों हो? मैं यहाँ क्यों हूँ? क्यों आए हो तुम यहाँ? यही तो जानना है जानने योग्य है। हम सभी उस परम चैतन्य सत्ता के कर्ता कारण हैं। सभी उसी परम की ऊर्जा शक्ति से संचालित हैं। उस परम शक्ति की परम बोधि, Supreme Intelligence, यह अच्छी तरह जानती है कि तुम कितनी पावर के बल्व हो इसलिए उतनी ही ऊर्जा तुम्हें प्रदान करती है जितनी तुम्हारे शरीर यंत्र के लिए ठीक है
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भारत के परम श्रेष्ठ गौरव को पुन: स्थापित करने के लिए प्रणाम प्रतिष्ठान का प्रणाम अभियान कटिबद्ध है और इसी दिशा की ओर अग्रसर है।भारत की संस्कृति – सत्यम् शिवम् सुन्दरम्भारत की भाषा – देवनागरी लिपि में संस्कृत, हिंदी व अन्य भारतीय भाषाएँभारत का ज्ञान – वेद उपनिषद् गीता निहित आत्मज्ञानभारत का विवेक – सर्वोच्च परम सत्ता की चेतना से योग स्थित होकर, संयुक्त होकर सही समय पर सही ज्ञान पाकर पूर्ण पुरुषार्थ से कर्मरत
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