मीना ऊँ
हे मानव !हम सब मानव हैं केवल मानव। हमें मानव बनना है, दूसरे मानवों के साथ कैसा व्यवहार करना है यह ज्ञात होना चाहिए। हमें यह अनुभव करना है कि हम सभी एक ही स्रोत से उपजे हैं और पांच तत्वों से बने हैं। धरती जल वायु अग्नि और आकाश। हमें अपने अंदर इन्हीं पांच तत्वों के गुणों को सींचना व विकसित करना चमकाना सुधारना व परिष्कृत करना है। उदाहरण स्वरूप-पृथ्वी का गुण है धैर्य,
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मन की शक्ति अपरम्पार चले प्रकाश गति से भी तेज। प्रकाश से अधिक प्रकाशवान। करे तन-मन प्रकाशित। क्षणांश में तय कर आए भूत और भविष्य का अन्तहीन सफर। सृष्टि के प्रारम्भ से सृष्टि के अंत तक पहुंच जाए पलक झपकते ही। सदा गतिवान मन को यदि मिल जाए सही दिशा तो कुछ भी असम्भव नहीं। मन की शक्तियों का महत्व वही समझ सकता है जिसने यह अनुभव पाया हो, मन की शक्ति को पहचाना हो।
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अपने प्रत्येक भाव विचार व कर्म को अनन्य भक्ति व पूर्ण आस्था सहित परम सत्ता को समर्पण ही ब्रह्माण्डीय युगचेतना से संयुक्त होने का पूर्ण योग होने का मार्ग है। ऐसा योग जहां मानव शरीर सभी शक्तियों ज्ञानियों ऋषियों मुनियों वैज्ञानिकों युगदृष्टाओं अपने-अपने युग के सभी उन्नत व उत्कृष्ट ज्ञान विचार व उद्देश्य को मूर्तरूप देने का माध्यम बन जाता है। सभी ज्ञानों के पार जाने में सक्षम होता है बुद्धि की सीमितता से परे
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मानव जो भी कल्पना करता है वह सत्य ही होती है। मानव में कल्पनाशक्ति ब्रह्माण्ड, सृष्टि, की दी हुई है और मानव ब्रह्माण्ड की ही अनुकृति है ‘यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे’ यह भी सत्य ही है। जो भी कल्पना में आ जाता है वो या तो घटित हो चुका होता है या घटित हो रहा होता है या कहीं घटने वाली घटना की पूर्व सूचना होता है। कल्पना को बखान पाना या उनका रहस्य जान
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अगला-पिछला सब दिमाग से निकालकर जो भी परिस्थितियाँ व कर्म सामने हों उसे पूरे मनोयोग व पूरी शारीरिक व मानसिक क्षमताओं से पूजा की तरह, तपस्या की तरह करने में ही निस्तार है। जो भी कर्म प्रकृति ने स्वत: ही सामने ला खड़ा किया है उसी से कर्म कटने का विधान, प्रकृति का विज्ञान व नियम होता है। उसे नकारने या बचने के उपाय ढूँढ़ने में समय नहीं गंवाना होता। जितनी श्रद्धा से उससे गुजरोगे
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जीवन बहुत सौन्दर्यमय है जब तक आराम से चलता रहता है थोड़ा हँसकर, थोड़ा रोकर पर जब कोई बड़ी परीक्षा सामने आ खड़ी होती है तब हमारी अच्छाई और सच्चाई दोनों की परीक्षा होती है। पर जैसे पढ़ाई की परीक्षा आने पर क्या होता है जिन्होंने खूब तैयारी की होती है उनके अन्दर एक उमंग-सी रहती है। हाँ, भय-सा भी होता तो है मगर वो व्यथित करने वाला नहीं होता और जिनकी तैयारी ठीक नहीं
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समय की युगचेतना कलमबद्ध करवा रही है, फिर भी लोग क्यों नहीं समझ पा रहे या समझना ही नहीं चाहते या समझ कर भी अनजान बनते हैं। एक ही उत्तर है- अकेली ही तो है युगचेतना भी अकेला ही तो लगा रहा भागीरथ। प्रत्येक मानव जो क्षण की युगचेतना से संयुक्त, योग स्थित हो जाता है वह तो अकेला ही चल पड़ता है। युगचेतना जानती है कब उसका संदेश रंग लाएगा। इस कारण उन्नत मानवों
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शरीर यहाँ धरती पर छोड़ वही सम्पूर्ण सृष्टि में विचरण कर सकता है जिसने इस शरीर-मन-बुद्धि के सभी सम्पूर्ण गुणों को पुराने कपड़ों की तरह उतार फेंका हो।शरीर भाव से एकदम निर्लिप्त, विहीन सभी संवेदनाओं, भावनाओं से परे ही परे हो गया हो वो ही परे जा सकता है। शव होकर तो सभी परे जा पाते हैं पर अंतर ये है कि परे जाकर फिर इस शरीर में लौट नहीं पाते। पर सत्य समाधिस्थ मानव
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गीता को कहते हैं कि स्वयं भगवान के मुख से निकली वाणी है। यह सत्य इसलिए है कि उसमें न तो प्रवचन है न कोई उदाहरण है न कोई रुचिकर कहानियाँ। बस प्रश्नों के सीधे-सीधे सटीक उत्तर हैं जो श्रीकृष्ण ने जि़न्दगी से सीखकर बताए हैं। वो जि़न्दगी जो वेदों व उपनिषदों के ज्ञान पर आधारित थी। तो आज सबको समझना जरूरी है कि अगर गीता के अनुसार जीवन जिया जाए तभी तो कुछ और
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गीता को कहते हैं कि स्वयं भगवान के मुख से निकली वाणी है। यह सत्य इसलिए है कि उसमें न तो प्रवचन है न कोई उदाहरण है न कोई रुचिकर कहानियाँ। बस प्रश्नों के सीधे-सीधे सटीक उत्तर हैं जो श्रीकृष्ण ने जि़न्दगी से सीखकर बताए हैं। वो जि़न्दगी जो वेदों व उपनिषदों के ज्ञान पर आधारित थी। तो आज सबको समझना जरूरी है कि अगर गीता के अनुसार जीवन जिया जाए तभी तो कुछ और
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