मीना ऊँ

सच्चे और वास्तविक युगदृष्टा या युग प्रवर्तक जो पूर्णता उत्थान व रूपांतरण की गति को दिशा व दशा देने आते हैं वो कभी भी एक जैसे नहीं होते न ही दोहराए जाते हैं। उनके शरीर छोड़ने के बाद उनका ‘भाव’ और अधिक उन्नत होकर नया रूप लेकर अवतरित होता है जिसे मानव फिर नहीं समझ पाते क्योंकि वो बीत गई छवि को या मन में बनाई किसी छवि विशेष को ही चिपके रहते हैं और
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अपनी ही ज्ञान ध्यान चिन्तन मनन की सतत् साधना से यदि आप सत्य को जान व समझ गए हैं तो पहले तो एक वाक्य सुनने को मिलेगा कि आप तो बहुत पहुंचे हुए हैं। समझ नहीं आता कि व्यंग्य है या प्रशंसा। उस पर हर ऐरा गैरा सबूत माँगता है और यदि आपने कुछ सबूत दे भी दिया तो वो भी आपको माने या न माने उसकी मर्जी। सबूत मांगने वाले यह नहीं समझते कि
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बेचो बेचो सब कुछ बेचो जो भी हत्थे चढ़े बस बेचोबिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता बन गया जो व्यवसाय वो खेल नहीं हो सकता एक समय गुलाम बिका करते थे। अभी भी लड़के लड़कियों की खरीद फरोख्त की बातें सुनाई पड़ती ही रहती हैं। पर बुद्धिजीवियों ने कभी भी इसे उचित नहीं ठहराया। सदा मानव अधिकारों का हनन व समाज का कोढ़ बताया। इतने आलोचक व समाजसेवियों के जत्थे होने पर भी
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”प्रकृति के नित्य निरन्तर सर्वव्यापक नियमों के सत्य पर आधारित” हे मानव ! प्राकृतिक अनुकम्पा व सम्पदा से खिलवाड़ बन्द कर। मानव धर्म है प्राकृतिक सम्पदाओं को संवारना निखारना और सौन्दर्यमय बना कर मानव कल्याण के लिए उपयोगी बनाना न कि अपने क्षणिक स्वार्थी आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उजाड़ना। प्रणाम मीना ऊँ मानसपुत्री प्रकृति की, गत कई वर्षों से चेता रही है। जाग ओ मानव! प्रकृति से तारतम्य व संतुलन बना। उसके उत्थान
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प्राचीन भारतीय धरोहर रामसेतु की रक्षा हेतु आत्मबली नेतृत्व चाहिए न कि राजनीतिकरण, केवल प्रचार से ही काम नहीं बनता। दृढ़निश्चय शक्ति व कर्मठता चाहिए। सत्यता, कर्म और प्रेम की शक्तिस्रोत है व सत्यज्ञान-प्रकाश का निरन्तर निर्झर है। इन चारों -सत्य कर्म प्रेम प्रकाश में से जो एक मार्ग में भी पूर्णतया स्थित होता है उसकी ओर प्रकृति अपनी न्याय व्यवस्था स्थापित करने के लिए शक्ति प्रवाहित करती है। जो अपना आराम व राजभवनों जैसा
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सर्वशक्तिमान के समक्ष सम्पूर्ण समर्पण भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है। इस प्रकार की भक्ति में भक्त हर स्थिति एवं परिस्थिति को ईश्वर के प्रसाद स्वरूप ग्रहण करता है। इसका तात्पर्य है – अपनी शारीरिक मानसिक व आत्मिक शक्तियों को एकाग्र कर इन शक्तियों का उपयोग प्रत्येक क्षण को पूर्णता से जीने में करना। यहाँ आध्यात्मिकता का अर्थ है – कोई भी कार्य सही दशा व पूर्ण विश्वास के साथ करना। कोई भी स्थिति या परिस्थिति
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जब हम अपने ऊपर आध्यात्मिक रूप से कार्य करते हैं तो हमारी संवेदनशीलता भी बढ़ने लगती है या यूँ कहें आध्यात्मिक मानव की संवेदनाएँ भी विकसित होती हैं क्योंकि संवेदनशीलता के चरमोत्कृष्टता से ही तो प्रभु प्राप्ति की अनुभूति होनी होती है। सत्य आत्मानुभूति के पथ का लक्ष्य ही है कि मानव जीव को अपनी सभी संवेदनाओं, क्षमताओं और बोधगम्यताओं का अधिकतम विकास-संवेदनशीलता को चरम अवस्था- परम अवस्था तक पहुँचाने के मार्ग में अनेकों तपस्याओं
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यही सत्य है कि जो सोचो वही बोलो और करो भी, मनसा-वाचा-कर्मणा पूर्णरूपेण सत्य होओ। इसका अर्थ यह तो कदापि नहीं कि यह तो करो ही, साथ-साथ कुछ और इसके अतिरिक्त भी बोलते रहो। जब मनसा-वाचा-कर्मणा सत्य हो जाते हैं तो प्रतिपल वाणी से केवल सत्य ही उच्चरित होता है-निर्भीक सत्य। कथा-प्रवचनों को नकारना नहीं है पर सोचो जरा कथा-कहानियों का सत्य कौन जानता है! केवल पढ़ा-सुना ज्ञान मात्र है। पूर्ण सत्य तो केवल जीकर
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स्पष्टता व पारदर्शिता व्यक्ति की चेतना के विकास को दर्शाती है। यह मनुष्य की प्रगतिशीलता गहराई श्रेष्ठता विस्तार एवं एकाग्रता को विकसित करती है। यह मस्तिष्क शरीर और जीवन के सभी बंधनों को काटने से ही आती है। इसमें तभी वृद्धि होती है जब हम अपने अहम् के मकड़जाल से बाहर आते हैं और आत्म-प्रकाश के अनुभव लेना आरम्भ करते हैं। जब हम संसार में आत्मा की इच्छा व उद्देश्य को अनुभव करते हैं और
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कोई भी विद्या जब तकनीक बन जाए और सब बिना विशेष प्रयत्न किए प्रयोग करने लगें, मनचाहे ढंग से उसका उपयोग करने लगें, विशेषकर स्वार्थी या व्यवसायी मनोवृति के हिसाब से तो उसका प्रभाव बहुत कम हो जाता है। जिस विधि से किसी को कुछ प्राप्ति होती है यदि वो उसे ही तकनीक बनाकर सिखाने लगे तो उससे कुछ भी प्राप्ति नहीं होने वाली। इसलिए यह अतिआवश्यक है कि पहले सुपात्र बना जाए फिर तकनीक
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