मीना ऊँ

आजकल कई संस्थान सनातन धर्म के सत्य ज्ञान और विज्ञान की रक्षा व विश्वस्तरीय स्थापना का तथाकथित प्रयत्न कर रहे हैं। अच्छी बात है पर यह प्रयत्न करने वाले पहले इस शाश्वत सनातन धर्म के सत्य व वैज्ञानिक नियमों को जानें, समझें और उसी के अनुसार जीएँ तभी तो बात बनेगी। सत्य सनातन धर्म की स्थापना हेतु पूर्णतया सत्य होना ही वो आत्मबल व शक्ति देगा जो इस संकल्प के लिए अपेक्षित है। पहली बात
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अब प्रकृति का तांडव अवश्यम्भावी है क्योंकि मानव तीर्थाटन व पर्यटन का भेद भूल गया है। तीर्थाटन प्रकृति के सन्निकट होकर उसकी विराटता व संवेदनशीलता को, विचारों व सांसारी भावों से रहित होकर, अनुभव कर आत्मसात् करने की प्रक्रिया है। सारे तनावों और भारों से मुक्त होकर अपने स्रोत के आनन्द को अनुभव करना है। कम से कम शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ केवल प्रकृति को ही पीना है जीना है। समाचार मिला लेह
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जागो भारतीयों ! महाकाल का तांडव प्रारम्भ हुआ। बार-बार चेताया-जगाया पर मानव अपने कर्मों की डोर से बँधा प्रकृति नटनी की कठपुतली बना ही रहता है। प्रकृति का न्याय सर्वोपरि है जो मानव बुद्धि से परे है। सब कर्मों का चक्र फल यहीं पूरा होता है यही है सत्य। पर इस चक्र के जंगली स्वरूप को सुव्यवस्थित करने हेतु मानव को बुद्धि दी गई। जिससे अच्छी समाज व्यवस्था, सच्ची न्याय व्यवस्था और नीति-युक्त राजव्यवस्था का
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आज ज्ञान इधर-उधर से ली गई जानकारी, कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा के बारे में होता है। इसमें उधार लिए हुए शब्द, बने-बनाए मंच और वैसे ही बनावटी श्रोतागण होते हैं। निष्क्रिय और कर्महीन दर्शक ही तो चाहिए बस ज्ञान का क्रियाकर्म करने हेतु। आज मुझे एक ऐसे ही गोष्ठी में जाने का अवसर मिला। मैं यह सोचकर वहाँ गई कि कुछ नया या क्रांतिकारी विचार सुनने को मिलेगा। लेकिन… मानव निष्कर्षों में फँसा
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ये सब मानव को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने को रचे गए थे। आज भी जब कोई कष्ट पाता है, या गरीब है तो उसे तसल्ली देने को कह देते हैं कि भई पूर्वजन्म का फल है जो भोग रहे हो। यदि सुखी है, अमीर है तो भी यही जवाब है कि पूर्वजन्म में अच्छे कर्म किए होंगे उसी का फल है। न कोई पूर्वजन्म है न होगा। मरने के बाद भी
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जब जिज्ञासुओं के प्रश्नों के उत्तर नहीं बन पड़ते या नहीं कह पाते तो कह देते हैं कि पिछले जन्मों के कर्मफल हैं। कोई अमीर घर में पैदा क्यों होता है, कोई गरीब घर में पैदा क्यों होता है, जीव की उत्पति अपने अनुकूल वंशानुगत वातावरण में होती है। नाली का कीड़ा नाली में ही बच्चा पैदा करेगा। इसमें पिछले कर्मों को दोष देना व्यर्थ है। वैसे भी हम भारतीयों का राष्ट्रीय चरित्र बन गया
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यह सत्य तो सभी जानते हैं, स्वीकारते भी हैं कि कोई भी मार्ग अपनाओ सभी परमात्मा तक पहुँचते हैं। पर यह सत्य समझने की चेष्टा कोई नहीं करता कि प्रत्येक मार्ग की अपनी साधना है जो व्यक्तिगत पुरुषार्थ पर निर्भर है। व्यक्ति यह तत्व भुलाकर अपने मार्ग को उत्तम बताने और जताने के फेर में स्वयं भी अपने धार्मिक मार्ग के कर्मकाण्डों क्रियाकलापों और दिखावटी प्रदर्शनों की भूल-भुलैया में जीवनभर फँसा रहता है। अपने-अपने मार्ग
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दक्षिण भारत यात्रा के अंश : भाग – 3 कन्याकुमारी होटल की खिड़की से बाहर दिखाई दे रहा है सागर का विस्तार ही विस्तार। हिन्द महासागर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का संगम। हल्की-हल्की लहरें, सूर्य की किरणें, उन्हें छूकर अठखेलियाँ करती हुई शान्त ठहरी हुई। अथाह जलराशि ध्यान में लीन बदलाव की तैयारी जैसी शान्त नि:शब्दता। श्री विवेकानन्द स्मारक व गांधी मंडपम में जाने का मन नहीं हुआ। पिछली शाम चक्कर लगा ही
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दक्षिण भारत यात्रा के अंश : भाग-2 मन में बहुत उमंग थी श्री माँ और श्री अरविन्द जी की तपोभूमि व कर्मस्थली पांडुचेरी को दुबारा सोलह साल बाद देखने की। क्योंकि उनके सपनों की नगरी ओरोविलियन की भी बहुत चर्चा सुनाई देती रही है। समाधि दर्शन से जो अनुभूति सोलह साल पहले हुई थी उसकी याद भी पुलक जगा रही थी । पर ओरोविलयन पहुँचने पर वहाँ कुछ भी ऐसा नहीं पाया जो श्री माँ
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आजकल चारों ओर से और सभी प्रचार माध्यमों से आतंकवाद शब्द की गूँज सुनाई देती रहती है। यहाँ हमला हुआ वहाँ बम फूटा कहीं आक्रान्तों का आक्रमण,कहीं आपसी सिरफुटौव्वल जिधर देखो हिंसा का तांडव। जिनकी सारी सूचनाएँ बहुतायत से मिलती ही रहती हैं। जिस आतंकवाद का विरोध या प्रतिकार होता है कुछ मुठभेडें होती हैं वहाँ तो पता लग ही जाता है कि आतंकवाद है, घुसपैठ है, वहाँ सुरक्षा भी कड़ी की जाती है क्योंकि
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