मीना ऊँ

हे मानव !तू प्रकृति बचाने की, पर्यावरण संवर्धन की बड़ी-बड़ी बातें करता है। वातानुकूलित कमरों में अपार धन फूंककर गोष्ठियों और सभाओं का आयोजन करने का दिखावा खूब कर रहा है। इन सेमीनारों का प्रदूषण कौन सम्भालेगा! बौद्धिक कचरा, खाने-पीने की व्यवस्था का कूड़़ा और कितने ही कागज फू ल-मालाएँ, दुनियाभर का तामझाम और माइक्रोफोन का शोर-शराबा। जितनी बड़ी पद-पदवियाँ, जितनी ऊँची पहुँच उतना ही बड़ा सेमीनार। इन सबसेे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं
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हे मानव ! शान्ति वो नहीं है जो प्रमाद है आलस्य है अकर्मण्यता है या अज्ञान की वो निद्रा जिसमें अपना सत्य भुला दिया जाए। चारों ओर से बेखबर अचैतन्य, अपनी कर्महीनता में निमग्न, आत्मा की आवाज़ से अनजान, बेपरवाह और ढीठपन की हद तक सुस्ती-सी व्यापी रहे जिसे तुम भूल से मस्ती-सी भी मान लेते हो। सच्ची शान्ति वो है जो परमशक्ति का स्रोत है, आन्तरिक जागृति का प्रमाण है, अन्धकार की समस्त सीमाओं
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हरिओउम् तत्सत्हे मानव!अब समय आया है चैतन्यता एवं जागरूकता पर काम करने का। चैतन्यता की पहचान है अपने अन्दर झांककर बिल्कुल शून्य होकर आवाज सुनो बाह्य चैतन्यता से मुक्त होकर। अभी मन, बुद्घि, चैतन्यता की आवाज में अन्तर करना मानव भूल गया है। सदियों से सोई हुई आत्मा की आवाज (युग चेतना की आवाज) को जगाने की साधना का समय प्रारम्भ हो गया है। जब आप पूर्णतया शान्त हैं अर्थात निर्लिप्त होकर अर्न्ततम् स्थिति तक
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स्मृति अनंत सागर स्मरण की बना मथनी बुद्धि की बना काल का चक्र घुमा पाया अनमोल रत्न ज्ञान का मानव विधान का अवचेतन मन की परतें हटाकर ही उस प्रकाश या नूर के दर्शन होते हैं जो सब में व्याप्त है और एकत्व जगाने का तत्व है। मानव की प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया जिसका वो कारण नहीं जान पाता वो सब अवचेतन मन से ही संचालित होती है। ध्यान योग को प्राप्त मानव इस सारी प्रक्रिया के
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पोथियाँ पढ़-पढक़र नीति विशेषज्ञ बने और जि़न्दगी भर उसी की कमाई पर जीने वाले, जि़न्दगी की सत्यता को कभी समझ न पाए और शायद कभी जि़न्दगी के सत्य से, जि़न्दगी की सही नीति से उनका सामना भी हुआ तो ओढ़ी हुई व्यापारिक बुद्धि वाली नीतियों और युक्तियों से कभी भी कोई मुकदमा नहीं हारते। दुनियावी अदालत में किसी भी सत्य को बहस कर आप सत्य बना भी दें तो भी असत्य तो असत्य ही रहेगा।
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एक ऐसे संवेदनशील हृदय की जो सबसे नि:स्वार्थ प्रेम करे ऐसे सुंदर हाथों की जो सबकी श्रद्धा से सेवा करें ऐसे सशक्त पगों की जो सब तक प्रसन्नता से पहुँचें ऐसे खुले मन की जो सब प्राणियों को सत्यता से अपनाए ऐसी मुक्त आत्मा की जो आनन्द से सब में लीन हो जाए जो जड़-चेतन सब में एकाकार हो समस्त सृष्टिï में लीन हो जाए स्तुति ओ प्रभु! मुझे दृढ़ता, साहस व शक्ति दो सद्ïविचारों
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भारत में जितने भी देवी-देवता हैं वो सब अपने आप में कुछ संदेश लिए हुए हैं। अपने आप में पूरी पुस्तक हैं। उनकी प्रार्थनाओं में उनके चरित्र-चित्रण में सबमें एक संदेश है पर लोगों ने उनकी मूर्तियों को और सुन्दर बनाने मालाएं चढ़ाने में पूजा करने में घंटियां बजा-बजा कर, दीया अगरबत्ती जलाने को ही बस धर्म बना लिया। मैं इनका विरोध नहीं करती पर सही अर्थों में तभी पूजा मानी जायेगी जब हम उस
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सत्यता से व योग्यता से हमेशा लोगों को भय लगता है व घबराहट होती है। जब तक योग्यता व सत्य को सही सम्मान व स्थान नहीं देंगे लोग व देने का उद्यम नहीं सीखेंगे तब तक वो प्रकृति के काम में दखल देने वाले असुर ही रहेंगे। जो क्षमता व योग्यता किसी व्यक्ति विशेष को मिली वो प्रकृति का ही चुनाव है। लोग यह सत्य नहीं जानते चाहे वो कितने ही विद्वान गुणी व धनवान
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मेरे तो गिरधर गोपाल…दूसरो न कोई… सच्चा गुरु वही है जो सच्चा शिक्षक हो। जो ऐसा कुछ सिखलाए जो जीवन को उन्नत बनाए मानव होने का गौरव समझाए और उसका रास्ता बताए। न कि गुरुपद हथियाने के गुर सिखाए गुरुपन झाड़ने की युक्तियां सुझाए। सही और सच्चा गुरु उदाहरण होता है कि मानव को अपना जीवन कैसे सार्थक बनाना है। पूर्णता से जीना है अपना जीवन उत्सव बनाकर अपने चारों ओर प्रफुल्लता फैला प्रसारित कर
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सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि जब पराशक्ति मानवों को अपने ही बनाए हुए चक्रव्यूहों से निकालकर किसी महान उद्देश्य की ओर इंगित व अग्रसर करने के लिए सत् संकल्प किसी एक उन्नत मानव के अन्तर, inner being, में प्रस्फुटित करती है तो भावानुसार वैसे ही कुछ मानवों को भी अवश्य ही तैयार कर लेती है जो स्वेच्छा से स्वत: ही योगदान को तत्पर होते हैं। जो परमबोधिनी शक्ति सत्य को अवतरित करती है वो
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