मीना ऊँ
व्यक्तिगत सारी दुविधाओं से ऊपर उठकर कुछ भी मेरा अपना है ही नहीं दिव्य चेतना ही मूर्तरूप में परिलक्षित हो रही है… मेरा या तेरा कुछ भी नहीं योग है दिव्यता से एकत्व मैं परम का यंत्र हूँ, माध्यम हूँ अपने आत्म तत्व आत्मिक ऊर्जा और मूल प्रकृति में स्थित सिर्फ वो ही देख पाएंगे जिनके लिए आत्मानुभूति समय व्यतीत करने का एक साधन नहीं आत्मानुभूति कोई फैशन या मनोरंजन की वस्तु नहीं जिसमें तुम
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चेतना को जानना व अनुभव करना इसके लिए ब्रह्माण्डीय सोच वाला होना ही होता है। यह पूर्वीय पक्ष है, पूर्व का विश्वास है। भारत में लोग आत्मज्ञानी होने की आकांक्षा करते हैं। ब्रह्माण्डीय जीवन शक्ति जो सर्व विद्यमान, सर्व ज्ञानवान व सर्व शक्तिमान है उसे जानकर उसी में विलय होना ही मानव जीवन को पूर्णता देना है। यही पूर्वीय पक्ष है।पाश्चात्य देशों में मस्तिष्क को जीतने की आकांक्षा है। मस्तिष्क को जानना मानसिक शक्ति और
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मैं मेरा मन मेरा खुदा मेरी आत्मा और मेरी तन्हाई एक ही तो हैं खुदा और खुदाई सारी खुदाई में मैं और मेरी तन्हाई यही तन्हाई मन भाई कन्हाई यही है सच्चाई यहीं है सच्चाई मैं मेरा मन मेरा खुदा मेरी आत्मा और मेरी तन्हाई मैं पाँच ही हूँ मैं अकेली अकेली कहाँ हूँ सारी खुदाई में मैं और मेरी तन्हाई यही तन्हाई मन भाई यही है सच्चाई – यहीं है सच्चाई प्रणाम मीना ऊँ
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जब तक इंसान दूसरे इंसानों से ऊर्जा लेकर काम चलाएगा, शक्ति लेगा उसके दुखों का अन्त नहीं होगा क्योंकि इंसान से ऊर्जा लेने पर उसके कर्मों का बोझा भी ढोना पड़ता है। जब मनुष्य दूसरे से ऊर्जा लेता है तो बंधता है जब अपने आप ब्रह्माण्ड से ऊर्जा लेता है किसी और पर निर्भर नहीं होता ऊर्जा के लिए, तो मुक्त होता है स्वतंत्र होता है। स्वतंत्र होना बंधन मुक्त होना ही मानव की नियति
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