मीना ऊँ

हे मानव! मत कर छीना-झपटी मत बन जा कपटी। भय रौब या लालच दिखाकर चतुराई से कुछ भी हथिया लेना कभी भी कल्याणकारी हो ही नहीं सकता। कागज की नाव कितने दिन चलेगी। गुरु दक्षिणा के नाम पर एकलव्य का अंगूठा ही मांग लेने वाले और अधर्म के पक्षधर सभी गुरुओं, आचार्यों की महाभारत युद्ध में क्या गति हुई सभी जानते हैं। एक ओर तो तू स्वर्गिक शान्ति व आनन्द चाहता है, दूसरी ओर भ्रष्टाचार
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हे मानव! यह सत्य धर्म जानसंसार में सब कुछ नश्वर है क्षणिक है। उत्पन्न होना, पूर्णता पाना, कुछ और उत्पन्न करना, प्रकट करना और अन्तत: लुप्त हो जाना। सब देखा-समझा व अनुभव भी किया जा सकता है। इस नश्वर संसार से परे एक और संसार है। जिसका आभास व ज्ञान केवल सनातन धर्म में पूर्णतया स्थित, स्थितप्रज्ञ आत्मवान मानव को होता है। इस ज्ञान का रहस्योद्घाटन व सत्य स्थापन सर्वोन्नत आत्मज्ञानी ही कर पाता है।
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ओ मानव ! तू प्रभु के मन वाला हो जा। यही तो परम की इच्छा है पर तू तो प्रभुता प्राप्त – गुणयुक्त – मानव को भी अपने हिसाब से ही चलाना चाहता है। प्रभुता को अपने मन या अपनी ही युक्ति-युक्त बुद्धि से चलाने वाले या पकड़ने वाले मानव के जीवन से प्रभु फिसल जाते हैं, निकल जाते हैं। गीता में श्रीकृष्ण का वचन है, ‘तू मेरे मन वाला हो जा’। यह तो मीन
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हे मानव ! कहां ढूंढ़ता है तू स्वर्ग। बड़ी प्रबल है तेरी स्वर्ग की इच्छा चाहे मर के मिले बस पाना ही है। तेरे काल्पनिक स्वर्गसम जीवन से अपेक्षाओं की कमी नहीं। एक दिवास्वप्न जैसी भ्रमित करने वाली मृगमरीचिका। अरे प्रभु ने तुझे वह सब क्षमताएं प्रदान की हैं जिससे तू अपने व अपने सम्पर्क में आने वाले सभी जीवों के लिए स्वर्गसम वातावरण उत्पन्न कर सकता है। अपना स्वर्ग आप बना सकता है तो
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हे मानव ! अपने को व अपने स्वभाव को जानकर अपने ऊपर काम करने की तपस्या कर यही सच्ची साधना है। बचपन से ही कुछ आदतें स्वभाव रूप में ढल जाती हैं और जाने-अनजाने ही मानव इसी स्वभाव के अनुसार अपने सम्पर्क में आने वालों के साथ व्यवहार करता है। इसका प्रभाव क्या होगा इसका उसे तनिक भी भान नहीं हो पाता। अधिकतर इन आदतों और इन संस्कारों का कारण माता-पिता और सम्पर्क में आने
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हे मानव !आत्म-मंथन कर महामंथन प्रारम्भ हो चुका है। सम्पूर्ण सृष्टि के महासागर में भयंकर उथल-पुथल मची है। मानव के रूपान्तरण का समय आ ही पहुँचा है। सच और झूठ की खोज में सदियों से भटक-भटक कर अब मानव इतना तो समझ ही गया है कि सत्य को उसे अपना अंतर्मन मथ-मथ कर ही खोजना है। सत्य की वास्तविकता तक पहुँचना है। जो प्रभुता का बीज तेरे अंदर सोया हुआ है जिसमें प्रभु होने की
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हे मानव !सारी समस्याओं की जड़ है कलुषित, स्वार्थी मानसिकता और अकल्याणकारी अशुभ भाव। जुगाड़ व तकनीक से अपना स्वार्थ साधने की कला में पारंगत होने को ही मानव ने समझदारी व विवेक समझ लिया है। इस सबको सुधारने हेतु सत्यमय कर्मठ और ज्ञानमय विवेकी उदाहरण स्वरूप सही मानव का संग व दिशा निर्देश चाहिए न कि विकृत नेतागीरी, दंभपूर्ण लंबे-लंबे प्रवचन या धन दौलत के नशे में चूर, खरीदारों की भीड़ और बिकने वालों
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हे मानव !ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण व्यवस्था का सम्पूर्णता से संचालन प्रकृति के शाश्वत नियमों द्वारा ही हो रहा है। इन नियमों के विपरीत जाकर अपने कर्मों और भाग्य को दोष देना बन्द कर। सारी सृष्टि के साथ लयमान लयात्मक व गतिमान होने हेतु दिव्य प्रकृति के नियमानुसार चलना ही होगा। यही सच्चा धर्म है। जो दिव्यता और प्रभु की ओर ले जाएगा। प्रभु बना प्रभु से मिलाएगा। सृष्टि की गणना में ही पूर्ण ज्ञान समाया
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हे मानव !ऊर्जा का सत्यमय खेल पहचान उसका ज्ञान विज्ञान व प्रभाव जानकर अपने ऊपर काम कर। सत्य पवित्र और शक्तिमान ऊर्जा की उसके आभामंडल की तो तुझे खूब पहचान हो गई है, पर उसके साथ न्याय कैसे करना है यह भी तो जान, इसका सटीक विधान भी तो समझ। ”ऊँ” ब्रह्माण्डीय नाद से एकत्व का, ”गायत्री” मंत्र का व ग्रहों नक्षत्रीय ऊर्जाओं व शक्तियों के आह्वान के मंत्रों के स्पन्दनों का वो महती तत्व
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अपने आप से कुछ बातहे मानव! प्रणाम में बहुत लोग आते हैं सुनते हैं गुनते हैं। कुछ लोग तो सालों से साथ हैं सीखते हैं समझते हैं बार-बार प्रश्न करते ही रहते हैं। बहुत अच्छा है। प्रणाम में उनका विश्वास भी है, आसपास रहते हैं, पूरी ऊर्जा लेते हैं। अपना काम सांसारी भी करते हैं, प्रणाम का भी कार्य करते रहते हैं। खूब ज्ञान-ध्यान लेते हैं बुद्धियों की तुष्टि, बुद्धि विलास में रमते ही रहते
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