मीना ऊँ
हे सनातन मानव ! तू कहां खो गया है इतनी गिरावट-अधोगति कि मानव त्राहि त्राहि कर रहा है मानवता घुट घुट कर दम तोड़ रही है। क्या ये पढ़े लिखे लोग हैं इनकी शिक्षा दीक्षा कहां की है। भाषणों का स्तर केवल अपनी ही आत्म प्रशंसा और बाकी सबकी भर्तसना पर ही ठकर गया है क्या कोई ऐसा आत्मवान-शक्तिमान मानव बचा ही नहीं भारत में जो उठे और इन महामूर्ख भ्रष्टाचारी नेताओं को ठिकाने लगा
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आज का ध्यान : मूलरूप ज्ञान – वास्तविक ज्ञानReal Original Gyan जो ज्ञान ध्यान में प्राप्त होता है उसी का प्रसार ही मानव को उत्थान व ख्याति के उच्चतम स्तरों तक पहुंचाता है। मानव जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करता है। संसार से सीखा जाना अभ्यास किया गया ज्ञान व्यवसायिक दृष्टिकोण से अच्छा सिद्ध हो सकता है। परंतु मानव के आध्यात्मिक उत्थान के लिए या मानव को उत्कृष्टता प्रदान कर उत्थान की चरम सीमा तक ले
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हरि ऊँ हरि रविवार : 14-11-2021चारों दिशाओं से धरती पर त्रासदियों से त्रस्त मानव दया व कृपा हेतु कर रहा प्रभु से करुण पुकार… मंगलवार 20-7-2021 देवशयनी एकादशी पर 4 मास के लिए विश्राम पर जाने से पहले श्री विष्णु ने चेताया :- श्री विष्णु उवाच हे मानव ! क्यों कर रहा करुण पुकार दया करो हे ! कृपा निधान तेरी कुबुद्घि का अब होना ही है निदान पांच हजार पांच सौ साल हो गए
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मानव ने अपने अस्तित्व का एक चक्र, सरल पवित्र शुद्घ आत्मवान और वास्तविक होने से लेकर चालाक पाखंडी धूर्त हेराफेरी और बुद्घि की जोड़ तोड़ से काम निकालने वाला होने तक का, पूर्ण कर लिया है। यह अनुभूत किए बिना कि इसमें उसने मानव जीव की प्राकृतिक उत्थान प्रक्रिया को कितना मलिन कर दिया है। वो मानव जिसे प्रकाश का ज्योतिर्मय पुंज, दिव्यता परिलक्षित करने वाला होना था वो मात्र बुद्घि की चतुराइयों और समायोजनाओं
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कलियुग में पार लगाने के सर्वोत्कृष्ट साधन सत्य प्रेम व कर्म है और सर्वोत्तम साधना है ज्ञान भक्ति और कर्म की। कर्म दोनों में है एक में आन्तरिक धर्म और एक में बाह्य कर्त्तव्य कर्म। सत्य निर्भय बनाता है प्रेम निर्मल करता है और कर्म पुरुषार्थ का मार्ग प्रशस्त करता है। सत्य प्रेम व कर्म की पूर्णता से वो ज्ञान जागृत होता है जो समस्त अज्ञान रूपी अंधकार को काट कर उस प्रकाश से प्रकाशित
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इतने सारे बुद्घिमान मानव होते हुए भी विश्व विवेकहीन महामूर्खों की बस्ती बन कर रह गया है। एक ओर महामारी कोविड-19 कोरोना से लड़ने हेतु अंधाधुंध व्यय कर रहा है। सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त कर आधी अधूरी व्यवस्थाएं कर रहा है। उनको बचाने हेतु जिनका कि शायद मानव समाज देश और विश्व हित में कोई भी योगदान न हो। दूसरी ओर अपरिमित धन व्यय कर रहा है युद्घ के लिए आयुधों पर उनको मारने के लिए
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हे मानव ! तू बहुत ही चतुर हो गया है।ऊर्जा कैसे ली जाए खूब जान गया है पर उसका समुचित व्यय और उसका हिसाब-किताब रखना एकदम भूल ही गया है। धन-दौलत केहिसाब में खूब पक्का होता जा रहा है वो दौलत जो शान्ति व सन्तुष्टि कभी नहीं खरीद सकती। संसार से बुद्धि से कमाया धन बुद्धि के अनुसार व्यय किया जा सकता है। पर प्रकृति से स्वत: प्राप्त ऊर्जा या जो प्रेम सहयोग व सहायता
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हे मानव ! कलियुग में तूने अपनी बुद्धि का इतना विकास कर लिया है कि अपनी सब प्रकार की सुख-सुविधाओं के लिए अनेकों उपकरणों का आविष्कार किया और उन्हें अपनी इच्छानुसार प्रयोग कर अपनी ही अहम्तुष्टि कर रहा है। वैज्ञानिक और आर्थिक विकास तो ऊर्ध्वगति को प्राप्त हुए पर मानव मूल्य अधोगति को। मानव प्रकृति पर विजय पाने के सपने देख रहा है मंगल और चाँद पर भी नगर बसाने की संभावनाएँ खोज रहा है।
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मेरा पूर्ण अस्तित्व मानव के उत्तरोत्तर विकास और भारत के भविष्य को सुदृढ़ करने हेतु कर्मरत है। भारत के गौरव के पुर्नस्थापन के लिए सही पृष्ठभूमि तैयार करने की सतत् साधना का ही परिणाम है प्रणाम अभियान। मेरा सब कुछ लिखना, स्वाध्याय, ध्यान, प्रणाम योग कक्षाएँ लेना, लोगों से सम्पर्क करना, हीलिंग-वेदना हरण स्पर्श देना व सिखाना, परामर्श करना, भारतीय सनातन सत्यधर्मिता से सब को अवगत करना। सभी प्रकार के माध्यमों से भारतीय व अन्य
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प्रणाम अभियान विगत कई वर्षों से इसी उद्देश्य के लिए कर्मरत है और निरंतर आह्वान कर रहा है कि कलियुग में केवल जागरूकता ध्यान व कर्म, आंतरिक व बाह्य दोनों ही, पार लगाएंगे। जागरूक होना है व चैतन्य रहना है उन सभी घटनाओं और विधाओं के प्रति जो प्रकृति विश्व देश व मानव के स्तर पर घटित हो रही हैं। सब कुछ परम बोधि-सुप्रीम इंटेलिजेन्स की सुनियोजित और सुनिश्चित व्यवस्था व अटूट कड़ी के परिणाम
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