मीना ऊँ

हे मानव ! ध्यान से सुन आज की गाथा, ज्ञान का फैलाव न चाहे विधाता। थोड़ा ज्ञान, जीया हुआ ज्ञान ही मुक्त कर जाता। तू सदा एक ही रट लगाता है कि मुक्ति कैसे हो, कैसे मोक्ष प्राप्त हो? तो जान ले, बहुत कठिन नहीं यह काम। इसी शरीर में तू मुक्ति पाकर सदा आनन्द का अनुभव कर सकता है। भूल जा सब कुछ अगला- पिछला जन्म, दुख-सुख की प्रतीति, कर्मबंधनों की रीति। पिछले कर्मों
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हे मानव ! मुझे शरीर रूप से कहीं जाना नहीं होता किसी वाद-विवाद का भागीदार नहीं होना होता। श्रीकृष्ण ने बताया भी और जीवन की तपस्या से सिखाया भी कि मैं केवल दृष्टा हूँ। सत्य का सारथी मात्र हूँ। द्वापर में शारीरिक रूप से सारथी बनना ही कर्मगति की पूर्णता थी अर्जुन सरीखे साथी सखा के हेतु। अब कलियुग तक आते-आते युगचेतना का इतना विकास तो हो ही गया है कि मानसिक सारथी बनकर भी
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हे मानव ! पूर्णता की सच्ची साधना प्रत्येक पल को सम्पूर्णता से जीने में ही निहित है। सच्ची साधना वही है कि जो भी कार्य आपको प्रभु कृपा से प्राप्त हो गया उसे ही अपनी पूरी शारीरिक व मानसिक क्षमताओं से निभाना और पूर्णता की ओर ले जाना। पूरे मनोयोग से किया गया कार्य ही बड़ाई व प्रभुता पाता है। जब भी कोई नया आविष्कार या कार्य सम्पन्न होता है तो वो इसी बात का
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हे मानव ! ज्ञान का महत्व व सच्चाई जानकर अपने ऊपर काम करके ही सत्य को जाना जा सकता है। आज तक का जितना भी ज्ञान ध्यान धरती पर अवतरित हुआ है वो जाना जा चुका है। जो कि थोड़ा-थोड़ा प्रत्येक मानव ने अपनी-अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं व उत्थान के हिसाब से प्राप्त कर लिया या चुन लिया और उसी को अपनी बुद्धि में कैद कर उसी का चिन्तन मनन कर उसे ही सब कुछ और
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हे मानव ! ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण व्यवस्था का पूर्णता व सम्पूर्णता से संचालन प्रकृति के शाश्वत नियमों द्वारा ही हो रहा है। इन नियमों के विपरीत जाकर अपने कर्मों और भाग्य को दोष देना बन्द कर। प्रकृति के नियम जानकर उनका धर्मपूर्वक पालन ही दिव्यता की ओर अग्रसर करेगा। सारी सृष्टि के साथ लयमान लयात्मक व गतिमान होने हेतु ब्रह्माण्ड के शाश्वत नियमों पर आधारित सत्य सनातन धर्मिता का पालन ही सच्चा धर्म है। जो
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ओ मानव ! आज तुझे प्रभु का एक और गुण बताती हूँ। ध्यान से सुन… वैसे तो वो सभी काम चुटकियों में कर सकते हैं। पर जब तू कर्ता बनता है तो कहते हैं कर ले बच्चू अपने आप और जब तुझसे नहीं हो पाता तो कहते हैं मज़ा चख अपने कर्तापन ढोने का और जब तू बिना काम किए बिना कर्ता बने कहता है कि हे प्रभु तुम्हीं कर दो तो कहते हैं कि
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हे मानव ! एकात्म भाव से अनुभूत हो सभी यहां एक-दूसरे के पूरक ही तो हैं। एक-दूसरे को पूर्णता की ओर अग्रसर करने के माध्यम ही तो हैं। यहां सभी एक-दूसरे के कर्म धुलवाने, कटवाने या परिष्कृत कराने ही आए हैं। सभी को परमबोधि की सटीक सम्पूर्ण व्यवस्था में कुछ न कुछ कर्म निर्धारित कर सौंप कर ही भेजा गया है। जो कि ब्रह्मा विष्णु महेश, प्रतीकात्मकता, कृतित्व पूर्णता व संहार के लिए विशेषतया चुने
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”अब समाप्त होना है विद्रूपता व कुरूपता का वीभत्स खेल” हे मानव ! तू तो अब इंसान भी नहीं रहा। अब वो समय आ पहुँचा है जब यह ध्यान करना ही होगा कि इंसान अब इंसान क्यों नहीं रहा। इंसान केवल ”मैं” होकर रह गया है। कोई स्वार्थहीन प्रेममय सच्चे बोल या अच्छे हाव-भाव शोभापूर्ण भाव-भंगिमाएँ दिखाई ही नहीं देतीं। हर तरफ यही सोच है- मुझे क्या नहीं मिला मुझे पूछा नहीं मैं बोर हुआ
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हे मानव ! बहुत हो चुका भिन्न-भिन्न धर्मों का खेल, अब मानवता के धर्म की बारी है। मानव मानवता और प्रकृति, इन्सान इन्सानियत और कुदरत की शाश्वत न्याय-व्यवस्था, इतना-सा ही तो खेल है और तू सदियों से किन-किन चक्रव्यूहों में घूम रहा है, अब तो मकड़जाल से बाहर निकल। निकलना ही होगा असत्य चाहे अपनी पूरी शक्ति लगा ले, सत्य का सूर्य उदय होगा ही। धर्मों कर्मकाण्डों व पूजा-अर्चना पद्धतियों का कार्य है एक सही
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हे मानव ! इतने सारे बुद्घिमान मानव होते हुए भी विश्व विवेकहीन महामूर्खों की बस्ती बन कर रह गया है। एक ओर महामारी कोविड-19 कोरोना से लड़ने हेतु अंधाधुंध व्यय कर रहा है। सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त कर आधी अधूरी व्यवस्थाएं कर रहा है। उनको बचाने हेतु जिनका कि शायद मानव समाज देश और विश्व हित में कोई भी योगदान न हो। दूसरी ओर अपरिमित धन व्यय कर रहा है युद्घ के लिए आयुधों पर उनको
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