मीना ऊँ
हे मानव! तू असफलता के भय से त्रस्त होकर पहले से ही पक्का इन्तजाम कर सफलता ही चाहता है। किताबी तकनीकी ज्ञान, प्रचुर मात्रा में धन व अन्य प्रकार के साधनों की इच्छा रखता है। शारीरिक स्वास्थ्य व बनावटी और दिखावटी, बढ़ा हुआ ऊँचा जीवन स्तर कायम रखने के लिए। वो जीवन स्तर जिसकी कोई सीमा रेखा है ही नहीं नित नया मापदण्ड। इसी उधेड़बुन के तनाव व समय के साथ भाग न पाने के
आगे पढ़ें
हे मानव ! पूरे मनोयोग से किया नित्य कर्म संसार धर्म का कर्म और कर्त्तव्य कर्म, जो सदा परम सत्ता को पूजा अर्चना की तरह फलेच्छा रहित हो समर्पित किया जाए वही निष्काम कर्म है। निर्मल पवित्र शुद्ध कर्म है कर्म बंधन काटने का मर्म है। कर्म बंधन निष्काम कर्म से ही कटते हैं। सम्पूर्ण भक्ति भाव से परम चेतना को अर्पित कर्म, यज्ञ समान है, उच्चकोटि के तप समान है जिससे मानव का सम्पूर्ण
आगे पढ़ें
हे मानव ! पहले सत्य धर्म तो जान, धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो यह नारा लगाने वालों ने जाने अनजाने ही मानवता व सत्य धर्म का काफी अनिष्ट कर दिया है। लोग सच्चा धर्म क्या है यह भूल ही गए हैं। ”नाश” किसी का भी करने वाले या इसकी गुहार लगाने वाले हम कौन? आश्चर्य तो तब होता है जब बड़े-बड़े ज्ञानी ध्यानी गुणी मानव इन शब्दों का प्रयोग करते हैं। यह
आगे पढ़ें
हे मानव ! सच्चे गुरु और सही नेता के गुण जान। सच्चे गुरु और सही नेता वर्णरहित और वर्गरहित होते हैं। सच्चे युगदृष्टा का, सच्चे मार्गदर्शक का व सच्चे गुरु का न तो कोई वर्ण होता है न ही वर्ग-‘न होय वर्ग न होय वर्ण सांचा गुरु सोई’ न ब्राह्मण न क्षत्रिय न वैश्य न शूद्र कोई भी वर्ण नहीं। न बुद्ध न हिन्दू न सिख न मुसलमान न ईसाई न कोई सम्प्रदाय न कोई
आगे पढ़ें
हे मानव ! ध्यान से जान यह ज्ञान कि मानव क्या से क्या हो गया है। हर पल यही ध्यान कर रहा है कि मुझे क्या मिल सकता है और मुझे क्या नहीं मिला। जो भी स्थिति या व्यक्ति जीवन में आ जाए तो उससे क्या-क्या लाभ उठाया जा सकता है। यहां तक कि गुरुओं और स्वामियों से भी क्या मिलेगा यही मानसिकता रहती है। आशीर्वाद मिल जाए, मकान दूकान ठीक हो जाए, सम्बन्ध ठीक
आगे पढ़ें
हे मानव ! वेदों का व शास्त्रों का सर्वोत्तम व सर्वश्रेष्ठ ज्ञान यही है कि प्रत्येक मानव के हृदय में ही परम निर्देशक व परम गुरु छुपा हुआ है। वो ही सारा अज्ञान व अंधकार काट कर स्वयं से साक्षात्कार कराकर जीवन को प्रकाश से भर देता है। सब सत्य प्रेम कर्म व प्रकाश के बारे में पढ़ने व सुनने से जान तो लेते हैं ज्ञान भी प्राप्त कर लेते हैं पर इस माना मार्ग
आगे पढ़ें
हे मानव ! जान यह ज्ञान विज्ञान। सम्पूर्ण धरा प्रकृति की एक प्रयोगशाला ही तो है। मानव पुतला है और प्रकृति अन्तरिक्षीय परम बोधि-वैज्ञानिक, Cosmic Supreme Intelligence – Scientist, की कारण कर्ता है। जिसे सबसे अच्छा निष्कर्ष ही चाहिए। सत्यम शिवम सुंदरम चाहिए। एक सर्वोत्कृष्ट रोबोट या अंतरिक्ष यान की भांति मानव अपने होने न होने का व उत्थान की सभी संभावनाएं धरती पर खोजने आया है। परमस्रोत की प्राणशक्ति से संचालित व निर्देशित प्रकृति
आगे पढ़ें
हे मानव! तुझे मूरत बना भगवान बहुत ही भाता है क्योंकि वो तुझे तेरा सत्य नहीं बता पाता है। केवल तुझे रिझाने को साज सिंगार कर निश्चेष्ट बैठा रहता है और श्रृंगार के लिए भी तेरी कृपा का मोहताज रहता है। प्रणाम मीना कोई मंदिर में गढ़ी निस्सहाय भगवान की मूरत नहीं जो भक्तों के चरण कमलों की प्रतीक्षा में द्वार पर आँखें गड़ाए रहे। जब तुम्हारी मर्जी या तुम्हारी जरूरत हो फल-फूल पत्र प्रसाद
आगे पढ़ें
हे मानव ! अब समय आया है चैतन्यता एवं जागरूकता पर काम करने का। चेतना की पहचान है अपने अन्दर झांककर बिल्कुल शून्य होकर आवाज़ सुनो बाह्य चैतन्यता से मुक्त होकर। अभी मन बुद्धि चैतन्यता की आवाज़ में अन्तर करना मानव भूल गया है। सदियों से सोई हुई आत्मा की आवाज़,युग चेतना की आवाज़ को जगाने की साधना का समय अब प्रारम्भ हो गया है। जब आप पूर्णतया शान्त हैं अर्थात निर्लिप्त होकर अन्तर्तम् स्थिति
आगे पढ़ें
हम अपने जीवन में सुख दुख की बातें करते हैं। आत्मा- परमात्मा मोक्ष आदि की बातें करते हैं। कभी इनके वास्तविक अर्थ की तलाश नहीं करते जरा पता तो लगाएँकि दुख आखिर क्या है। हमारे वेद पुराणों में ”दुख” शब्द का कोई भी उल्लेख नहीं मिलता है। वहाँ तो केवल एक ही नियम का उल्लेख है- कोई गलती हुई है तो उसका पश्चाताप करो। पश्चाताप का तरीका है ”तप”। तप यानी बुद्धि शरीर व मन
आगे पढ़ें
