मीना ऊँ
मनु मेरे लिखने का नाम मेरे अंतर के लेखक का नाम मनु मेरे अंतर की आत्मानुभूति का नाम मीना…’ मेरे सांसारिक संबोधन का नाम मीनाजी यही है मीना ऊँ मीना ऊँ अनुभूति योग अनेक अव्यवस्थाओं को व्यवस्थित रखने की चेतना का नाम ही मीना है जो पूर्णता का नित्य प्रवाह है शान्त क्रियाशील व सत्य समर्थ है शिक्षा वेद की ब्रह्माण्ड ज्ञान की औ’ प्रकृति के विधान की स्वयं युग चेतना की परम कृपा से
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आओ मिलकर करें सृजन जान लो सब आया संदेशा माई का जो सुनेंगे पाएँगे जीवन का दर्शन ज्ञान ध्यान वेद विज्ञान सत्य प्रेम औ’ कर्म का महामंत्र जो देगा शक्ति अनंत करने को स्थापित प्रकृति का सत्य मानव का कृत्य इस धरा पर सुखदां वरदां शस्य श्यामला वसुंधरा पर ‘या किसी से कुछ सीखो या किसी को कुछ सिखाओ यही जीवन का ज्ञान है’ सत्य के पाँच तत्व पूर्ण प्रणव प्रमाण प्रत्यक्ष प्रणाम यही सत्य
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रत्नाकर प्रभाकर सुधाकर करे ध्यान उजागर भरे मन की गागर स्मृति अनन्त सागर, स्मरण की बना मथनी इच्छा की लगा शक्ति बुद्धि की बना डोर, ध्यान का लगा जोर काल का चक्र घुमा पाया अनमोल रत्न ज्ञान का नव निर्माण का कर्म प्रधान का सत्य विहान का प्रेम समान का विश्व कल्याण का प्रणाम अभियान का महाप्रयाण की इससे अच्छी तैयारी और क्या होगी। पूर्ण होकर ही पूर्ण में विलय होने की। पूर्ण हुई ईश्वर
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ओ प्रभु मुझे दृढ़ता साहस व शक्ति दो सद्विचारों व सत्य दूरदर्शिता को कर्म में बदलने की एक ऐसी अद्भुत क्षमता दो जो जड़ चेतन सबमें एकाकार हो समस्त सृष्टि में लीन हो जाए जो सब मानव मस्तिष्कों का भाव एक कर सत्य प्रेम व प्रकाश के द्वारा शांति और आनन्द के प्रसार का सर्वत्र जन अभियान चला दे…!! प्रणाम मीना ऊँ
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हे मानव ! मेरा ईश्वर, आकाश वायु अग्नि जल व पृथ्वी समान सत्य है। प्रकृति समान जीवन्त और गतिमान है। आचार्य गुरु ऋषि ज्ञानी मानव जिस ईश्वर से भय खाते हैं डरते डराते हैं वह ईश्वर नहीं है। वह तो ब्रह्माण्ड समान अन्तहीन है प्रारम्भहीन है पूरी सृष्टि का स्रोत है आधार है। तर्क केवल खण्डन कर नकारात्मकता उपजाता है। मैं परम इच्छाशक्ति हूँ …ऊँ परम जिज्ञासा हूँ …ऊँ परम प्रेम हूँ ..ऊँ परम सत्य
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अन्तरिक्ष के ज्ञान पर ब्रह्माण्ड के विज्ञान पर युगों की पहचान पर कालचक्र के विधान पर समय का हस्ताक्षर है प्रणाम प्रकृति के नियमाचार पर मानव के प्राकार पर अवतार के आकार पर भाव के प्रसार पर समय का हस्ताक्षर है प्रणाम स्वरों के नाद पर रेखाओं के प्रभाव पर रंगों के आभास पर शब्दों के प्रसाद पर समय का हस्ताक्षर है प्रणाम वेदों के न्यास पर व्यास के विन्यास पर बोधि के विस्तार पर
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प्रणाम धरा पर प्रकाश स्रोत है सत्य का आवाहन है कर्म का प्रोत्साहन है प्रेम का वाहन है सरस्वती का वचन है लक्ष्मी का वंदन है पूर्णता का सृजन है अपूर्णता का विसर्जन है प्रणाम धरा पर प्रकाश स्रोत है मानव उत्कृष्टता का उदाहरण है मानव आनन्द का कारण है व्याधियों का निवारण है मुक्तता का पर्यावरण है प्रणाम धरा पर प्रकाश स्रोत है देवी-देवताओं का अवतरण है मानव रूप में रूपान्तरण है इसी देह
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हे मानव ! अब इनका मर्म जानकर इन पर ध्यान लगाकर कर्म करने का समय आ ही पहुँचा है। पिछले कुछ दशकों से शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत काम हो रहा है। लगभग सभी वैज्ञानिक व आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धतियों द्वारा शरीर मन व बुद्धि को संयत स्वस्थ व सकारात्मक रखने का अथक प्रयास हुआ है। लेखन व अन्य प्रचार माध्यमों से भी इनसे सम्बन्धित सभी जानकारियाँ व सूचनाएँ उपलब्ध कराई गईं हैं। लगभग सभी
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हे मानव ! तू केवल मैं होकर रह गया है। मुझे क्या मिलेगा मुझे क्या नहीं मिला मुझे पूछा नहीं मैं बोर हुआ मुझे अच्छा नहीं लगा मेरा क्या होगा आदि-आदि। इस मैं मैं को मुझसे क्या-क्या दिया जा सकता है क्या-क्या अर्पण हो सकता है इसमें बदल। अपने अवचेतन मन में और स्वार्थी बुद्धि में एकत्रित अनर्गल अनर्थक व निरर्थक शब्दों स्मृति चिन्हों चित्रों और रूढ़िवादी मान्यताओं को मिटा डाल। शब्द शक्ति प्राप्ति हेतु
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हे मानव! तू किसे पूजता है तेरा आराध्य या ईष्ट कौन है। किसे याद करता है किसे फूल-पत्र, भोग व प्रसाद चढ़ाता है। कहाँ मुसीबत में भेंट प्रार्थना व अर्चना करता है भजन कीर्तन करता है। तू जिसके लिए यह सब करता है और गर्व से कहता है कि मैं तो अमुक-अमुक को गुरु मानता हूँ, अमुक-अमुक देवी देवताओं का भक्त हूँतो फिर तेरा समर्पण पूर्ण क्यों नहीं है। क्यों इधर-उधर भागता है कि तेरी
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