मीना ऊँ
कोई भी किसी को रास्ता नहीं बता सकता। कोई भी किसी को सही रास्ते पर नहीं चला सकता। हाँ, रास्ता बता सकता है और रास्ते भी कई हैं। सैकड़ों ज्ञानी ध्यानी अवतारी बता गए। क्या दुनिया में दुख-दर्द दूर हो गए। प्रणाम का माना मार्ग सत्य जानने वाला ही सत्य समझ पाता है पूर्ण सत्यमति सत्यगति सद्गति की मति और अनुभूति की पूर्णता का कालजयी युगचेतना द्वारा मान्य मार्ग माना मार्ग जो सनातन है शाश्वत
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दस द्वार मानव शरीर के जो नजर आते हैं कुंजी के – जिनकी व्याख्या बहुत – आकार के – है शास्त्रों में सब जानते हैं – पर एक द्वार जहाँ से दिव्यता आती है, शरीर में समाती है और तन-मन-मस्तिष्क इस सम्पूर्ण शरीर को माध्यम बना अपनी दिव्यता से मानवता को उत्थान का रास्ता दिखाती है वह द्वार कभी नहीं बखाना गया। इसी द्वार से ब्रह्माण्ड से नाता जुड़ता है। ब्रह्माण्ड स्वयं पढ़ाते हैं ज्ञान
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उस पर व्यय करो जो सुपात्र हो ! अब सुपात्र कौन है यही जानना-समझना ही ज्ञान है सही मानव उन्नत मानव आपको सामने वालों को स्वत: ही अपने समकक्ष कर लेता है। यही सत्संग माहात्म है। कौन गुरु कौन शिष्य सब छलावा है एकतरफा रास्ता नहीं। कौन लेता है कौन देता है सब माध्यम हैं। अपनी-अपनी सीढ़ी पर खड़े ब्रह्मïज्ञानी को ब्रह्मज्ञानी स्वत: ही पहचान लेता है। तुम जिस सीढ़ी पर पहुँच गए हो जहाँ
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धर्म तो एक ही है इंसानियतपूर्णता लाती है – आनन्दअपूर्णता लाती है – तपस्या, तपदोनों का ही काम है सात ग्रहों, सात चक्रों की सातों ऊर्जाओं के संतुलन से ही पूर्ण शारीरिक मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की प्राप्ति हो पूर्णता की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। कृतित्व पूर्णता व अपूर्णता का विनाश विवेक से ही उत्थान का मार्ग है। कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं केवल पूर्णता और अपूर्णता है। पूर्णता से परमानन्द की
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जीवन के ज्ञान से अनभिज्ञ होना भी अज्ञान है। अपने आपको ज्ञानी समझने वाला जानने वाला सबसे बड़ा अज्ञानी हो जाता है। ज्ञान को विज्ञान से जानने वाला ही वेद होता है। उसे जीने वाला संवेद होता है। संवेद से पूर्ण संवेदनाओं का मर्मज्ञ होता है। प्रकृति की संवेदनशीलता से जुड़कर प्रकृति रूप हो जीवन्त होता है। यही है तत्व ज्ञान। यही है जीवन का सरलतम और गहनतम रहस्य। सत्य सरलतम है यदि स्वयं सत्य
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प्रत्येक युग का सूत्राधार इसी पावन भूमि से हुआ हुआ था और होगा ही यही सत्य है मानवता मानव ही सत्य है मैं सत्य की विनम्र अन्वेषी हूँ मानवता की अदना-सी सेवक मैं जानती हूँ सत्य क्या है मैं सत्य हूँ सत्य मेरे साथ है सत्य मैं हूँ सत्य ही मैं हूँ मैं गीता हूँ गीता ही मैं हूँ जागो लोगों! जगत की बीती काली रात। मंगलमय नववर्ष का आया नवल प्रभात॥ गीता मय हूँ
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रे मानव! कुछ भी रचनात्मक कर आत्मतुष्टि के लिए व्यापारिक दृष्टिकोण से कुछ रचा गया पूजा नहीं है कुछ भी करो संगीत कला मूर्तिकला चित्रकला सब नित्य नया सौन्दर्यमय कुछ कर और अर्पण कर उस परम को श्रीकृष्ण सम्पूर्ण पुरुष कहाए जगत गुरु कहाए 16 कला सम्पूर्ण हुए कुछ कर ना, रचना शुरू तो कर रे मानव! प्रभु को अर्पण कर अपनी कृति को नित्य उत्कृष्टïता की ओर ले जा। अपना आलोचक स्वयं बन। जरा-सा
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मानव ही मानव का सबसे बड़ा साथी भी दुश्मन भी देव भी असुर भी शिवजी के गण प्रतीकात्मकता शिव- पुरुष के चारों ओर रहने वाले गण मानस मानव ही भिन्न रूपों में देवता पुरुष भी राक्षस जैसे वीभत्स रूप भी गले में मुंडमाला राख सींग दांत सब भयानक सब प्रतीक मानव के हृदय की कलुषता भयावह उद्वेगों के प्रतीक!! असुर और देव गुण अवगुण और सभी विपरीत सृष्टि के आरम्भ से थे सदा हैं और
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आत्म ज्ञान ब्रह्म ज्ञान कुछ भी पाप नहीं पुण्य नहीं झूठ नहीं सच नहीं बुरा नहीं अच्छा नहीं साफ नहीं गंदा नहीं यही है तत्व ज्ञान भगवान नहीं शैतान नहीं बस पूर्णता – अपूर्णता ही है जो भी है उसका दूसरा पहलू छुपा हुआ अनछुआ हुआ देख लेना समझ लेना ज्ञान है। इस अनछुए छुपे हुए पहलू में ही जि़न्दगी की पूर्णता छुपी हुई है यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ
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