मीना ऊँ

दीया जलाना ही काम है मेराकाम है मेरा प्रभु द्वारा सौंपा गया। करूँ दूर अँधियारा पर मैं कौन हँ दूर करने वाली !तेल बाती सब तो है तेरे अन्दर हे मानव ! ज्योति जला भी दी मैंने प्रभु आज्ञा से, तो भी उसे निरन्तर जलाए रखने के लिए जतन तो तेरा अपना ही होगा न ज्योति निरंतर जलती रहे तो विषय विकारों की आँधियों से बचाना, ज्ञान ध्यान का तेल डालकर दीया बुझने न देने
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उस परम शक्ति स्रोत को अन्तरमन से धन्यवाद। जिसने कृपा कर सही माध्यम स्वत: ही पहुँचा दिए और तंत्र ज्ञान दिया।श्री शिव चरणों में ज्ञान योगी प्रणाम ध्यान योगी धन्य हुई प्रभु महायोगी जो स्वयं जय शिव शंकर स्वयंभू हैंश्री शिव सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के तंत्र ज्ञानी योगेश्वर तपीश्वर रक्षक संहारक ने मुझे माध्यम बना लिया अपने तत्व ज्ञानतंत्र ज्ञान और प्रकाश बाँटने के लिए स्वत: ही संयोग जुड़ा दिए इससे अच्छा फल और क्या होगा
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ज्ञान विज्ञान का परा और अपरा का मैं पवित्र चेतन आनन्द हूँ सृष्टि का अनन्त नृत्य मैं कृष्ण हूँ यह अहम् नहीं है जैसे श्रीकृष्ण ने गीता में कहा – ‘मेरे पास आओ। मैं समग्र हूँ, मैं पूर्ण हूँ। सर्वव्यापी चेतना का स्वरूप हूँ परम चेतना का प्रवक्ता हूँ प्रणाम मीना ऊँ
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4 वेद – ऋगवेद, सामवेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद 6 वेदांग – – शिक्षा विद्या- व्याकरण – छन्द- निरुक्त- कल्प – ज्योतिष 4 मीमांसा- न्याय, पूर्ण, धर्म, शास्त्र 4 अर्थशास्त्र- धनुर्वेद, गंधर्ववेद, आयुर्वेद अंतिम चार का सम्बन्ध धर्म से नहीं है पर ये ज्ञान के गढ़ होने के योग्य हैं। विज्ञान और ज्ञान यह दर्शाते हैं, कैसे एक अनंत अपार ऊर्जा स्रोत असंख्य तथा भिन्न पदार्थों में रूपांतरित हो एक ब्रह्माण्ड निर्मित करता है जो सबकी
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तुम जो हो अपने को वही जानो तुम जो कहो वही सत्य हो, जिया भोगा सोचा तुम जो करो वह सत्यम् शिवम् सुंदरम् हो तुम जो हो वही तुम्हारा सत्य है तुम जैसे हो वही तुम्हारा सत्य है अच्छा-बुरा, झूठा-सच्चा दिमाग की सोच है सबसे बड़ी बात अपने को समझना न कि इस चक्कर में पड़ना कि तुम अच्छे हो या बुरे झूठ हो या सच !! झूठ को नकारना झूठ है झूठ को स्वीकारना
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मुझे प्रचार नहीं चाहिए प्रसार चाहिए मुझे अपने अनुयायी नहीं चाहिए माध्यम चाहिए जिनका दीया प्रभु मुझ माध्यम द्वारा जलवा देवें और वो माध्यम इतने सक्षम हों कि और आगे मानवता का दीया जला सकें आत्मा के उत्थान की आत्मा की आज़ादी की मशाल जलती रहे एक माध्यम थक जाए चुक जाए तो दूसरा माध्यम उसकी जगह ले ले कर्मयोगी चाहिए अंध भक्त नहीं मुझे स्वामी माता गुरु बन पाँव नहीं पुजवाने बहुत काम है
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परा ज्ञान – अपरा ज्ञान दोनों का दोनों का संतुलन ही पूर्ण ज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञान है अहम् सांसारिक विज्ञान के परे ही तिरोहित होता है। मैं सांसारिक विज्ञान की पकड़ से दूर हूँ मैं सदा से ही मानवाकृत विज्ञान से परे हूँप्रभु सम्पूर्ण ज्ञानमय हैआनन्दमय हैसुखमय हैपरमानन्द है प्रभु सम्पूर्ण ज्ञान हैं सम्पूर्ण धर्म हैं सम्पूर्ण वैराग्य हैं सम्पूर्ण यश हैं सम्पूर्ण शोभा हैं सम्पूर्ण ऐश्वर्य हैं ईश्वर ऐश्वर्य है ईश्वर है सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान
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मैं मीना शरीर में पूर्ण हूँ ऊँ प्रणव हूँ ऊँ प्रत्यक्ष हूँ ऊँ प्रमाण हूँ ऊँ प्रणाम हूँ ऊँ वेद हूँ विज्ञान हूँ वेद विज्ञान मिलन हूँ मैं मीना शरीर में युग चेतना हूँ समिष्टि का संकीर्तन हूँ समय की किताब पर श्री कृष्ण का हस्ताक्षर हूँ मैं वही तो हूँ यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ
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होगा कोई परम हंसजिससे जुड़े मेरे मानस का हंस उड़ने को तैयार हो जगत उजियार देखे संसार आ गया मेरे मानस का हंस पाकर दुर्गा शक्ति हुई उत्पत्ति अब ना नष्ट होगी सरस्वती की सम्पत्ति परमहंस परमज्ञानी ही बाँचेंगे जाँचेंगे – मेरी वाणी दत्तात्रेय – ज्ञान ध्यान विवेक त्रय दत्ता ब्रह्मा : महासरस्वती विष्णु : महालक्ष्मी महेश : दुर्गेश्वरीमहाकाली ऊर्जाओं से युक्त मानस का हंस !! प्रणाम मीना ऊँ
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मैं प्रकृति ही हूँ संत नहीं जो तांडव न करूँप्रत्येक अपूर्णता को नकारना ही धर्म है मेरापूर्णता को स्वीकारना पे्रम है मेरापूर्णता की ओर ले जाना कर्म है मेरा यही सत्य है मीना नामधारी जीव कुछ नहीं है कोई नहीं है समय की उत्पत्ति हूँ …ऊँ संभवामि युगे युगे हूँ ऊँ प्रकृति की मानस पुत्री हूँ …ऊँ जैसे वो है वैसी ही हूँ …ऊँमीना ऊँजो वो करती है वही करती हूँ …ऊँयही सत्य है !!
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