मीना ऊँ
किसी की आलोचना करने का आपको कोई अधिकार नहीं यदि सुधार करने की शक्ति या उपाय आपके पास नहीं है,या आपमें भी उस बुराई का कुछ अंश है। सदैव दूसरों की कमियाँ देखना बखानना अपनी असफलताओं के लिए कष्ट के लिए अपने व्यवहार के लिए दूसरों पर दोषारोपण करना आपके अपने अंत:करण में व्याप्त ग्रंथियों का ही परिणाम है। ऐसा व्यक्ति कई बार अपने जीवन में आई बसंती बहार सुधार की गंगाधार और उन्नत विचार
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कर्मचक्र पूरा करना ही होता है पूरा खाली होने के लिए, परमानन्द पाने के लिए सदा मन में ध्यान रहे- जो कुछ भी आप मन वाणी व कर्म द्वारा ब्रह्माण्ड में उछालते हैं वही हज़ार गुणा बढ़कर वापिस आएगा। यही प्रारब्ध है भाग्य है। जो व्यक्ति अपने कर्मफल से मुक्त हो चुका हो वही सच्चा माध्यम, हीलर हो सकता है औरों को कर्मों से मुक्त कराने, प्रेम करुणा और सेवा का सहयोग देकर। कर्म जो
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प्रभु की अदालत में कोई खरीदा हुआ वकील न होगा। अपनी बहस खुद ही करनी पड़ेगी। मन ही प्रभु है बुद्धि वकील, संसार कर्मभूमिझूठ को सच साबित करने वाला कोई भी किराए का वकील नहीं होता, इस अदालत में सच्चे दरबार में। मन की अदालत – झूठ का कोई काम नहीं वहाँ! प्रभु की अदालत – यहाँ सच्चा ही मुकदमा जीतता है यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ
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कितना अद्भुत असीम अपरिमित है यह अवचेतन मन – सब जानता है देखता है और एक कुशल पुस्तकालय वाचक की तरह सृष्टि के सारे के सारे रिकार्ड रखता है। सदा संभालकर रखता सारी विकृतियाँ सारी स्मृतियाँ विश्व की सबसे बड़ी और सबसे सूक्ष्म लाइब्रेरी यहीं तो है भण्डार चित्रों की घटनाओं का रंगों का, पाप पुण्य के लेखों काजन्मों का जन्मान्तरों का कुछ भी छुपा नहीं इससे सब अंकित है इस अवचेतन मन पर सम्पूर्ण
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दिव्यता पाने की कोई तकनीक नहीं। सब अपने-अपने हिसाब से बाहर ढूँढ़ते हैं कोई ऐसी जादुई विद्या जो एकदम ऊपर पहुँचा दे पूर्ण ज्ञान दे दे पूर्णता दे दे पूर्ण आनन्द दे दे। जिन्होंने यह आनन्द पाया भी है, वो भी पूरा नहीं समझा सके और जैसे उन्होंने पाया अगर बता भी दिया तो वो उनका अपना ही तरीका है। जब तक पुस्तकें लिखी जाती हैं छपती हैं समय आगे बढ़ चुका होता है। पुस्तकों
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प्रभु ने सब कुछ ले लिया जो मुझमें था और अब हँसते-हँसते खुशी से मेरा रथ हांक रहे हैं खाक का एक ज़र्रा मीना रास्ता भी यहीं मंजिल भी यहीं सारी तलाश खत्म हो गई रास्ता ही मंजिल बन गया मंजिल ही रास्ता बन गई मीना न कहींं गई न आई, न आई न गई यहीं की थी यहींं रही और यहीं रह गई मिट्टी मिट्टी में मिल गई कोई कर्मयोगी – कोई सत्य योगी
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ऊँ नम: शिवाय ऊँ शंकराय नम: मधुर मनोहर राह सब इसी पर चलो गंगा तुम्हारा जल तुम्हारी छाती से बहता दूध है जिसे पीकर यह बच्चा बड़ा होकर तुम्हारे दूध का कज़र् अदा करेगा। सिद्ध भजो ऊँ फैलाऊँ दिग दिगंत इतनी ऊँचाई पर पहुँचकर आगे कहाँ… दूसरों के लिए जीना होगा। दूर करूँ अज्ञान…. बन उदाहरण सत्य प्रेम कर्म व प्रकाश का ईश्वर प्राप्ति के बाद यही मार्ग है, यही है मार्ग काल सबको नष्ट
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जिसने ज्ञान दिया ध्यान दिया मनुस्मृतिका वरदान दियासरस्वती का प्राण दिया परमानंद तक पहुँचाकर मोक्ष न देकर वापिस कियाइस असार संसार मेंलीला करने कोवही देगा कर्मभूमिकर्मयोगी और शक्तिअपना कार्य आगे बढ़ाने को रचूँ नया इतिहासतेरी दया हो जाए जो दाताहर नियति बन जाए !! प्रणाम मीना ऊँ
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दृष्टा बनने की कला सिद्ध करो धारणा तो हो ही जाएगी। सही कर्म, सही साँस लेना – धीरे-धीरे – लयगत गहरी – सामंजस्यपूर्ण नियमितफिर देखनानिरीक्षण + परीक्षण पूर्णतया आरामदायी तथा आनन्ददायी वातावरण में अपने अन्दर जाओ और चेतना की अन्तरतम परतों को छुओ। आत्म सुझाव प्रकृति की शक्तियाँ स्वर रंग और गंध आपको शारीरिक और मानसिक स्तरोंं के ऊपर ले जाते हैं जहाँ आत्मिक शक्तियों का प्रस्फुटन होता है जिससे आपकी सभी शक्तियाँ बढ़ती हैं
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सब नश्वर है बस ईश्वर अविनाशी है ईश्वर श्वर स्वर स्वर ही ईश्वर है। सब नश्वर है यह जानकर वैराग्य रखना जो कुछ भोगा जीया पाया सबके तुम खुद जिम्मेदार हो। अब ये बातें जानते तो सब हैं पर जीता कौन है जो पूर्ण समर्पण से यह सब पूजा की तरह करता है वही तत्व ज्ञानी है जो यह सब जानता है वह बस ज्ञानी मात्र है यही सत्य है। प्रणाम मीना ऊँ
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