मीना ऊँ
तू खुशबू है तुझे कैसे गिरफ्तार करूँ मैं जो जल गया मैं जो मिट गया गल गया बह गया उड़ गया मिल गया अग्नि अग्नि में पानी पानी में ïआकाश आकाश में हवा हवा में पृथ्वी पृथ्वी में समा गया और बन गया तेरा ही मूलरूप जिसमें मिला दो लगे उस जैसा यही है उसका रंग मैं तो यही जानूँ बस अब तो वो ही वो है, वो ही वो है वो ही वो तो
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जब से सृष्टि बनी तब से सब याद रहना समझ लेना सारे रहस्य सारा सत्य ज्ञान यह मनुस्मृति है। गीता में श्रीकृष्ण ने यह सत्य स्वीकारा है कि सारे तथ्य सत्य को सबसे पहले मनु प्रथम मानव ने अपने पिता सूर्य से जाना- सत्य ऊर्जा स्रोत से। बाद में यह ज्ञान-रहस्य ऋषियों ने जाना पर धीरे-धीरे यह ज्ञान लुप्त हो गया। अर्जुन को यह ज्ञान श्रीकृष्ण ने गीता बता बताकर दिया। ना जाने कैसे प्रभु
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गुनातीत होने पर तेरी ही कृपा चाहिए। केवल सत्य से ही रीझने वाली, ना किसी के आगे ना पीछे, न धन से ना मान से ना ज्ञान के अभिमान से, स्पष्टता, पवित्रता व शुद्ध भाव के प्रकटीकरण की शक्ति देने वाली, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् कलाओं की प्रेरणा व प्रश्रयदात्री। वाणी को वेद बनाने वाली तेरी आराधना सदा ही प्रिय हो।पूर्ण समर्पण : पूर्णतया आधिकारिता की समाप्ति। सम्पूर्ण लेन-देन ऊर्जा का, ना कम ना ज्यादा, पूर्णता
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अचानक कुछ होना जिसका अर्थ बहुत गहरा होता है जिसका कोई न कोई संदेश अवश्य है। यही ब्रह्माण्ड का क्रियाकलाप है। आत्मानुभूति की प्रक्रिया है। समर्पण : विज्ञान की अंधी दौडï में भूला इंसान परा ज्ञान को, नकार दिया अपने अद्वितीय अस्तित्व को स्रोत को। पर अब पथ भूला राही मानव सत्यता को मानना चाह रहा है। घूमा है कालचक्र, मानव अपनी सच्ची जड़े ढूंढ, जुड़ना चाह रहा है अपने सत्य ऊर्जा स्रोत से। ब्रह्माण्ड
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आपको अपने प्रति सत्यवान होने के लिए मिला है क्यों कुछ लोग बड़े – बड़े व्यवसायी या अपने अपने क्षेत्रों में अग्रगणी नेता आदि होते हैं क्योंकि वो अपने मन मस्तिष्क को जानते हैं और पूरी सच्चाई व आस्था से अपने पूरे उद्यम व शारीरिक, मानसिक क्षमताओं से उसके लिए कर्म करने को उद्यत होते हैं दुनिया की परवाह किए बिना प्रत्येक वो वस्तु उन्हें स्वत: ही प्राप्त होती जाती है जो उन्हें लक्ष्य तक
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प्रणाम जीवन के जिस परम संदेश के प्रसार को अवतरित हुआ है वो यह है कि मानव जीवन मुक्त होने के लिए ही बनाया गया है। प्रणाम वह सत्य बताता है उन सम्भावनाओं को उजागर करता है जिसमें मानव जीवन केवल रहने के लिए ही नहीं बना है। हमारा अस्तित्व बना ही है उत्कर्ष के उस बिन्दु पर पहुंचने के लिए जो कि सारी सीमाओं से मुक्त है। एक ऐसा विस्फोटक बिन्दु जहाँ से मानव
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यह ध्रुव सत्य है। सच्चे मन की प्रार्थना में अपूर्व शक्ति और प्रभावोत्पादकता होती है। संयमी व्यक्ति यदि मन मस्तिष्क की सम्पूर्ण शक्तियों को केंद्रित कर श्राप दे या आशीर्वाद अवश्य ही फलीभूत होता है। मन की संकल्प शक्ति में अपार शक्ति है। शुद्ध अन्तरात्मा की आवाज की भविष्यवाणियां व शुभेच्छाएं दोनों ही सही होती हैं और यह हमारे सच्चे मन के अन्त: दर्शन व सम्पूर्ण ज्ञानमय तत्बुद्धि युक्त मस्तिष्क की देन है। ज्ञान ध्यान
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किसी को प्रभावित करना या करने की चेष्टï करना, पाखंड, ढोंग दिखावट व झूठ है। शायद कोई आपसे प्रभावित हो भी जाए पर ऐसे प्रभावित कर देना अधिक देर नहीं ठहरता, तो यह भी एक प्रकार का ऊर्जा का हनन व प्रदूषण है। जब हम दूसरों को प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं अपने व्यक्तित्व बुद्धि चातुर्य या किसी अन्य उपाय से ताकि प्रभावकारी छाप छोड़ें तो हम अपने ही बनाए मकड़जाल में उलझ जाते
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वैदिक प्रथाओं में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रभु की दया मांगने की अपेक्षा उसकी दया पाने योग्य बनना होगा। सुपात्र बनना ही होता है। बाद के जितने धर्म आए उनमें इसे, सुयोग्य व सुपात्र बनने के कर्म को इतना महत्व नहीं दिया गया। धार्मिक स्थलों पर सामूहिक प्रार्थनाओं की या अन्य और किन्हीं बाहरी तरीकों से पाप धोने की विधियां अधिक पनप गईं। कर्मकाण्डों व किताबी ज्ञान का इतना विस्तार कर दिया कि
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ज्ञान भी एक रास्ता है सत्य को पाने का सत्य क्या है- सत् चित् आनन्द, सच्चिदानन्द सच्चिदानन्द क्या है- ऐसा सत्य पूरित चित्त जिसमें आनन्द ही आनन्द है वो आनन्द जो ना खुशी है न ग़म, ना सुख ना दुख ना अहम् ना त्वम् एक आलौकिक अनुभूति सब कुछ जान समझ लेने की, न कोई प्रश्न ना जिज्ञासा ना भागदौड न उत्सुकता, बस परा चेतना से जुड़कर नित नव नूतन आनन्दमयी स्थिति, सदा उगने की,
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