मीना ऊँ
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु गुरूर्देवो महेश्वर:। गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥ जन्म-जन्मान्तर से सृष्टि के आरम्भ से ही हूँ थी और रहूँगी युगों-युगों से जन्म-जन्म से मेरे गुरु स्वयं ब्रह्मा विष्णु महेश हैं आत्मा का काव्य सत्य है यही सत्य है। यहीं सत्य है।। प्रणाम मीना ऊँ
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न प्रशंसा करो, न आलोचना, न ही तुलना करोन प्रेम करो, न ही अपनाओ, न ही नकारोबस स्वीकारो, एक प्रकाश का राही हूँ नि:स्वार्थ सरल प्रेम का सागर लिए स्व अनुभूत प्रकाश की गागर लिए प्रणाम कर्म को अर्पित, सत्य यज्ञ की आहुति होने को समर्पितएक प्रकाश का राही हूँ, बस स्वीकारो भान नहीं योग्य हूँ या अयोग्य, समर्थ हूँ या असमर्थ दृढ़ प्रतिज्ञ हूँ एक निश्चय हूँ यही एक राह है जीवन की प्रणाम
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यहीं है सत्य, मीना की आँखों में आँखों के भाव में यही सत्य है कि यहीं सत्य है मीना नाम का जीव बह रहा है युग-युगान्तर से युगचेतना के साथ युग पुरुषों की इच्छाशक्ति से सब गुरु मेरे अन्तर में ही तो समाए हैं अपना-अपना काम मुझसे करवाए हैं बारी-बारी आकर समय के हिसाब से मेरा अन्दर बाहर सब उनका ही आधार उनका ही आकार हो जाता है मीना अब कहाँ? कहाँ ढूँढ़े मीना अपने
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हे मानव ! ज्ञान का विस्तार अर्थहीन हो जाता है अपना महत्व समेट लेता है जब मानव तत्व के बिन्दु तक पहुंच जाता है इस बिन्दु तक पहुँचने के लिए ज्ञान बहुत सहायक होता है। योगियों द्वारा सिखाया जाने वाला योग जीवन पर्यन्त, मृत्यु तक विस्तारित रहता है मोक्ष प्राप्ति हेतु! पर सबसे बड़ा सच है जीते जी इसी मानव शरीर में ही पूर्ण मुक्तावस्था या मोक्ष प्राप्त कर लेना ! मानव को फिर-फिर बार-बार
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जीवन्त पटाखे रंग-बिरंगे रोज छोड़े रोज तोड़े धूमकेतु पुच्छल तारे छोटे मोटे ग्रह न्यारे-न्यारे यहाँ से वहाँ तक ब्रह्माण्ड के अनन्त छोर तक अपनी मर्जी के मालिक स्वच्छन्द नटखट पूर्णता के खेल में रमे न थके न बुझे यह तो केवल मानव ही है जो कहे धरती की दीवाली पर पटाखे उड़े मिटे चले जले बुझे-अनबुझे जो करते रहते हमारी ही मानसिकता को तृप्त उस अनन्त रचयिता के पटाखे करते अपने को ही संतुष्ट अपना
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पराशक्ति यहीं है मैं पूर्ण समर्पण में स्थित हुई तुम्हारे साथ विकसित हो रही हूँ तुम्हारे लिए विकसित हो रही हूँ। सच्चे जीवन की ओर जागृत हो जाओ। अहंकार त्याग, पवित्र प्रेम के पंखों के नीचे आओ। यही पूर्ण आनन्द का स्रोत है। पूर्ण समर्पण में कोई प्रतिशत नहीं। शत-प्रतिशत ही चाहिए। कालचक्र फिर घूमा है। श्रीकृष्ण चेतना तथा जगत मातृ चेतना एक ही शरीर में है। जो समय की मांग होती है वही प्रकृति
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धरती पर सत्य का सूर्य उदय हुआ है- हमें प्रकाशित करने तथा अपूर्णता व अंधकार मिटाने के लिए। हमारे बीच एक ऐसा मानव है जिसके पास अपार प्रेम व ज्ञान की अनबूझ ज्योति है तथा सतत सत्कर्म में पूर्ण विश्वास है। इनका आह्वान है- रूढ़ियों से उठकर आत्मानुभूति को अपनाओ जो जीवन का अस्तित्व है। अपनी आत्म जागृति से ये वेद और विज्ञान को मिलाने में कार्यरत हैं। परमस्रोत से स्वत: इनमें ज्ञान प्रवाहित हो
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सत्य था है और सदा सत्य ही रहेगा।तन मन आत्मा का सत्य। विचार वाणी कर्म का सत्य।सत्य सबका आधार है सत्य किसी पर निर्भर नहीं। सत्य ही सत्य तक किसी बाहरी शक्ति के बिना सहज स्वत: ही पहुंचता है। यही सत्य की शक्ति है। सूर्यमुखी प्राकृतिक रूप से ही सूर्य की ओर उन्मुख होता है। सत्य को कभी ढूंढ़ा या छोड़ा नहीं जा सकता।सत्य को सत्य होकर ही पाया जा सकता है।सत्य ही सत्य है
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एक ऐसे संवेदनशील हृदय की जो सबसे नि:स्वार्थ प्रेम करे ऐसे सुंदर हाथों की जो सबकी श्रद्धा से सेवा करें ऐसे सशक्त पगों की जो सब तक प्रसन्नता से पहुंचे ऐसे खुले मन की जो सब प्राणियों को सत्यता से अपनाए ऐसी मुक्त आत्मा की जो आनन्द से सब में लीन हो जाए। यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ
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पूर्ण शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य तथा आत्मा का विकास।पूर्ण उन्नत अवस्था के लिए प्राचीन तथा नवीन प्रणालियों का समन्वय।यह जानना कि रोग आंतरिक असंतुलन की बाह्य अभिव्यक्ति है।पूर्ण स्वास्थ्य तथा पूर्ण आत्मज्ञान के उच्च शिखर तक पहुँचने के लिए प्राकृतिक विधि से व्यक्ति का पूर्ण उपचार व अज्ञान का अंधकार भेदन।सत्य परम संतुलन है। सत्य दु:ख तपस्या है। असत्य ही असंतुलन है।मानव विकास के योग का ज्ञान।आत्मानुभूति और ज्ञान भक्ति एवं कर्म का विस्तार। प्रणाम मीना
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