मीना ऊँ

ऊँ हृीं श्री सर्वगुरु समूह अत्रावतरावतर संवौषट् ऊँ हृीं श्री सर्वगुरु समूह अत्र तिष्ठï तिष्ठï ठ: ठ: ऊँ हृीं श्री सर्वगुरु समूह अत्र ममसन्निहितो भवभव वषट् रोम रोम कृतज्ञता से भरे मेरा मन अंजान प्रभु कैसे करूँ अपनी छोटी-सी बुद्धि तुच्छ जुबान औ’ कमजोर कलम से तेरी कृपा बखान सभी कुछ तो पूर्ण ब्रह्माण्ड ही भर दिया मेरे अन्दर इससे ज्यादा पूर्णता क्या होगी मुझे अपने में समा खुद मुझमें समा मुझे पूर्ण कर दिया
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यहीं है सत्य, मीना की आँखों में आँखों के भाव में यही सत्य है कि यहीं सत्य है मीना नाम का जीव बह रहा है युग-युगान्तर से युगचेतना के साथ युग पुरुषों की इच्छाशक्ति से सब गुरु मेरे अन्तर में ही तो समाए हैं अपना-अपना काम मुझसे करवाए हैं बारी-बारी आकर समय के हिसाब से मेरा अन्दर बाहर सब उनका ही आधार उनका ही आकार हो जाता है मीना अब कहाँ? कहाँ ढूँढ़े मीना अपने
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कितना अद्भुत असीम अपरिमित है यह अवचेतन मन सब जानता है देखता है और एक कुशल पुस्तकालय वाचक, librarian, की तरह सारे के सारे रिकार्ड रखता है सदा संभालकर रखता है सारी विकृतियाँ सारी स्मृतियाँ विश्व की सबसे बड़ी और सबसे सूक्ष्म पुस्तकालय यहीं तो है भंडार चित्रों का घटनाओं का रंगों का पाप-पुण्य के लेखों का कुछ भी छुपा नहीं इससे सब अंकित है इस अवचेतन मन पर सम्पूर्ण जीवन व्यवहार क्रियाएँ प्रतिक्रियाएँ परिणाम
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रोका क्यों नहीं कृष्ण युद्ध रोका क्यों नहीं क्यों होने दी नष्ट सर्व उन्नत सभ्यता संस्कृति भारत की क्यों होने दिए नष्ट हमारे महान सिद्ध गुरु धीर-गंभीर क्यों मिटा डाले महान परम्परा के रखवाले वीर क्यों होने दिया दिव्यास्त्रों का प्रयोग अपनों पर ही समय व धन का दुष्प्रयोग द्वेषों पर ही क्यों क्यों क्यों क्यों कृष्णा गुरुदेव मेरे बोलो न गुरु से पूछ सकता है तो केवल उसका परम शिष्य ही अर्जुन ने मना
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एक रोशनी जो सब ब्रह्माण्डों से परे है करोड़ों सूर्यों से भी तेजवान है प्रकाश से भी वेगवान है सम्पूर्ण सृष्टि उजागर कर दे वह तो तेरे अपने अन्दर ही है रे मूर्ख मानव ! तेरे मन में ही है वह ज्योति जो सब रोशनियों की सरताज है देख समझ पहचान-तू ही प्रभु तू ही प्रेम, प्रेम ही प्रभु ओ प्रभु के अंश बन जा प्रभु बन जा रोशनी कर दे जग रोशन नई आशा
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नमामि वंदे गुरु समूह माँ परम शक्ति संचालिनी सब गुरुजनों का वरद्हस्त मेरे सूर्य स्थान पर सहस्रार पर माँ सरस्वती दुर्गा काली आवें ब्रह्मा स्वयं पाठ पढ़ावें सब ब्रह्मा पुत्र सरस्वती पुत्र स्वयं ही दीक्षा दे जावें ऊँ भी ब्रह्मा विष्णु महेश भी सभी देखे अनदेखे गुरुजन श्री ईसा, श्री मूसा, श्री रहीम श्री राम, श्री कृष्ण, श्री बुद्ध श्री विवेकानन्द, श्री साँई बाबा श्री नानक देव, श्री मीरा श्री तुलसी, श्री कबीर सब स्वयं
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आप ही अक्षर ब्रह्म आप ही तत्व बीज आप ही तत्व अविनाशी आप ही तत्व विनाशी आप ही तत्व सुबुद्धि आप ही तत्व कुबुद्धि आप ही तत्व शैतान आप ही तत्व भगवान मानव बुद्धि सुर में तो भगवान सुर में नहीं तो शैतान यही सत्य है। यहीं सत्य है। प्रणाम मीना ऊँ
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मेरे ज्ञानचक्षु का बिन्दु बन गया सभी गुरुजनों ने स्वयं हाथ रखा दीक्षा दी दर्शन दिया मार्ग दिखाया सब कुछ इसी शरीर में रखे-रखे मन-मस्तिष्क आत्मतत्व में समाया बनी कड़ी उत्थान की मीना की काया प्रभु आया यही सत्य है। यहीं सत्य है। प्रणाम मीना ऊँ
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ऊँ ग्राँ ग्रीं ग्रों स: गुरवे नम: परम गुरु प्रणाम सम्पूर्ण मानव शब्दकोषों में एक भी शब्द ऐसा नहीं जो इस अनुभूति को बता सके राई जैसा ब्रह्माण्ड उससे भी परे सकल ब्रह्माण्डों को एक मुट्ठी में थमा दिया सत्य बता दिया यही है सत्य यहीं है सत्य !! प्रणाम मीना ऊँ
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मुझे युग-युगान्तर तक सहज उपलब्ध हों ज्ञान ब्रह्मा का दिल बड़ा ब्रह्माण्ड का तेज सूर्य का अमृत चन्द्रमा का विस्तार सागर का ज्ञान शारदा का शक्ति शिव की नैतिकता विदुर की गुण राम के त्याग दधीचि का नीति-वैराग्य कृष्ण का क्षमा ईसा की सेवा हनुमान की फकीरी कबीर की भक्ति नानक की प्रीति मीरा की तपस्या बुद्ध की दया महावीर की प्रतिज्ञा प्रताप की चरित्र शिव का बुद्धि की तीव्रता विवेकान्द की प्रभावी व्यक्तित्व रजनीश
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