मीना ऊँ
जीवन से तप-तप कर जीना अपनों से मिल-मिल कर बिछुड़ना काम निकल जाने पर मुँह मोड़ना आराम से एक क्षण में दिल तोड़ना सब सिखा गया वैराग्य की नीति कर्म की रीति अन्तरमन के ज्ञान की भक्ति मोह माया की सत्य प्रेम प्रकाश में परिणति कोमा में सोए लोग क्यों टिके रहते हैं चिता पर जलते शव क्यों चुप रहते हैं जिसे जीवन ही चिता बन जलाए तपाए सताए वो ही तो रज तम सत
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भाग- 1 पूर्णता के अवतार प्रतीक विष्णु की विडम्बना विष्णु की विडम्बना जाने मीना क्यों आते हो तुम बार-बार शापित होने जबकि शाप देने की कला तो तुमको आती ही नहीं फिर तुम कहाँ के सर्वकला सम्पूर्ण ओ जगदीश्वर वरदान देना मुँह से तुमने जाना ही नहीं तभी तो तुम्हारे अहम्, अस्तित्व को किसी ने माना ही नहीं दूसरे देते रहे वरदान बोल-बोलकर तुम करो कर्म अन्दर ही अन्दर तोलकर ब्रह्माण्ड से भोला भंडारी शिव
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मैंने सबका सलीब ढोया है मैंने सबका दर्द भोगा है पूरा का पूरा तुम लोगों ने तो टुकड़ों-टुकड़ों में भोगा है सिर्फ एक-दो तरह का मैंने हर तरह का दर्द भोगा है सबका सलीब ढोया है मैं तुम सबका दर्द जानती हूँ…हूँ न इसलिए कि जो ऊँ तुम्हारे अन्दर है वही तो मेरे अन्दर भी है तुमसे मिल गया है समा गया है समाहित होकर ही जाना जा सकता है कि तुम तो वही हो
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शिवजी की तरह ज़हर पीती है मीना ताकि तुम सब खुश रह सको क्या जानता है यह बात कोई शिवजी ने पीया सबने जाना मीना ने पीया किसी ने न जाना यही तो और मजा है पीने का जीने का तभी तो मुस्कुराती रहती हूँ कि कोई भी कुछ नहीं जानता कैसे-कैसे हादसे सहते रहे और मुस्कुराते रहे यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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मैं युगचेतना हूँ गीता हूँ सुगीता हूँ वेद हूँ विज्ञान हूँ विधि का विधान हूँ जैसा प्रकृति ने चाहा वही इंसान हूँ मानसपुत्री प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति धरती की सर्वोत्कृष्ट कृति प्रकृति की संभवामि युगे-युगे हूँ पूर्ण हूँ पराशक्ति वही तो हूँ, कर्मयोगी हूँ धर्मयोगी हूँ सत्ययोगी हूँ यही सत्य है यहीं सत्य है उगा सूर्य सत्य का सतरंगी रास पकड़ ले सत की अनमोल धरोहर सात घोड़ों के रथ पर सवार करने को जगतोद्धार
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हे मानव! ध्यान से सुन अपने अस्तित्व की गाथा इतना छोटा-सा ज्ञान क्यों तेरी समझ नहीं आता मानव एक छोटा-सा अणु ब्रह्माण्ड का उसी से जुड़ पूर्णता पाता पूर्णता पाकर अलग हो जाता अलग हो जाता अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाता पूर्णता के मंत्र से ही उत्पत्ति पाता क्या ब्रह्माण्ड का घट जाता सारे शरीर में व्याप्त अणुओं का अगणित गणित चलाता अपना ही व्यवहार जहाँ है ही नहीं कोई व्यापार बस पूर्णता से पूर्णता प्राप्त
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माँ कृपा अपार प्रेम से जीते संसार तेज पुंज सब देवों का रूप धरे शक्ति का करे हुंकार, काँपे संसार हुं हुं हुंकार, करे प्रचंड वार अपूर्णता संहार करे सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का प्रसार आह्लाद अपार आनन्द विस्तार निश्छल प्रेम व्यवहार ही करे निस्तार यही सत्य है !! यहीं सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ
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