मीना ऊँ

अब रहेगी सदा साथ बीते दिनों की तेरी याद ज़ुदाई के पल की बात सारे जीवन की सौगात अब मिलेंगे हम सपनों में होंगी बातें बस ख्यालों में वो प्यार भरे सुन्दर लम्हें वो प्यारा चेहरा वो आँखें वो कामनाओं से भरपूर हवाएँ धरती और आकाश के बीच प्यार बस प्यार ही प्यार अब रहूँ मैं कहीं भी इनका सच होगा साथ अब रहेगी सदा साथ… बीते दिनों की तेरी याद ज़ुदाई के पल की
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लग रहा है सुबह से ही जैसे सारे ब्रह्माण्ड में फैलती ही जा रही हूँ पिघला जा रहा है रोम-रोम सारा का सारा मेरा अस्तित्व पिघल-पिघल कर चारों ओर जो तत्व जहाँ तक है वहाँ तक पहुँच रहा है धुआँ सा बन बादलों में पानी बन सागर नदियों में अग्नि बन कोटि-कोटि सूर्यों में हवा बन आकाश में प्रकाश बन ब्रह्माण्ड में मिट्टी बन धरती के कण-कण में और भाव बन कृष्ण में कण-कृष्ण व्याप्त
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अपने आपको प्रकाश से भरना जो स्वत: ही लाए ज्ञान और ध्यान व्योम शान्ति मिटाए भ्रांति व्योम शान्ति मिटाए भ्रांति सम्पूर्ण से जोड़कर योग कर एकाकार करे समसार करे यही सत्य है !! यहीं सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ
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जिनसे गलतियाँ होती हैं वह जानते हैं कि उन्होंने क्या किया है उसका जवाब सोच लेना ही उनका ध्यान ‘मेडिटेशन’ होता है उनसे कुछ भी कहो तो उनके पास ऐसे सधे उत्तर होते हैं कि आप अपने को एकदम बेवकूफ महसूस करते हैं उनसे बहस करने को उनके स्तर पर उतरना होता है और उस स्तर की भाषा व विद्या से अनभिज्ञ होने पर मुँह की खानी पड़ती है तो रोना काहे का यही तो
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सृष्टि की उत्पत्ति में लय होना उसके साथ उगना और उसकी मानसिक स्थिति को जानना ब्रह्म बोधि व ब्रह्म गति को प्राप्त होना बीज रूप से देखना अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को बीज जो कि सब गुण अपने आप में समाए हैं एक बीज से सैकड़ों-हज़ारों फल पाए जा सकते हैं पर हजारों फल धरती में दबा दो एक बीज पैदा नहीं कर सकते बीज आया कहाँ से कैसे सदियों के विविध विधान से बन गया
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कालचक्र महाकाली दुर्गा शक्ति हुई जागृत और अब काम नहीं रुकने वाला यही समय की कालचक्र की गति है जो मेरी कलम से बहती है समझेंगे नसीबों वाले जो मन में होता है वही विचार होता है वही लिखा जाता है वैसा ही कर्म होता है यही सत्य होता है वही सत्य होता है यही सत्य है देखूँ जानूँ समझूँ सत्य की शक्ति पूर्णता की भक्ति तो सिर्फ सत्य ही कर पाता है सत्य की
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इन्तजार जि़न्दगी बना प्यार बंदगी बना दर्द धड़कन बना जो तूने बनाया वही तो मैं बना तुझसे क्यों कहाँ क्या कहूँ मैं तो तू ही तू बना अब और क्या बाकी रहा कृष्ण था कृष्ण-कृष्ण ही रहा जो तूने सहा वही तो सहा जो कहलवाया वही तो कहा तभी तो गीता बना यही सत्य है कौन किसका स्थान बंदे भूला किस भ्रम में कि है जो स्थान तेरा देगा किसी और को डेरा किसका स्थान
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जीवन्त पटाखे रंग-बिरंगे रोज छोड़े रोज तोड़े धूमकेतु पुच्छल तारे छोटे मोटे ग्रह न्यारे-न्यारे यहाँ से वहाँ तक ब्रह्माण्ड के अनन्त छोर तक अपनी मर्जी के मालिक स्वच्छन्द नटखट पूर्णता के खेल में रमे न थके न बुझे यह तो केवल मानव ही है जो कहे धरती की दीवाली पर पटाखे उड़े मिटे चले जले बुझे-अनबुझे जो करते रहते हमारी ही मानसिकता को तृप्त उस अनन्त रचयिता के पटाखे करते अपने को ही संतुष्ट अपना
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मन खोया-खोया सा है न यहाँ है न वहाँ है सब कुछ सोया-सोया सा है बहुत देर हुई अपने आपसे मिले मन की कली खिले सब लगे अपने ही मेलों में झमेलों में जि़न्दगी से जूझते से अपने को बूझते से वहीं वहीं घूम रहे अपने ही बनाए घेरों में कर्मों के फेरों में अपने ही बनाए मापदण्डों पर कभी खुश कभी रोए से पर कभी न माने न जाने कि वो तो है सचमुच
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यही कहे मन पुकारे मन दूर हूँ बहुत मगर हूँ तो तेरी ही डोर से बँधी तेरे ही प्रेम में बिंधी जब हो मन रीता तो गुने गीता बना गुनावतार रज तम सत का और भी कितने अवतार जिएँ इस मन में गिन ही न पाए मन पर मन ही मन मुस्कुराए मन मन की अनन्त क्षमता पर असार संसार की समता पर खेल रहे तीन ही गुनों में सब बने कठपुतली डोरी के लम्बाई
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