मीना ऊँ

मैं मीना मूर्ख महान कंघे बेचूँ गंजों को आइने बेचूँ अंधों को ज्ञान बेचूँ अक्लमंदों को जिनकी अक्ल हो गई है मंद प्यार बाटूँ कृतघ्नों, thankless, को मान करूँ चाण्डालों का कर्म का पाठ पढ़ाऊँ कर्महीनों को दया करूँ राक्षसों पर बुलाऊँ धोखेबाजों को घर मोरी अक्ल गई घास चरने मूर्खों का पानी भरने भैंस के आगे बीन बजाऊँ गधों के आगे मुस्काऊँ कभी-कभी सोचूं गुरुओं की बाबत क्या होती है उनकी हालत शिष्य नचाएँ
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बनना होता है करुणासागर करने को प्रेम विस्तार प्राणी चतुर महान अपने से अनजान इष्ट से रुष्ट दुष्ट से खुश समर्पण की परीक्षा तक पहुँचे कोई-कोई ही महान परीक्षा जो दे पाएगा वही पाएगा आत्मज्ञान कृष्ण स्वरूप वरदान तो न रहो अनजान जानो समर्पण का विज्ञान जानो समर्पण का ज्ञान-विज्ञान… विधि का विधान मनु का प्रणाम यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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आज का ध्यान : हे मानव ! संशयों या प्रश्न पूछने में ऊर्जा व्यय करने की अपेक्षा सामने आए कर्म को कैसे पूरे मनोयोग शान्ति व धैर्य से पूर्णतया निभाना है इसका उद्यम करना होता है। क्योंकि प्रकृति का नियम है कि कर्म ही कर्म को काटता है। कर्म बंधनों से मुक्ति का उस परम चेतना ने बहुत ही अच्छा विधान किया हुआ है। कर्मों से कैसे किन-किन कर्मों से मुक्ति होगी वही मानव के
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मानव ने अपने अस्तित्व का एक चक्र, सरल पवित्र शुद्ध आत्मवान और वास्तविक होने से लेकर चालाक पाखंडी धूर्त हेराफेरी और बुद्धि की जोड़ तोड़ से काम निकालने वाला होने तक का, पूर्ण कर लिया है। यह अनुभूत किए बिना कि इसमें उसने मानव जीव की प्राकृतिक उत्थान प्रक्रिया को कितना मलिन कर दिया है। वो मानव जिसे प्रकाश का ज्योतिर्मय पुंज, दिव्यता परिलक्षित करने वाला होना था वो मात्र बुद्धि की चतुराइयों और समायोजनाओं
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जो समाज अपने इतिहास से सबक नहीं लेता उसका भूगोल बदल जाता है, संस्कृति नष्ट हो जाती है। भविष्य अंधकारमय हो जाता है। धन्य है भारतभूमि कोई न कोई अवतारी बन पुन: शाश्वत सनातन सत्य का मार्ग प्रशस्त अवश्य ही करता रहता है। यही है इस पुण्य भूमि का प्रताप। यही सत्य है… समय अब करवट ले रहा है… अब पीछे देखने का समय नहीं है। सच्चे राष्ट्रप्रेमियों का प्रयास अनुभूत किया जा रहा है।
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True Dharma is not Religion, cult or path Pranam Meena Om
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सत्य ही निर्लेप और निर्मल है, सर्वव्यापक है, सर्वशक्तिमान है। अब सत्य मानवों को एकजुट होना ही होगा। भारतीय जनमानस को, भारत के गौरव को पुनर्जीवित करने और सशक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे आना होगा। भारत सनातन शक्ति द्वारा संसार को सत्य मार्ग दिखाने की क्षमता रखता है। एक पूर्णतया सत्यमय मानव की आत्मशक्ति ही बहुत है रूपांतरण की धारा बहाने को सत्यमेव जयते की प्रमाणिकता सिद्घ करने को। प्रणाम साहित्य की शब्द
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देवशयनी एकादशी को विष्णु अपनी शेषशैय्या पर शयन के लिए गमन कर गए। चौमासा लग गया श्री विष्णु जगत के नियंता, पालनहार सो गए और वो भी चार मास के लिए… क्या सच में संसार के स्वामी चार महीनों के लिए सो जाते हैं? तो ब्रह्माण्ड की व्यवस्था कैसे चलेगी? इसको ऐसे समझें कि यदि देश के प्रधानमंत्री कुछ समय के लिए विदेश चले जाते हैं तो देश की व्यवस्था ठप हो जाती है क्या…
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मैं आत्मा हूँ आत्मा ही तो हूँ आत्मा में पूर्णतया सन्तुष्ट आत्मा के गुणों में रमने वाली आत्मा से ही खेलने वाली बातें करने वाली औरों की भी आत्मा से ही सम्पर्क साधने वाली उसी को अनुभव कर उसी अनुभूति पर मग्न रहने वाली आत्मा के ही गुण विस्तीर्ण करने को यह शरीर प्रभु का दिया हुआ प्रभु का ही च्दीयाज् यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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तुम आए मुझे देखा और जीत लिया मैंने पाया वरदान-सा प्यार तुम्हारा फूटा जो नटखट झरने जैसा मन की गहराइयों से उदारता से भिगो गया धड़कते दिल की सभी तहें भर गई मैं चमकीली फुहारों से उस परम प्रेम के आनन्द से डूब गई पूरी की पूरी मेरी आत्मा एक एकाकी शान्त स्थाई भाव में अन्तर में सुलगे जब ज्वालामुखी कामनाओं की तो उबरूँ सन्तुष्टï चहकती-सी आनन्दित होती हुई तुम आए… मुझे देखा और जीत
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