मीना ऊँ

प्रभुमयी सूर्यमयी चन्द्रमयी हुई प्रभु प्रसाद पायो पायो अनमोल रतन कर जतन ब्रह्माण्ड स्वयं पढ़ावें समझ न आवे कैसे हुआ यह चमत्कार ज्ञान आवै आपै-आप ज्ञान-ध्यान की महिमा अपार प्रभु कृपा अपरम्पार सत्यमेव जयते तमसो मा ज्योतिर्गमय स्वाध्याय योग सिद्ध हुआ यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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विश्वास का दिया बना भक्ति का तेल डाला आत्मशक्ति से प्रकाशित हुआ युगचेतना बन ब्रह्माण्ड में स्थापित हुआ जग रोशन का संकल्प ले प्रणाम का उद्भव हुआ कलियुग में गीता का उद्घोष करने मन से मन की जोत जलाने आत्मा का आत्मा से विलय कराने प्रेम प्रसार का धर्म ले प्रणाम पूर्ण तत्पर हुआ जागरण का संदेश लिए कर्म ही धर्म है प्रेम सदा सफल है सत्य सदा विजयी है प्रणाम का यही आदर्श हुआ
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जो दर्द प्रभु देते उस दर्द को वो भी अनुभव करते पूरा का पूरा झेले उन्होंने सभी दर्द तभी तो मानव को भी प्रभुता देने को दर्द देते जो कुछ भी घटा उनके साथ वह सत्य ही तो होता है वैसा वही मानव की क्षमता के हिसाब से मानव को भी मिलता जाता है जो पात्रता के गणित पर खरा उतरता है तो हे मानव ! वही पीड़ा वही दर्द पूरा का पूरा बहुविध अनुभव
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प्रणाम एक यात्रा है जीवन का सफर है… है ना ! मानव जीवन का सफर मानव से ईश्वर होने का नर से नारायण होने का नारी से नारायणी होने का ईश्वरीय गुणों से युक्त जगदीश्वरी होने का दिव्यता से परिपूर्ण हो परमेश्वरी होने का प्रकृति की अनुकृति हो ब्रह्माण्डीय रहस्यों को उजागर करने का सृष्टि का स्वप्न साकार करने का साधक से प्रसारक और फिर विधायक होने का पूर्ण हो पूर्ण में विलय होने का
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मुझे क्या ऊँचा क्या नीचा जिसने परम पद पा लिया हो उसे ये संसार क्या पद या पदवी दे पाएगा पूरी धरती जिसका सिंहासन पूरा आकाश जिसका छत्र अगणित चन्द्र-सितारों नक्षत्रों-सूर्यों के अनमोल हीरे मानिक-मोती सोने-चाँदी जड़ा शीतल मन्द पवन डुला रही चँवर संगीत की मधुर ध्वनि करते कोयल औज् भ्रमर प्रकृति रंग-बिरंगे फूलों की सुगंधियाँ जलाए आत्मा सब हृदयों पर राज कराए अनन्त कोटि ब्रह्मïाण्ड तक फैला साम्राज्य पर एकदम खाली न कोई चिन्ता
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जानती है सबकी आत्मा यह तो जुड़ी है अपने ही स्व से उस स्व के स्वरूप कृष्ण से प्रकृति के ऐसे मायके से जहाँ से भरपूर मिलता है और यह संसार नोच-नोच खाने वाला ससुराल और ला और लाकर दे लूटना खसोटना ही धर्म है यहाँ अच्छा ही है तपस्या के लिए जाना नहीं पड़ता गुफाओं जंगलों में सब कुछ वहीं है जहाँ होती हूँ जहाँ हूँ वहाँ भी कहाँ हूँ पूरी की पूरी आत्मलीन
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अब समय आ गया है कि आत्मानुभूति (स्पिरिचुएलटी) व धार्मिकता का अंतर स्पष्ट किया जाए। धार्मिकता मनुष्यों की बुद्धि से पनपा अध्यात्मवाद है, पंथ है, जिसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, जबकि आत्मानुभूति सच्चे मानव को प्रकृति द्वारा अनुभव कराई प्रकृति के ही नियमों वाले शुद्ध धर्म की सच्चाई है। कलियुग में धार्मिक गुरुओं व तकनीकों की भरमार ने सब गड़बड़ घोटाला कर दिया है। पर यह स्थिति भी प्रकृति की ही देन है ताकि सबके
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सृष्टि के तत्वों का ज्ञान सृष्टि का ध्यान एकत्व जगाए हे मानव ! तेरे भीतर भी वही पाँचों तत्व अरे समझ इनका सत्व तेरे अन्तर का आकाश तत्व चाहे सदा विचरण उन्मुक्त इधर-उधर डोलता-घूमता निष्प्रयोजन सा दीखता अनन्त प्रयोजन की सत्ता से संचालित यही तो ब्रह्माण्ड की कला है प्रकृति ने दिया तुझे ये मानव स्वरूप इसी कला को प्रयोजन देने को साथ में दिया ध्यान का वरदान बनाया एक नक्षत्र शक्तिपुंज पूर्ण पर डोलता-फिरता
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पायो कृष्ण स्वरूप वरदान तव अंकुरित भयो प्रणाम मेरे लेखों में है सुगन्ध अनूठी सादगी शिशु जैसी सब युगों से बड़ी आयु वाला शिशु युग-युगान्तर वाला निरन्तरता और अनन्तता का शिशु जिसकी निश्छलता विवेकियों के विवेक से भी अच्छी है भली है सादा सरल सपाट खरा वक्तव्य जो होता प्रस्फुटित सत्य प्रेम व प्रकाश से कवितामय है मेरा निवेदन रहस्यवाद की पर्तें खोलता दर्शनशास्त्र का पुट देता वेद और विज्ञान से आश्वस्त करता कुछ उगता-सा
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