मीना ऊँ
हे मानव! कैसे आओगे कैसे पहुँच पाओगे तुम मुझ तक तुम कहते हो ज़रा मिलना है पूरा मिलना शायद तुम्हारे बस में है ही नहीं तुमने चाह लिया कि मिलना है तो हे मानव! क्या तेरी चाह से ही होगा मिलन सब कुछ तेरी चाह से ही होना चाहिए जो तू चाहता है वही क्यों होए तो जान ले यह सत्य जब तक ना आवेगा बुलावा सत्यमय परम का तू नहीं जा पाएगा कहीं भी
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मन के शीशे से धूल साफ की खूब देखा जमाने का रंग पैसे का संग दिमाग के खेलों का रंग अहम् का ढंग पर सच सच के पास ही जाएगा पर सच सच के पास ही जाएगा यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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शुक्र का सूर्य परागमन हुआ वीनस सौंदर्य का प्रतीक एकदम ठंडा व एकदम गर्म दोनों का संतुलन ही सौंदर्य उपजाए अग्निपथ से तप कर शुद्ध तो होना ही होता है शुरू कर दी है यह यात्रा तपस्यामयी जिन्होंने प्रणाम के प्रवाह के साथ-साथ वो तो आसानी से जाएँगे गुज़र होकर जीवन की हर बाधा से तर युगों जैसे वर्षों से मेरी बातें सुन-सुन क्रोध मेरा कर सहन प्रताड़नाओं का मर्म गुन गुन तैयार हो रहे
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मीना अवतारों की शृंखला से जुड़ी उसी माला में पिरोई ईश्वर मत्स्यावतार से कल्कि तक का सफर मेरा सफर यह शरीर धारण करती है अवतार चेतना जहाँ तक उसे पहुँचाना होता है पहुँचाकर दूसरा शरीर धर लेगी दूसरा शरीर धर लेगी बदल लेगी अवतार चेतना स्वत: ही पुराने कपड़ों की तरह ये नश्वर शरीर पर सदा ही मार्गदर्शन देती सारी सृष्टि का खेल सारा का सारा सम्पूर्णता से दिखाती बताती सम्पूर्णता से दिखाती बताती नित
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जीतने की उमंग की तरंग थमने न पाए जीत जाने के उद्यम का श्रम रुकने न पाए सत्य कर्म प्रेम का माना मार्ग जो भी अपनाए ऐसे आत्मबली मानव के प्रभु हो जाते स्वयं सहाय जीत जाएँगे हम अगर तू साथ है अगर तू साथ है अगर तू साथ है ओ कन्हाई यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ
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प्रकृति सदा ही गोलाकार गोलाइयाँ लिए रचना रचती है सारे ब्रह्माण्डीय नक्षत्र सितारे ग्रह गोलाइयाँ लिए हैं अपने आप जलते-सुलगते ठंडे पड़ते बिगड़ते और बिगड़कर फिर-फिर बनते बनते ही रहते सदा कर्मरत प्रकृति की प्रगति औ’ उत्थान प्रक्रिया में संलग्न संघर्ष करते अनवरत अपनी सत्ता को मनवाते से अपनी-अपनी सामर्थ्यानुसार ब्रह्माण्ड को सौंदर्यमय बनाते से सम्पूर्ण सृष्टि की अनन्त व्यवस्था में पूर्ण योगदान देते जीवंत रहकर जीवंतता प्रदान करते कांटे ही सीधे होते हैं अकड़े
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मनु का सत्य : भाग- 2 मनु अणु का विस्तार मेरे से बाद मेरे से पहले कुछ भी नहीं मेरा अस्तित्व बीच में तुम नाचो चहुँओर पास आकर फिर भागो दूर-दूर भागो, भागते रहो युगों-युगों से यह भागदौड़ तो तभी समाप्त होगी जब मुझ जैसे ही पारदर्शी पारे की तरह होकर मुझमें ही विलय हो जाओगे पूर्ण ज्ञान-विज्ञान है जो नहीं जाना गया वही अज्ञान है मीना अणु है अणु का विज्ञान है मीना अणु
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भाग 1 : मीना का विज्ञान प्रभु – Supreme – परम प्रभुता – Supremacy – परमता परम तत्व अणु तत्व – Essence of atom सत्य का तत्व – Essence of truth अणु – Atom-essence of whole & complete पूर्णता का तत्व अपनी पूर्णता में स्थिर मीना तुम मेरे चारों ओर आ जाते हो इर्द-गिर्द घूमते हो मेरे ही आसपास ऊर्जा पाकर लेकर फिर दूर भाग जाते हो अपने कर्म खेलने खिलाने को पर मेरी परिधि
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मनु मेरे लिखने का नाम मेरे अंतर के लेखक का नाम मनु मेरे अंतर की आत्मानुभूति का नाम मीना ऊँ मेरे सांसारिक संबोधन का नाम मीना जी यही है मीना ऊँ मीना ओऽम् अनुभूति योग अनेकों अव्यवस्थाओं को व्यवस्थित रखने की चेतना का नाम ही मीना है जो पूर्णता का नित्य प्रवाह है शान्त क्रियाशील व सर्वसमर्थ है शिक्षा वेद की ब्रह्माण्ड ज्ञान की औ’ प्रकृति के विधान की स्वयं युगचेतना की परम कृपा से
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ओ मेरे कृष्ण खुश हो ना अब तो तुम अब तो मुझे कभी भी छोड़कर नहीं जाओगे न तुम जा ही नहीं सकते इतनी तपस्या इतनी परीक्षाएँ ले लीं यही चाहते थे न तुम कि तुम्हारे ही धर्म सत्य प्रेम और कर्म पर टिकी रहूँ तुम ही हो जाऊँ कोई भी ऐसा पहलू जि़न्दगी का जिसे मैं छू न सकूँ कोई भी वातावरण जिसे मैं झेल न पाऊँ तुमने छोड़ा ही नहीं जानती हूँ ये
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