अवचेतन मन

कितना अद्भुत असीम अपरिमित है यह अवचेतन मन सब जानता है देखता है और एक कुशल पुस्तकालय वाचक, librarian, की तरह सारे के सारे रिकार्ड रखता है सदा संभालकर रखता है सारी विकृतियाँ सारी स्मृतियाँ विश्व की सबसे बड़ी और सबसे सूक्ष्म पुस्तकालय यहीं तो है भंडार चित्रों का घटनाओं का रंगों का पाप-पुण्य के लेखों का कुछ भी छुपा नहीं इससे सब अंकित है इस अवचेतन मन पर सम्पूर्ण जीवन व्यवहार क्रियाएँ प्रतिक्रियाएँ परिणाम निर्भर इसी पर लेकिन चतुर वही चेतन मन चतुर वही चेतन मन… जो सही क्षण पर सही संदर्भ का ज्ञान ले होता संभवामि युगे-युगे सारी व्यथाएँ दूर करो माँ हो कुसुमित मेरा जीवन जगमग-जगमग दीया जलाऊँ मनभावन जग उजियारा कर दूँ जो हो तेरा सहारा मोहन प्यारा प्रभु न्यारा तारनहारा पायो कृष्ण स्वरूप वरदान तव अंकुरित भयो प्रणाम !! यही सत्य है यहीं सत्य है

क्यों कृष्ण गुरुदेव

रोका क्यों नहीं कृष्ण युद्ध रोका क्यों नहीं क्यों होने दी नष्ट सर्व उन्नत सभ्यता संस्कृति भारत की क्यों होने दिए नष्ट हमारे महान सिद्ध गुरु धीर-गंभीर क्यों मिटा डाले महान परम्परा के रखवाले वीर क्यों होने दिया दिव्यास्त्रों का प्रयोग अपनों पर ही समय व धन का दुष्प्रयोग द्वेषों पर ही क्यों क्यों क्यों क्यों कृष्णा गुरुदेव मेरे बोलो न गुरु से पूछ सकता है तो केवल उसका परम शिष्य ही अर्जुन ने मना किया युद्ध को तो क्यों पढ़ा दिया उसे महान ज्ञान अब उसी वचन को उसी ज्ञान के वचन को याद करो बोला था जब-जब अत्याचार बढ़ेगा आऊँगा संभवामि युगे-युगे आना ही होगा तुझे आना ही होगा वचन गीता वाला निभाना ही होगा पर अब बनना होगा नारी सकल अपूर्णता संहारी !! प्रणाम मीना ऊँ

जोत

एक रोशनी जो सब ब्रह्माण्डों से परे है करोड़ों सूर्यों से भी तेजवान है प्रकाश से भी वेगवान है सम्पूर्ण सृष्टि उजागर कर दे वह तो तेरे अपने अन्दर ही है रे मूर्ख मानव ! तेरे मन में ही है वह ज्योति जो सब रोशनियों की सरताज है देख समझ पहचान-तू ही प्रभु तू ही प्रेम, प्रेम ही प्रभु ओ प्रभु के अंश बन जा प्रभु बन जा रोशनी कर दे जग रोशन नई आशा जगी है मन में पूर्ण विश्वास है मानवता में आएगा वही सवेरा जो होगा मेरे ख्यालों का बसेरा जला ज्ञान ज्योति प्रभुमयी गीतामयी हुई मीना बनी कल्कि अवतार सत्यमेव जयते यही सत्य है। यहीं सत्य है। प्रणाम मीना ऊँ

परम सत्य

नमामि वंदे गुरु समूह माँ परम शक्ति संचालिनी सब गुरुजनों का वरद्हस्त मेरे सूर्य स्थान पर सहस्रार पर माँ सरस्वती दुर्गा काली आवें ब्रह्मा स्वयं पाठ पढ़ावें सब ब्रह्मा पुत्र सरस्वती पुत्र स्वयं ही दीक्षा दे जावें ऊँ भी ब्रह्मा विष्णु महेश भी सभी देखे अनदेखे गुरुजन श्री ईसा, श्री मूसा, श्री रहीम श्री राम, श्री कृष्ण, श्री बुद्ध श्री विवेकानन्द, श्री साँई बाबा श्री नानक देव, श्री मीरा श्री तुलसी, श्री कबीर सब स्वयं ही दिखा रहे राह ज्योतिपुंज बना रहे इस मीना शरीरधारी जीव को सर्वशक्तिमान के सभी संदेशवाहकों द्वारा दीक्षित पोषित व प्रेषित यह प्राण यही सत्य है। यहीं सत्य है। प्रणाम मीना ऊँ

मानव-मन

आप ही अक्षर ब्रह्म आप ही तत्व बीज आप ही तत्व अविनाशी आप ही तत्व विनाशी आप ही तत्व सुबुद्धि आप ही तत्व कुबुद्धि आप ही तत्व शैतान आप ही तत्व भगवान मानव बुद्धि सुर में तो भगवान सुर में नहीं तो शैतान यही सत्य है। यहीं सत्य है। प्रणाम मीना ऊँ

श्रीकृष्ण का विराट रूप

मेरे ज्ञानचक्षु का बिन्दु बन गया सभी गुरुजनों ने स्वयं हाथ रखा दीक्षा दी दर्शन दिया मार्ग दिखाया सब कुछ इसी शरीर में रखे-रखे मन-मस्तिष्क आत्मतत्व में समाया बनी कड़ी उत्थान की मीना की काया प्रभु आया यही सत्य है। यहीं सत्य है। प्रणाम मीना ऊँ

परम योग

ऊँ ग्राँ ग्रीं ग्रों स: गुरवे नम: परम गुरु प्रणाम सम्पूर्ण मानव शब्दकोषों में एक भी शब्द ऐसा नहीं जो इस अनुभूति को बता सके राई जैसा ब्रह्माण्ड उससे भी परे सकल ब्रह्माण्डों को एक मुट्ठी में थमा दिया सत्य बता दिया यही है सत्य यहीं है सत्य !! प्रणाम मीना ऊँ

ज्ञान-दान दीक्षा

मुझे युग-युगान्तर तक सहज उपलब्ध हों ज्ञान ब्रह्मा का दिल बड़ा ब्रह्माण्ड का तेज सूर्य का अमृत चन्द्रमा का विस्तार सागर का ज्ञान शारदा का शक्ति शिव की नैतिकता विदुर की गुण राम के त्याग दधीचि का नीति-वैराग्य कृष्ण का क्षमा ईसा की सेवा हनुमान की फकीरी कबीर की भक्ति नानक की प्रीति मीरा की तपस्या बुद्ध की दया महावीर की प्रतिज्ञा प्रताप की चरित्र शिव का बुद्धि की तीव्रता विवेकान्द की प्रभावी व्यक्तित्व रजनीश का सूक्ष्मदर्शिता अरविन्द की कृपा सांई राम की श्रद्धा रविदास की उदारता सनातन धर्म की आँचल प्यारभरा माँ का अनुपम प्रेम माँ भारती का प्रभुता सत्य प्रेम कर्म व प्रकाश की मुझे युग-युगान्तर तक सहज उपलब्ध हों हे प्रभु गुरु के सत्य कर्म व धर्म की शक्ति भी तो दो देनी ही होगी मन ही मन गुरु को शत्-शत् प्रणाम करती हूँ प्रभु मेरे पापों को क्षमा करो सत्याचरण नम्रता सहनशीलता की शक्ति दो शक्तिरूप…

मंगलाचरण

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु गुरूर्देवो महेश्वर:। गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥ जन्म-जन्मान्तर से सृष्टि के आरम्भ से ही हूँ थी और रहूँगी युगों-युगों से जन्म-जन्म से मेरे गुरु स्वयं ब्रह्मा विष्णु महेश हैं आत्मा का काव्य सत्य है यही सत्य है। यहीं सत्य है।। प्रणाम मीना ऊँ

प्रणाम बंधु निवेदन

न प्रशंसा करो, न आलोचना, न ही तुलना करोन प्रेम करो, न ही अपनाओ, न ही नकारोबस स्वीकारो, एक प्रकाश का राही हूँ नि:स्वार्थ सरल प्रेम का सागर लिए स्व अनुभूत प्रकाश की गागर लिए प्रणाम कर्म को अर्पित, सत्य यज्ञ की आहुति होने को समर्पितएक प्रकाश का राही हूँ, बस स्वीकारो भान नहीं योग्य हूँ या अयोग्य, समर्थ हूँ या असमर्थ दृढ़ प्रतिज्ञ हूँ एक निश्चय हूँ यही एक राह है जीवन की प्रणाम में साथ बढ़ने को अग्रसर बहने को तत्पर होने को संयुक्त सत् चित् आनन्द के स्रोत में, करने को प्रणाम प्रकाश का विस्तार यही है प्राकृतिक अस्तित्व मेरा यही है रूपांतरण का सार बस स्वीकारो एक प्रकाश का राही हूँहूँ अर्पित समय की पुकार को सत्य की गुहार कोकरने को सर्वस्व न्योछावर ताकि दे सकूँ यह प्रमाण काल को जो यहीं परिष्कृत हुआ, इसी धरा पर पूर्ण समर्पित हुआ नहीं रहे कज़र् इस जन्म का…