स्पष्टता

स्पष्टता चेतना की वृद्धि को दर्शाती है। यह हमारे अस्तित्व के निरंतर और प्रगतिशील, गहन, ऊंचा और चौड़ा होने से विकसित होती है। यह मन, शरीर और जीवन के सभी बंधनों को काटने से होता है। यह तब उतरती है जब हम अहंकार के मकड़जाल से मुक्त हो जाते हैं और आत्मा के प्रकाश का अनुभव करने लगते हैं। जब हम ब्रह्मांड में आत्मा की इच्छा और उद्देश्य को महसूस करते हैं और एकत्व के विचार में रहते हैं, तो स्पष्टता अपने चरमोत्कर्ष को छूती है। स्पष्टता के लिए हमें अपनी वास्तविकता का पता लगाने के लिए अपने भीतर ही खोजना होगा। इस उद्देश्य के लिए नए युग के आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा विकसित और प्रचारित किए गए कई मार्ग हैं, लेकिन जो भी मार्ग अपनाया जाए उसके लिए विश्वास, साहस, दृढ़ता और समर्पण की आवश्यकता है। यह एकमात्र बल है जो मन को प्रकाशित कर सकता है, वास्तविकता को प्रकट…

स्वयं के साक्षी बनो

अपने आप के साक्षी बनना सीखें, ताकि आप अपने मन के हस्तक्षेप के बिना अपने अंतर के परम तत्व, सच्चे अस्तित्व के संदेशों को पढ़ सकें। ऐसा करने से, आप स्पष्टता प्राप्त करेंगे। यह आसान नहीं है। इसे सिद्घ करने में कुछ महीने लग सकते हैं। फिर भी प्रारम्भ करना महत्वपूर्ण है। इससे आपको वर्ष के संदेश को भी समझने में मदद मिलेगी। इसलिए अब दूसरों को जांचना छोड़ दें और स्वयं को देखना शुरू करें। दूसरों को जांचते समय, आप निर्णयात्मक हो जाते हैं। अब खुद को जांचने का समय है। ताकि आप उन संदेशों को पढ़ सकें जो दिव्य आपके पटल पर लिख रहे हैं। और बहानों को बनाने, नकारने के लिए अपने दिमाग का उपयोग करने की अपेक्षा परम सत्ता सर्वोच्च को इन संदेशों का पालन करने के लिए, शक्ति प्रदान करने के लिए कहें। यह सब अपने साक्षी होने से शुरू होता है। प्रणाम मीना ऊँ

ऊर्जा का आह्वान

हमारे पास कार्य करने के लिए ज्ञान साधन और उपकरण हो सकते हैं, लेकिन शक्ति बल या सही मार्गदर्शन के बिना, हम कुछ भी प्राप्ति नहीं कर सकते। ब्रह्माण्ड में कोई ज्ञान नहीं है। उसमें केवल ऊर्जा होती है जो ज्ञान को प्रवाहित करती जाती है। सभी विकसित आत्माओं के विचार और ज्ञान वहां रहते हैं। इन ऊर्जाओं क आह्वान करके उन सब विकसित लोगों से जुड़कर, हम उनका शुद्ध ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यही कारण है कि उनका आवाहन करना और पुकारना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए यदि आप एक कलाकार हैं, तो देवी सरस्वती को प्रज्वलित करें। यदि चित्रकारी की आकांक्षा है तो प्रारम्भ में यह आपकी रेखाओं में कुछ बल लाएगा। फिर जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ेगा, पकेगा यही रेखाएं जीवंत हो उठेंगी, रंग भी स्पंदित होने लगेंगे। यदि लेखन कौशल में सुधार लाना है, तो विकसित लेखकों से जुड़े रहें, और उनके विचार आपकी लिखित अभिव्यक्ति में…

हे मानव ! तमस की निद्रा से जाग !

इतने सारे बुद्धिमान मानव होते हुए भी विश्व विवेकहीन महामूर्खों की बस्ती बन कर रह गया है। एक ओर महामारी कोविड-19 कोरोना से लड़ने हेतु अंधाधुंध व्यय कर रहा है। सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त कर आधी अधूरी व्यवस्थाएं कर रहा है। उनको बचाने हेतु जिनका कि शायद मानव समाज देश और विश्व हित में कोई भी योगदान न हो। दूसरी ओर अपरिमित धन व्यय कर रहा है युद्ध के लिए आयुधों पर उनको मारने के लिए जो हृष्ट पुष्ट हैं नौजवान हैं विश्व का भविष्य हैं। ऊपर से पर्यावरण का सत्यानाश। वाह रे मानव! बलिहारी तेरी दोगली नीति की। मानव का इतना पतन परम बोधि व प्रकृति को कभी भी मान्य ना होगा प्रकृति अब अपने हिसाब से छंटनी करके ही रहेगी। प्रकृति के इस प्रकोप कोरोना को कम करने की प्रार्थना करना तथा सावधानी रखने का प्रयत्न करना तो स्वाभाविक व उचित ही है पर इसके साथ ही इस साधना…

एक प्रश्न पूछ रहा प्रणाम

हे मानव ! तू किसे पूजता है तेरा आराध्य या ईष्ट कौन है किसे याद करता है फूल-पत्र, भोग व प्रसाद चढ़ाता है कहाँ मुसीबत में भेंट प्रार्थना व अर्चना करता है भजन कीर्तन करता है। तू जिसके लिए यह सब करता है और गर्व से कहता है कि मैं तो अमुक-अमुक को गुरु मानता हूँ, अमुक-अमुक देवी देवताओं का भक्त हूँ तो फिर तेरा समर्पण पूर्ण क्यों नहीं है। क्यों इधर-उधर भागता है कि तेरी समस्याओं का समाधान और उल्टे-सीधे अज्ञानतापूर्ण प्रश्नों के उत्तर मिल जाएं। ज्योतिष वास्तु या कोई कष्ट निवारक ही मिल जाए, कुछ नगों मंत्रों या अन्य उपायों से चमत्कार हो जाए। ये सब बाहरी फैलाव या भागदौड़ क्यों, दिमागी जोड़-तोड़ क्‍यों । क्यों जब तेरा जहाँ से जी चाहे वहीं से तुझे सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाएं, मुसीबतें या सांसारी कष्टों का नाश हो जाए। ऐसी शब्दों की बौछार हो जाए जिसमें तू अपनी…

अन्तरात्मा की आवाज सुन कर्मरत होओ

हे मानव! अब समय आया है चैतन्यता एवं जागरूकता पर काम करने का। चैतन्यता की पहचान है अपने अन्दर झाँककर बिल्कुल शून्य होकर आवाज सुनो बाह्य चैतन्यता से मुक्त होकर। अभी मन, बुद्धि, चैतन्यता की आवाज में अन्तर करना मानव भूल गया है। सदियों से सोई हुई आत्मा की आवाज (युग चेतना की आवाज) को जगाने की साधना का समय प्रारम्भ हो गया है। जब आप पूर्णतया शान्त हैं अर्थात निर्लिप्त होकर अर्न्ततम्‌ स्थिति तक पहुंचते हैं तब जो प्रतिध्वनित हो वही आत्मा की आवाज है। फिर भी मानव यह नहीं समझ पाता कि यह मन बुद्धि की आवाज है या आत्मा की आवाज है। इसके लिए आरम्भ में कुछ कठिन साधना करनी होगी जब लगे आपके अन्दर से कुछ सन्देश व निर्देश उठे हैं तो उनको ब्रह्मवाक्य समझकर उनका पालन करो इस प्रकार पालन करने पर यदि वह विवेक जगाते हैं वातावरण शुद्ध व आनन्दमय बनाते हैं तथा आपको…

सत्य प्रेम व कर्म द्वारा आध्यात्मिक स्वास्थ्य

कलियुग में पार लगाने के सर्वोत्कृष्ट साधन सत्य प्रेम व कर्म है और सर्वोत्तम साधना है ज्ञान भक्ति और कर्म की। कर्म दोनों में है एक में आन्तरिक धर्म और एक में बाह्य कर्त्तव्य कर्म । सत्य निर्भय बनाता है प्रेम निर्मल करता है और कर्म पुरुषार्थ का मार्ग प्रशस्त करता है। सत्य प्रेम व कर्म की पूर्णता से वो ज्ञान जागृत होता है जो समस्त अज्ञान रूपी अंधकार को काटकर उस प्रकाश से प्रकाशित कर देता है जिसमें सच्चिदानन्द स्वरूप का दर्शन हो जाता है। सत्य प्रेम व कर्म के इस अलौकिक चमत्कार से आत्मसाक्षात्कार तभी संभव है जब शरीर मन व आत्मा में लयात्मकता व एकात्मकता हो । जब तक स्वयं से एकात्म न होगा तब तक बाहर भी एकात्म वाला भाव प्रसारित नहीं हो पाएगा। सत्य की सबसे बड़ी साधना है मनसा वाचा कर्मणा एक होना जो सोचो वही बोलो वही करो । सत्यनिष्ट मानव आत्मा के…

सत्य निर्भय है

विजयी होगा ही- उजागर होगा ही मेरा पूर्ण अस्तित्व मानव के उत्तरोत्तर विकास और भारत के भविष्य को सुदृढ़ करने हेतु कर्मरत है। भारत के गौरव के पुर्नस्थापन के लिए सही पृष्ठभूमि तैयार करने की सतत्‌ साधना का ही परिणाम है प्रणाम अभियान। मेरा सब कुछ लिखना, स्वाध्याय, ध्यान, प्रणाम योग कक्षाएँ लेना, लोगों से सम्पर्क करना, हीलिंग-वेदना हरण स्पर्श देना व सिखाना, परामर्श करना, भारतीय सनातन सत्यधर्मिता से सबको अवगत करना। सभी प्रकार के माध्यमों से भारतीय व अन्य सभी मानवों को जागृत करने का निरंतर उद्यम करना। मानव की असीमित दिव्य शक्तियों को पूर्णतया प्रस्फुटित करना- श्रीकृष्ण के गीतोपदेश के आधार पर। इसी कर्मयोग की धारा को प्रणाम रूप में निरंतर गतिमान रखना ही मेरा धर्म-कर्म है। यही आने वाले कल की सुप्रभात की तैयारी है। पूरा है विश्वास - आयेगा ही वह स्वर्णिम समय, वो प्रकाशित पल जो स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद के सपनों को साकार…

भारत भाग्य विधाता कहां हो, भारत भाग्य विधाता कहां न हो

भारत भाग्य विधाता कहां न हो हे सनातन मानव ! तू कहां खो गया है इतनी गिरावट-अधोगति कि मानव त्राहि-त्राहि कर रहा है मानवता घुट-घुट कर दम तोड़ रही है। क्या ये पढ़े-लिखे लोग हैं इनकी शिक्षा दीक्षा कहां की है। भाषणों का स्तर केवल अपनी ही आत्म प्रशंसा और बाकी सबकी भर्तसना पर ही उठकर गया है क्या कोई ऐसा आत्मवान-शक्तिमान मानव बचा ही नहीं भारत में जो उठे और इन महामूर्ख भ्रष्टाचारी नेताओं को ठिकाने लगा दे। जब कांग्रेस पप्पू और मिट्ठू बोलते हैं तो बीजेपी के ही नम्बर बढ़ा देते हैं और जब बीजेपी के पिट्ठू और टट्टू बोलते हैं तो कांग्रेस के नम्बर बढ़ जाते हैं। क्या ताजमहल क्‍या लालकिला क्या बहाई या क्‍या अक्षरधाम आदि-आदि। ये सभी मध्य इमारतें क्या बिगाड़ रही हैं देश का मानवों का। जो इतना वाद-विवाद इन पर किया जाता है। जब भी देश में द्वेष घृणा हिंसा अराजकता और अभद्रता…

अनुभूत ज्ञान

मूलरूप ज्ञान : वास्तविक ज्ञान जो ज्ञान ध्यान में प्राप्त होता है उसी का प्रसार ही मानव को उत्थान व ख्याति के उच्चतम स्तरों तक पहुंचाता है। मानव जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करता है। संसार से सीखा जाना अभ्यास किया गया ज्ञान व्यवसायिक दृष्टिकोण से अच्छा सिद्ध हो सकता है। परंतु मानव के आध्यात्मिक उत्थान के लिए या मानव को उत्कृष्टता प्रदान कर उत्थान की चरम सीमा तक ले जाने में उसकी उपयोगिता कम ही होती है। रामायण रटने से या एकदम राम जैसा व्यवहार करने से कोई श्रीराम नहीं बन सकता ना ही गीता गुनने से कोई श्रीकृष्ण ही बन पाएगा। जो बनेगा केवल अपने बलबूते पर अपने ही सत्य की साधना से बनेगा। बड़ी-बड़ी बाते प्रवचन शास्त्रार्थ धरा का धरा ही रह जाएगा। हां भूतकाल के संदर्भ से ज्ञान प्राप्तकर उस पर चिंतन मनन कर भविष्य का मार्ग चुनने में सहायता अवश्य प्राप्त होती है। ध्यान को आधार…