मानव तेरी छवि हो परम : छवि का भव्य प्रतिबिम्ब
स्मृति अनंत सागर, स्मरण की बना मथनी, बुद्धि की बना डोर, इच्छा की लगा शक्ति, ध्यान का लगा ज़्ाोर, काल का चक्र घुमा पाया अनमोल रतन तत्व ज्ञान का मानव विधान का स्वत: ही सीखो और आगे बढ़ो। यही है श्रीकृष्ण का स्वाध्याय योग। हम अपने अधूरे ज्ञान को बहुत कुछ मान लेते हैं, और उसकी अहंकारमयी चादर अपने चारों ओर लपेटकर अपना व्यवहार निश्चित कर लेते हैं। संसार से प्राप्त अपरा ज्ञान व तकनीकी ज्ञान को भौतिकता की अंधी दौड़ में व व्यापारिक दिशा में पूरी शक्ति से लगा देते हैं। व्यापारिक दृष्टिकोण का फल भी व्यापारिक ही होगा। जब तक उस भौतिक ज्ञान को भुनाने की शक्ति रहेगी काम चलता रहेगा जब शारीरिक शक्ति चुक जाएगी, एकदम खाली-खाली महसूस करोगे और जो संग्रह किया उसमें लिप्सा और आसक्ति बढ़ जाएगी। फिर बचेगा क्या बस, तनाव, कुंठाएँ, मानसिक-शारीरिक पीड़ाएँ और बीते दिनों को याद कर वर्तमान को कोसना। कमाने…
