जीकर गीता ज्ञान हो मानव महान कहे प्रणाम
भारत एक धर्मपरायण देश है। कोने-कोने में गीता गूँजती है। जन्माष्टमी पर तरह-तरह के आयोजन कर गीता के सृजनहार को याद किया जाता है। खूब धन व्यय किया जाता है। भजन-कीर्तन की भरमार रहती है मगर गीता के वचनों पर चलने की बात, उसे जीकर जीवन धन्य करने की बात इस पूजा-पाठ के शोरगुल में अनायास ही कहीं खो गई है। अगर गीता को गुनकर जीया जाए तो भारत की सारी समस्याएँ खुद ही हल हो जाएँगी। गीता आत्मा है भारत की उत्कृष्ट संस्कृति की। भारत के शरीर को तो आज़ादी मिली मगर आत्मा अभी भी स्वार्थी मानसिकता के गिरवी रखी हुई है और जब तक आत्मा जागृत नहीं होती शरीर को तरह-तरह की व्याधियाँ सताएँगी ही। भारतीयों का धर्म में विश्वास तो है पूजा पाठ भी है पर कर्म एकदम नदारद है। गीता के दूसरे अध्याय में इक्तीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं- धर्म्याद्धि युद्धाच्छेयोऽन्यात्क्षत्रियस्य न विद्यते अपने धर्म…
