ज्ञान की सार्थकता
हे मानव! यह सत्य जान ले कि :-सिंहों के नहिं लेहड़े, हंसों की नांहि पांतलालों की नहिं बोरियां, और संत न चले जमात। शेरों के लेहड़े या भीड़ नहीं होती भेड़ बकरियों की तरह जिन्हें कोई भी हांक ले जाए। हंसों की बतखों की तरह कतारें की कतारें नहीं होतीं। रत्न हीरा माणिक मोती बोरी भर भर नहीं होते। लालों (सपूतों) के ढेर नहीं होते। कोई-कोई धरती का लाल सच्चा सपूत होता है और सच्चे संतों की भीड़ नहीं होती जमातों में नहीं चलते। आज का युग भयंकर ज्ञान के दौर से गुजर रहा है। अधूरा थोथा, तत्व रहित ज्ञान और उसी के प्रचार व विस्तार का युग। कोरे किताबी ज्ञान और उसी ज्ञान के शब्दों के बल पर, अपने अहम् को तुष्टï कर, अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेने का मशीनी-कलियुग। ज्ञान पाने वाले भी, जो कुछ सुना या पढ़ा उसे घसीटकर अपने ही मानसिक स्तर पर लेे आते…
