तीर्थाटन बना पर्यटन
हे मानव ! तूने अपनी बुद्धि और ज्ञान का सारा का सारा विकास अपने चारों ओर की वस्तुओं को अपने ही मनोनुकूल बनाने में लगा दिया है। आश्रमों व तीर्थों में भी जो कुछ तेरे मन की खुशी दे, तन को सुख और आराम दे दिमाग को शान्त करे वही ढूँढ़ता है। जैसे कोई बाहरी उपाय ही तेरी इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर दे और तुझे कोई विशेष श्रम और आध्यात्मिक उपक्रम न करना पड़े। कोई शार्टकट अथवा छोटा सुगम मार्ग मिल जाए इसी जुगाड़ में बुद्धि चलती है। तीर्थाटन को भी पर्यटन में बदल दिया है। अपना ज़मीर व आत्मा जगा सच्चाई समझ। अपनी प्रकृति और प्रभु की प्रकृति से छेड़छाड़ मत कर। तेरी सारी की सारी चतुराई धरी की धरी रह जाएगी जब प्रकृति का तांडव होगा और उसका प्रकोप सारी अपूर्णता बहा देगा। भारतीय संस्कृति जो वेदशास्त्रों के नियमों पर आधारित है व मानव उत्थान व…
