युगदृष्टा दोहराए नहीं जाते

सच्चे और वास्तविक युगदृष्टा या युग प्रवर्तक जो पूर्णता उत्थान व रूपांतरण की गति को दिशा व दशा देने आते हैं वो कभी भी एक जैसे नहीं होते न ही दोहराए जाते हैं। उनके शरीर छोड़ने के बाद उनका 'भाव' और अधिक उन्नत होकर नया रूप लेकर अवतरित होता है जिसे मानव फिर नहीं समझ पाते क्योंकि वो बीत गई छवि को या मन में बनाई किसी छवि विशेष को ही चिपके रहते हैं और उसी की पूजा-अर्चना प्रचार व प्रसार करने में ही अपने को धन्य मानते रहते हैं। क्योंकि वो जीवित नहीं है उनसे प्रश्न नहीं कर सकता, न ही कह सकता है कि 'तूने अपने पर मेरे मार्गदर्शन अनुसार काम तो किया नहीं इसीलिए भटक रहा है' और वो उसको जो अब मूर्ति या तस्वीर रूप में है उसे सब कुछ सुना सकते हैं। शिकायत मनुहार अपेक्षा आदि कर सकते हैं। हे मानव! यह सत्य समझ ले…

मानव की चतुराई

अपनी ही ज्ञान ध्यान चिन्तन मनन की सतत् साधना से यदि आप सत्य को जान व समझ गए हैं तो पहले तो एक वाक्य सुनने को मिलेगा कि आप तो बहुत पहुंचे हुए हैं। समझ नहीं आता कि व्यंग्य है या प्रशंसा। उस पर हर ऐरा गैरा सबूत माँगता है और यदि आपने कुछ सबूत दे भी दिया तो वो भी आपको माने या न माने उसकी मर्जी। सबूत मांगने वाले यह नहीं समझते कि सबूत स्वयं को मनवाने के लिए नहीं है केवल यह बताने के लिए है कि सबका उद्देश्य सत्य को जानना होना चाहिए। पर ये सब कुछ प्रमाण मांगना परीक्षाएं आदि लेना इसलिए कि या तो आपको नकार सकें या यह जाँच सकें कि आपमें कितनी शक्ति है उसी के अनुसार आपका लाभ उठाया जा सके। इतना चतुर है मानव कि यदि आप उसकी सांसारी इच्छाएँ पूरी कर सकें अपने दर्शनों व आशीर्वादों से उन्हें सफलता…

हम कहाँ जा रहे हैं ये क्या हो रहा है?

बेचो बेचो सब कुछ बेचो जो भी हत्थे चढ़े बस बेचोबिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता बन गया जो व्यवसाय वो खेल नहीं हो सकता एक समय गुलाम बिका करते थे। अभी भी लड़के लड़कियों की खरीद फरोख्त की बातें सुनाई पड़ती ही रहती हैं। पर बुद्धिजीवियों ने कभी भी इसे उचित नहीं ठहराया। सदा मानव अधिकारों का हनन व समाज का कोढ़ बताया। इतने आलोचक व समाजसेवियों के जत्थे होने पर भी समाज दो वर्गों में सिमट गया है। एक बेचने वाले दूसरे खरीदने वाले। हर वो चीज़ जो कम से कम श्रम और समय में कमाई का रास्ता सुझाती है वो बिक रही है। तकनीक से लेकर बुद्धि तकï, जमीनों से लेकर रेल की पटरियों के बीच की जगह तक, मादक द्रव्यों से लेकर गुर्दों तक। भिखारी तक अपने बैठने की जगह या क्षेत्र, ठेकों व नीलामी पर उठा रहे हैं। दुनिया में मेहनत ईमानदारी मर्यादा…

रामसेतु- विहंगम दृष्टिकोण : भाग-2

''प्रकृति के नित्य निरन्तर सर्वव्यापक नियमों के सत्य पर आधारित'' हे मानव ! प्राकृतिक अनुकम्पा व सम्पदा से खिलवाड़ बन्द कर। मानव धर्म है प्राकृतिक सम्पदाओं को संवारना निखारना और सौन्दर्यमय बना कर मानव कल्याण के लिए उपयोगी बनाना न कि अपने क्षणिक स्वार्थी आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उजाड़ना। प्रणाम मीना ऊँ मानसपुत्री प्रकृति की, गत कई वर्षों से चेता रही है। जाग ओ मानव! प्रकृति से तारतम्य व संतुलन बना। उसके उत्थान कार्य में सहायक हो अन्यथा मानव अपने विनाश का कारण स्वयं ही होगा। रामसेतु विवाद धार्मिक व्यापारिक या राजनैतिक इतना नहीं है जितना प्रकृति को नियंत्रित कर अपने-अपने निजी स्वार्थों और अहमों की तुष्टि का है। मानव की तर्क पोषित बुद्धि सदा ही अपने कर्मों के पक्ष विपक्ष में अनेकों व्यक्तव्य प्रस्तुत कर ही देती है जबकि सत्य बहस का मोहताज नहीं। हे मानव सीधी सी बात तेरी समझ में क्यों नहीं आती कि भारतभूमि…

रामसेतु को समर्पित : भाग- 1

प्राचीन भारतीय धरोहर रामसेतु की रक्षा हेतु आत्मबली नेतृत्व चाहिए न कि राजनीतिकरण, केवल प्रचार से ही काम नहीं बनता। दृढ़निश्चय शक्ति व कर्मठता चाहिए। सत्यता, कर्म और प्रेम की शक्तिस्रोत है व सत्यज्ञान-प्रकाश का निरन्तर निर्झर है। इन चारों -सत्य कर्म प्रेम प्रकाश में से जो एक मार्ग में भी पूर्णतया स्थित होता है उसकी ओर प्रकृति अपनी न्याय व्यवस्था स्थापित करने के लिए शक्ति प्रवाहित करती है। जो अपना आराम व राजभवनों जैसा रहन-सहन त्याग और अपने अहम् कर्ताभाव व स्वार्थ को तिरोहित कर सत्य संकल्प के लिए साधारण मानव की भांति जी-जान से जुट जाएगा वही प्रकृति का चुना हुआ प्रतिनिधि होता है। कौन है जो अपनी गद्दी पदवी दण्डी मंडी छोड़ चल दे पैदल बापू की तरह कि बस अब करना या मरना है। कुछ करने को कहो तो समय ही कहाँ है, पूजा का समय है या भोजन की व्यवस्था होनी चाहिए या शिष्यों का…

जीवन का सार

सर्वशक्तिमान के समक्ष सम्पूर्ण समर्पण भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है। इस प्रकार की भक्ति में भक्त हर स्थिति एवं परिस्थिति को ईश्वर के प्रसाद स्वरूप ग्रहण करता है। इसका तात्पर्य है - अपनी शारीरिक मानसिक व आत्मिक शक्तियों को एकाग्र कर इन शक्तियों का उपयोग प्रत्येक क्षण को पूर्णता से जीने में करना। यहाँ आध्यात्मिकता का अर्थ है - कोई भी कार्य सही दशा व पूर्ण विश्वास के साथ करना। कोई भी स्थिति या परिस्थिति बेकार या महत्वहीन नहीं होती उसमें कोई न कोई गूढ़ संदेश अवश्य छिपा होता है। ईश्वर की यह सृष्टि त्रुटि रहित है, हमें यह बात समझनी चाहिए क्योंकि जब एक देवदूत स्वर्ग से वंचित हुआ तो उसे मोची के रूप में इस दुनिया में जन्म मिला ताकि उसे यह अहसास हो सके कि यह सर्वशक्तिमान भगवान के विवेक पर प्रश्नचिह्न लगाने का परिणाम है। उस देवदूत का इतना आत्मिक विकास हो चुका था कि वह…

संवेदनशीलता संतुलन

जब हम अपने ऊपर आध्यात्मिक रूप से कार्य करते हैं तो हमारी संवेदनशीलता भी बढ़ने लगती है या यूँ कहें आध्यात्मिक मानव की संवेदनाएँ भी विकसित होती हैं क्योंकि संवेदनशीलता के चरमोत्कृष्टता से ही तो प्रभु प्राप्ति की अनुभूति होनी होती है। सत्य आत्मानुभूति के पथ का लक्ष्य ही है कि मानव जीव को अपनी सभी संवेदनाओं, क्षमताओं और बोधगम्यताओं का अधिकतम विकास-संवेदनशीलता को चरम अवस्था- परम अवस्था तक पहुँचाने के मार्ग में अनेकों तपस्याओं और भिन्न-भिन्न अनुभूतियों से गुज़रना होता है। फिर इन सभी अनुभूतियों के प्रभाव से आन्तरिक दिव्यता की शक्ति से उबरना होता है। क्योंकि अनुभूतियों के अनुभव में लिप्त होना या रमना उत्थान में व्यवधान है। भरपूर आत्मबल से ही यह संभव है या यूँ कहें अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति व सघन ध्यान से प्रभावों से उबरना आत्मबल बढ़ाने का आधार बन जाता है। बाह्य साधनों व विधियों की बैसाखियों से परीक्षाओं को, तपस्याओं को, परे करने…

सत्य संभाषण

यही सत्य है कि जो सोचो वही बोलो और करो भी, मनसा-वाचा-कर्मणा पूर्णरूपेण सत्य होओ। इसका अर्थ यह तो कदापि नहीं कि यह तो करो ही, साथ-साथ कुछ और इसके अतिरिक्त भी बोलते रहो। जब मनसा-वाचा-कर्मणा सत्य हो जाते हैं तो प्रतिपल वाणी से केवल सत्य ही उच्चरित होता है-निर्भीक सत्य। कथा-प्रवचनों को नकारना नहीं है पर सोचो जरा कथा-कहानियों का सत्य कौन जानता है! केवल पढ़ा-सुना ज्ञान मात्र है। पूर्ण सत्य तो केवल जीकर जाना जाता है और जब बोला जाता है तो उसी क्षण का सत्य होता है। प्रणाम के लिए सत्य वही है जो जीकर जाना जाए। धार्मिक पुस्तकें शास्त्रादि सब ज्ञानमय हैं उनको बखानना कथावाचक या प्रवचनकारी का कर्म है, सत्यात्मा का धर्म नहीं। सत्यात्मा जो बोलती है वह जीवन का तत्व सार होता है, प्रतिपल चैतन्य ध्यान की प्रस्तुति होता है। संभाषण-निरर्थक संभाषण भी असत्य ही है, वाणी विलास है। यदि प्रवचनकारी या कथावाचक हो…

स्पष्टता अथवा पारदर्शिता

स्पष्टता व पारदर्शिता व्यक्ति की चेतना के विकास को दर्शाती है। यह मनुष्य की प्रगतिशीलता गहराई श्रेष्ठता विस्तार एवं एकाग्रता को विकसित करती है। यह मस्तिष्क शरीर और जीवन के सभी बंधनों को काटने से ही आती है। इसमें तभी वृद्धि होती है जब हम अपने अहम् के मकड़जाल से बाहर आते हैं और आत्म-प्रकाश के अनुभव लेना आरम्भ करते हैं। जब हम संसार में आत्मा की इच्छा व उद्देश्य को अनुभव करते हैं और एकात्म के चिन्तन में निमग्न रहते हैं तब हम पारदर्शिता के चरम बिंदु तक पहुँचते हैं। पारदर्शिता से ही हम अपने सत्य की खोज कर उसको जान सकते हैं, उसे पा सकते हैं। कई पद्धतियाँ हैं जिन्हें नवयुग के आध्यात्मिक गुरुओं ने इस लक्ष्य के निमित्त बनाया है और विकसित किया है। परंतु इस प्रकार के जो भी नुस्खे हैं उनके लिए दृढ़विश्वास साहस लगन तथा आत्मसमर्पण की आवश्यकता होती है। यही एकमात्र शक्ति है…

सच्ची विद्या केवल तकनीक नहीं

कोई भी विद्या जब तकनीक बन जाए और सब बिना विशेष प्रयत्न किए प्रयोग करने लगें, मनचाहे ढंग से उसका उपयोग करने लगें, विशेषकर स्वार्थी या व्यवसायी मनोवृति के हिसाब से तो उसका प्रभाव बहुत कम हो जाता है। जिस विधि से किसी को कुछ प्राप्ति होती है यदि वो उसे ही तकनीक बनाकर सिखाने लगे तो उससे कुछ भी प्राप्ति नहीं होने वाली। इसलिए यह अतिआवश्यक है कि पहले सुपात्र बना जाए फिर तकनीक केवल सहायता के लिए बताई जाए क्योंकि तकनीक कभी भी गारंटी नहीं है कि ऐसा करने से प्राप्ति हो ही जाएगी। तकनीक को ही दुहराए जाने से कुछ प्राप्ति हो जाएगी ऐसा लोगों को केवल भ्रम ही है और उनके इस भ्रमित मन का लाभ उठाकर कुछ व्यापारी गुरु स्वामियों ज्योतिषाचार्यों कर्मकाण्डी पंडितों आदि की दुकानें खूब चल पड़ी हैं। आज तरह-तरह की विधियों को नए-नए नाम देकर अज्ञानी जनता का शोषण बखूबी होता है।…