सनातन धर्म का सत्य

आजकल कई संस्थान सनातन धर्म के सत्य ज्ञान और विज्ञान की रक्षा व विश्वस्तरीय स्थापना का तथाकथित प्रयत्न कर रहे हैं। अच्छी बात है पर यह प्रयत्न करने वाले पहले इस शाश्वत सनातन धर्म के सत्य व वैज्ञानिक नियमों को जानें, समझें और उसी के अनुसार जीएँ तभी तो बात बनेगी। सत्य सनातन धर्म की स्थापना हेतु पूर्णतया सत्य होना ही वो आत्मबल व शक्ति देगा जो इस संकल्प के लिए अपेक्षित है। पहली बात कि सत्य सनातन धर्म किसी धर्म विशेष, किसी संप्रदाय या प्रचार का मोहताज नहीं। दूसरी बात सनातन सत्यधॢमता तो अपने आप स्वत: ही जब समय आता है तो सनातन सत्य जीने वाले किसी माध्यम के द्वारा उजागर होती है। इसे कोई रोक नहीं सकता, यही तो होता है संभवामि युगे-युगे। आज धर्म के नाम पर जो असत्य पाखंड ढोंग और अपना-अपना वर्चस्व मनवाने के लिए अखाड़ों मठों पद-पदवियों विशेष वेशभूषाओं अलंक रणों धन-वैभवों उपाधियों आदि…

होना है प्रकृति का तांडव

अब प्रकृति का तांडव अवश्यम्भावी है क्योंकि मानव तीर्थाटन व पर्यटन का भेद भूल गया है। तीर्थाटन प्रकृति के सन्निकट होकर उसकी विराटता व संवेदनशीलता को, विचारों व सांसारी भावों से रहित होकर, अनुभव कर आत्मसात् करने की प्रक्रिया है। सारे तनावों और भारों से मुक्त होकर अपने स्रोत के आनन्द को अनुभव करना है। कम से कम शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ केवल प्रकृति को ही पीना है जीना है। समाचार मिला लेह में बादल फटा भयंकर तबाही। दुख की अपेक्षा क्षोभ व एक अजीब सी संतुष्टि का भाव जगा। समझाते-समझाते आयु बिता रही है प्रकृति की मानव पुत्री पर… हे मानव! तू तो अड़ा है अपनी ही मनमानी करने पर। जो कुछ थोड़े अछूते पवित्र स्थल हैं धरा पर वहाँ भी उस स्थान के विशुद्ध विस्तार के आभामंडल के अनुरूप होने की अपेक्षा अपनी ही धुन में अपने ही भोगों में लिप्त जगह-जगह घूम-घूमकर भाग-भागकर सारा वातावरण…

प्रकृति-असत्य विनाशिनी प्रणाम प्रकाशिनी

जागो भारतीयों ! महाकाल का तांडव प्रारम्भ हुआ। बार-बार चेताया-जगाया पर मानव अपने कर्मों की डोर से बँधा प्रकृति नटनी की कठपुतली बना ही रहता है। प्रकृति का न्याय सर्वोपरि है जो मानव बुद्धि से परे है। सब कर्मों का चक्र फल यहीं पूरा होता है यही है सत्य। पर इस चक्र के जंगली स्वरूप को सुव्यवस्थित करने हेतु मानव को बुद्धि दी गई। जिससे अच्छी समाज व्यवस्था, सच्ची न्याय व्यवस्था और नीति-युक्त राजव्यवस्था का सुंदर समन्वय हो सके। ताकि सब सभ्य समाज में मिल-जुलकर सुखपूर्वक आनन्दपूर्वक रहें, तरक्की करें और प्रभु के प्रेम रूप को धरती पर मूर्तरूप दे पाएँ। पर जब न्याय समाज और राज सब की सब व्यवस्थाएँ सत्ता व स्वार्थ में लिप्त होकर झूठी और अमानवीय हो जाती हैं और जनसाधारण का उनमें विश्वास ही नहीं रह जाता तो जनता का क्रोध उन्माद के रूप में ही परिलक्षित होता है। उसके क्रोध-प्रदर्शन में विवेक या कोई…

अपूर्ण ज्ञान, मानसिक कुश्ती

आज ज्ञान इधर-उधर से ली गई जानकारी, कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा के बारे में होता है। इसमें उधार लिए हुए शब्द, बने-बनाए मंच और वैसे ही बनावटी श्रोतागण होते हैं। निष्क्रिय और कर्महीन दर्शक ही तो चाहिए बस ज्ञान का क्रियाकर्म करने हेतु। आज मुझे एक ऐसे ही गोष्ठी में जाने का अवसर मिला। मैं यह सोचकर वहाँ गई कि कुछ नया या क्रांतिकारी विचार सुनने को मिलेगा। लेकिन… मानव निष्कर्षों में फँसा हुआ है जो तकनीकी प्रयोगात्मकता से प्राप्त होते हैं जिसे वह समझता है कि वह ज्ञान के तत्व व थाह तक पहुंँच गया है। वह अपने इस अहम के वशीभूत होकर बड़ी-बड़ी बातों और तकनीकी शब्दों से दूसरों को भ्रमित करता है, जैसे व्याख्याता वैसे ही जिज्ञासु। कृष्ण और अर्जुन के मध्य जैसा संवाद अब कहाँ! श्रीकृष्ण सच्चे ज्ञान के ज्ञाता व प्रत्येक कला में निपुण, प्रत्येक कर्म में पूर्ण, इसी प्रकार अर्जुन भी अपने…

जन्म, पुनर्जन्म, पूर्वजन्म के कर्म, पिछला जन्म

ये सब मानव को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने को रचे गए थे। आज भी जब कोई कष्ट पाता है, या गरीब है तो उसे तसल्ली देने को कह देते हैं कि भई पूर्वजन्म का फल है जो भोग रहे हो। यदि सुखी है, अमीर है तो भी यही जवाब है कि पूर्वजन्म में अच्छे कर्म किए होंगे उसी का फल है। न कोई पूर्वजन्म है न होगा। मरने के बाद भी पुनर्जन्म या किसी चौरासी लाख योनि-चौरासी लाख- में पड़ना कि अच्छा कर्म किया तो अच्छी योनि का, बुरा कर्म किया तो बुरी योनि। ये सब ऐसे ही है जैसे बालक से कोई काम कराना हो या उसे सुलाना हो तो कहते हैं - हौआ आया या तुझे भूत पकड़कर ले जाएगा इत्यादि-इत्यादि। यदि किसी को विशेषकर हिन्दु धर्म के अनुयायिओं को कर्मजन्य फल अगले जन्म में भोगने या खराब योनि में पड़ने का भय न…

कर्मगति

जब जिज्ञासुओं के प्रश्नों के उत्तर नहीं बन पड़ते या नहीं कह पाते तो कह देते हैं कि पिछले जन्मों के कर्मफल हैं। कोई अमीर घर में पैदा क्यों होता है, कोई गरीब घर में पैदा क्यों होता है, जीव की उत्पति अपने अनुकूल वंशानुगत वातावरण में होती है। नाली का कीड़ा नाली में ही बच्चा पैदा करेगा। इसमें पिछले कर्मों को दोष देना व्यर्थ है। वैसे भी हम भारतीयों का राष्ट्रीय चरित्र बन गया है- अपनी कमियों असफलताओं का दोषारोपण दूसरे पर डाल देना। यह आलस्य है, कर्म न करने का बहाना है। यदि गरीबी पिछले जन्मों का कर्मफल होता तो कोई-कोई गरीब दुनिया का सबसे बड़ा अमीर क्यों बन जाता है? कारण है, तत्बुद्धि ज्ञान और कर्म। सही दिशा में कर्म पूरे मनोयोग और पुरुषार्थ से न कि पिछले जन्मों का कर्मफल। अगला-पिछला जन्म किसने देखा है। सब प्रश्नों को टालने के बहाने हैं या यह भी हो…

मार्गों की अटकन सत्य से भटकन

यह सत्य तो सभी जानते हैं, स्वीकारते भी हैं कि कोई भी मार्ग अपनाओ सभी परमात्मा तक पहुँचते हैं। पर यह सत्य समझने की चेष्टा कोई नहीं करता कि प्रत्येक मार्ग की अपनी साधना है जो व्यक्तिगत पुरुषार्थ पर निर्भर है। व्यक्ति यह तत्व भुलाकर अपने मार्ग को उत्तम बताने और जताने के फेर में स्वयं भी अपने धार्मिक मार्ग के कर्मकाण्डों क्रियाकलापों और दिखावटी प्रदर्शनों की भूल-भुलैया में जीवनभर फँसा रहता है। अपने-अपने मार्ग को सही व सर्वोत्तम बताने में अथक प्रयत्न करने वाले स्वयं कहाँ पहुँचते हैं, ये तो वो ही जाने। अपने अपनाए धर्म को दूसरों के धर्म से बेहतर बताने वालों में से क्या कोई कृष्ण नानक ईसा विवेकानन्द कबीर तुलसी या गांधी जैसा महान मानव बन पाया या बना पाया। मार्ग कोई भी हो, ज्ञान भक्ति या कर्म या अन्य कोई सब सीढ़ियाँ मात्र हैं प्रभुता की प्रभुताई- ऊँचाई तक पहुँचने की। अगर नहीं पहुँचे…

अदृश्य आंतकवाद

दक्षिण भारत यात्रा के अंश : भाग - 3 कन्याकुमारी होटल की खिड़की से बाहर दिखाई दे रहा है सागर का विस्तार ही विस्तार। हिन्द महासागर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का संगम। हल्की-हल्की लहरें, सूर्य की किरणें, उन्हें छूकर अठखेलियाँ करती हुई शान्त ठहरी हुई। अथाह जलराशि ध्यान में लीन बदलाव की तैयारी जैसी शान्त नि:शब्दता। श्री विवेकानन्द स्मारक व गांधी मंडपम में जाने का मन नहीं हुआ। पिछली शाम चक्कर लगा ही लिया था। अच्छी तरह समझ आ गया यहाँ भी वही हाल हो गया है जो ओरोविलियन और पांडुचेरी मदर के आश्रम का हुआ है। कोई भाव नहीं न कोई विचार विस्तार केवल एक भावहीन व्यापारिक-सा पर्यटक स्थल नक्शे पर दिखाने के लिए। न कोई इनका महत्व ठीक से बताता है न ही कोई इनके प्रति दिल से आदर दिखाता है। स्थानीय लोगों के लिए यह गौरव के स्थल नहीं व्यावसायिक केन्द्र मात्र हैं। केवल दानपेटियाँ…

अदृश्य आतंकवाद

दक्षिण भारत यात्रा के अंश : भाग-2 मन में बहुत उमंग थी श्री माँ और श्री अरविन्द जी की तपोभूमि व कर्मस्थली पांडुचेरी को दुबारा सोलह साल बाद देखने की। क्योंकि उनके सपनों की नगरी ओरोविलियन की भी बहुत चर्चा सुनाई देती रही है। समाधि दर्शन से जो अनुभूति सोलह साल पहले हुई थी उसकी याद भी पुलक जगा रही थी । पर ओरोविलयन पहुँचने पर वहाँ कुछ भी ऐसा नहीं पाया जो श्री माँ का विज़न था। कुछ अजीब-सा असंदिग्ध-सा वातावरण। मन बहुत घबरा-सा गया। फौरन ही बाहर निकलकर पांडुचेरी जो अब पुण्डुचेरी हो गया उसका रास्ता पकड़ा। वहाँ पहुँचकर समाधि दर्शन किया। दोनों समाधियों पर फूल सज्जा तो मनमोहक थी पर वहाँ भी वो पहले जैसी भावानुभूति नहीं हुई। बार-बार यही ध्यान आता रहा कि जो श्री माँ और श्री अरविन्द का सपना और दूरदर्शिता है उस पर काम नहीं हो रहा। एक उदासीनता सी छाई थी। वहाँ…

अदृश्य आतंकवाद : दक्षिण भारत यात्रा के अंश- भाग : 1

आजकल चारों ओर से और सभी प्रचार माध्यमों से आतंकवाद शब्द की गूँज सुनाई देती रहती है। यहाँ हमला हुआ वहाँ बम फूटा कहीं आक्रान्तों का आक्रमण,कहीं आपसी सिरफुटौव्वल जिधर देखो हिंसा का तांडव। जिनकी सारी सूचनाएँ बहुतायत से मिलती ही रहती हैं। जिस आतंकवाद का विरोध या प्रतिकार होता है कुछ मुठभेडें होती हैं वहाँ तो पता लग ही जाता है कि आतंकवाद है, घुसपैठ है, वहाँ सुरक्षा भी कड़ी की जाती है क्योंकि यह प्रत्यक्ष और दृश्य आतंकवाद है। पर उस अदृश्य आतंकवाद का कहीं भी विवरण या उल्लेख नहीं जो आराम से पसर कर भारतीय संस्कृति को निगल गया है और निगल रहा है। वो निश्चिन्त होकर अपने पैर पसार रहा है क्योंकि उसका विरोध या निराकरण करने वाला कोई सजग प्रहरी है ही नहीं, सब बखानने में लगे हैं। यह भारत प्रायद्वीप के निचले दक्षिणीय पश्चिमी तटों, क्षेत्रों व कन्याकुमारी तक स्पष्ट दिखाई देता है और…