पर्यावरण संवर्धन
हे मानव !तू प्रकृति बचाने की, पर्यावरण संवर्धन की बड़ी-बड़ी बातें करता है। वातानुकूलित कमरों में अपार धन फूंककर गोष्ठियों और सभाओं का आयोजन करने का दिखावा खूब कर रहा है। इन सेमीनारों का प्रदूषण कौन सम्भालेगा! बौद्धिक कचरा, खाने-पीने की व्यवस्था का कूड़़ा और कितने ही कागज फू ल-मालाएँ, दुनियाभर का तामझाम और माइक्रोफोन का शोर-शराबा। जितनी बड़ी पद-पदवियाँ, जितनी ऊँची पहुँच उतना ही बड़ा सेमीनार। इन सबसेे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। जब तक तू अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति सही नहीं करेगा, अपना आन्तरिक प्रदूषण साफ नहीं करेगा, हर समस्या को सेमीनार और गोष्ठियों में सीमित कर अपना ही अहम् तुष्ट करने की नहीं सोचेगा, पहले स्वयं पर काम करने का उद्यम नहीं करेगा, बाहर से किसी भी समस्या का समाधान कभी भी पूर्णतया नहीं हो सकता तब तक मानव यह नहीं समझेगा कि बाहर जो कुछ भी घटित होता है उसका कारण, बीज उसके अन्दर…
