भ्रष्टाचार कभी भी मंगलकारी नहीं
हे मानव! मत कर छीना-झपटी मत बन जा कपटी। भय रौब या लालच दिखाकर चतुराई से कुछ भी हथिया लेना कभी भी कल्याणकारी हो ही नहीं सकता। कागज की नाव कितने दिन चलेगी। गुरु दक्षिणा के नाम पर एकलव्य का अंगूठा ही मांग लेने वाले और अधर्म के पक्षधर सभी गुरुओं, आचार्यों की महाभारत युद्ध में क्या गति हुई सभी जानते हैं। एक ओर तो तू स्वर्गिक शान्ति व आनन्द चाहता है, दूसरी ओर भ्रष्टाचार में रमता है, उस पर तुर्रा यह कि उसी भ्रष्ट पैसे से पंडितों के चक्करों में पड़कर स्वर्ग के टिकट खरीदता है या लंबी-लंबी यात्राएं और बड़ी-बड़ी पूजाएं अनुष्ठान आदि कर ढोंगी पंडों को खिला-पिला कर पवित्र नदियों में डुबकियां मारता है। मंदिरों में भ्रष्टाचार की कमाई का करोड़ों-अरबों रुपयों का चढ़ावा चढ़ता है। भ्रष्टाचार के अनेकों रूप कलियुग में अपनी चरम सीमा पर पहुंच गए हैं। 1. शारीरिक : कुत्सित घृणित भयावह अप्राकृतिक शारीरिक…
