भ्रष्टाचार कभी भी मंगलकारी नहीं

हे मानव! मत कर छीना-झपटी मत बन जा कपटी। भय रौब या लालच दिखाकर चतुराई से कुछ भी हथिया लेना कभी भी कल्याणकारी हो ही नहीं सकता। कागज की नाव कितने दिन चलेगी। गुरु दक्षिणा के नाम पर एकलव्य का अंगूठा ही मांग लेने वाले और अधर्म के पक्षधर सभी गुरुओं, आचार्यों की महाभारत युद्ध में क्या गति हुई सभी जानते हैं। एक ओर तो तू स्वर्गिक शान्ति व आनन्द चाहता है, दूसरी ओर भ्रष्टाचार में रमता है, उस पर तुर्रा यह कि उसी भ्रष्ट पैसे से पंडितों के चक्करों में पड़कर स्वर्ग के टिकट खरीदता है या लंबी-लंबी यात्राएं और बड़ी-बड़ी पूजाएं अनुष्ठान आदि कर ढोंगी पंडों को खिला-पिला कर पवित्र नदियों में डुबकियां मारता है। मंदिरों में भ्रष्टाचार की कमाई का करोड़ों-अरबों रुपयों का चढ़ावा चढ़ता है। भ्रष्टाचार के अनेकों रूप कलियुग में अपनी चरम सीमा पर पहुंच गए हैं। 1. शारीरिक : कुत्सित घृणित भयावह अप्राकृतिक शारीरिक…

सत्य सनातन धर्म : नित्य निरन्तर शाश्वत विधान

हे मानव! यह सत्य धर्म जानसंसार में सब कुछ नश्वर है क्षणिक है। उत्पन्न होना, पूर्णता पाना, कुछ और उत्पन्न करना, प्रकट करना और अन्तत: लुप्त हो जाना। सब देखा-समझा व अनुभव भी किया जा सकता है। इस नश्वर संसार से परे एक और संसार है। जिसका आभास व ज्ञान केवल सनातन धर्म में पूर्णतया स्थित, स्थितप्रज्ञ आत्मवान मानव को होता है। इस ज्ञान का रहस्योद्घाटन व सत्य स्थापन सर्वोन्नत आत्मज्ञानी ही कर पाता है। यह पराज्ञान की पूर्णता है। ब्रह्माण्ड प्रकृति व जीव का सनातन वैज्ञानिक सत्य है। श्रीकृष्ण इस अपरा व परा ज्ञान-विज्ञान के पूर्ण मर्मज्ञ हुए। तभी तो सर्वकला सम्पूर्ण कहाए। धार्मिकता या अंग्रेजी शब्द, religion, सनातन धर्म की व्यापकता को कदापि परिभाषित नहीं कर सकते, न ही बखान सकते हैं क्योंकि मानवाकृत धार्मिकता या रिलीजन सनातन धर्म से सर्वथा भिन्न है। धार्मिकता, religion, शब्द से श्रद्धा व आस्था शब्द का भाव भासित होता है। श्रद्धा या…

मेरे मन वाला हो जा

ओ मानव ! तू प्रभु के मन वाला हो जा। यही तो परम की इच्छा है पर तू तो प्रभुता प्राप्त - गुणयुक्त - मानव को भी अपने हिसाब से ही चलाना चाहता है। प्रभुता को अपने मन या अपनी ही युक्ति-युक्त बुद्धि से चलाने वाले या पकड़ने वाले मानव के जीवन से प्रभु फिसल जाते हैं, निकल जाते हैं। गीता में श्रीकृष्ण का वचन है, 'तू मेरे मन वाला हो जा'। यह तो मीन - मछली - जैसा खेल है। मछली को ढीला पकड़ो तो भी हाथ से फिसल जाएगी, कसके पकड़ो तो भी रपट जाएगी। पकड़ एकदम सही दबाव वाली व सटीक हो तो ही बात बनती है। प्रभु के या उस परम सत्ता के मन वाला होने के लिए यह जानना ही ज्ञान है कि प्रभु के मन में क्या है। उसकी सृष्टि, सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ अनुपम कृति मानव के अस्तित्व व मानव जीवन का प्रयोजन क्या…

स्वर्ग सम जीवन

हे मानव ! कहां ढूंढ़ता है तू स्वर्ग। बड़ी प्रबल है तेरी स्वर्ग की इच्छा चाहे मर के मिले बस पाना ही है। तेरे काल्पनिक स्वर्गसम जीवन से अपेक्षाओं की कमी नहीं। एक दिवास्वप्न जैसी भ्रमित करने वाली मृगमरीचिका। अरे प्रभु ने तुझे वह सब क्षमताएं प्रदान की हैं जिससे तू अपने व अपने सम्पर्क में आने वाले सभी जीवों के लिए स्वर्गसम वातावरण उत्पन्न कर सकता है। अपना स्वर्ग आप बना सकता है तो उठ अज्ञान की निद्रा से जाग पूरे पुरुषार्थ से कर्मरत हो जा। धरा को स्वर्ग बनाने की प्रक्रिया पहले अपने चारों ओर स्वर्ग बनाने से ही आरम्भ होगी। प्रणाम बताए स्वर्ग सम जीवन की साधना का विधान :-- सर्वोत्तम साधना : ध्यान योग व स्वाध्याय योग- शिक्षा व ज्ञान की सच्ची सेवा संस्कार दान व माँ शारदे की विभूतियों-सत्य कर्म व प्रकाश का प्रसार - सर्वोत्तम कर्म- प्रेममय प्राणों का विस्तार स्वर्गिक वातावरण की पहचान…

सुसंस्कारित होओ

हे मानव ! अपने को व अपने स्वभाव को जानकर अपने ऊपर काम करने की तपस्या कर यही सच्ची साधना है। बचपन से ही कुछ आदतें स्वभाव रूप में ढल जाती हैं और जाने-अनजाने ही मानव इसी स्वभाव के अनुसार अपने सम्पर्क में आने वालों के साथ व्यवहार करता है। इसका प्रभाव क्या होगा इसका उसे तनिक भी भान नहीं हो पाता। अधिकतर इन आदतों और इन संस्कारों का कारण माता-पिता और सम्पर्क में आने वाले सम्बन्धी ही होते हैं। इन आदतों में प्रमुख हैं- - दूसरों का पक्ष न समझना no consideration - दूसरों के लिए विचारशील, संवेदनशील न होना no concern - दूसरों के लिए करुणा का अभाव no compassion - नखरे दिखाना snobbish - दूसरों से क्या लाभ मिल सकता है सदा यही सोचना selfish - दूसरों के लिए त्याग या प्रयत्न का नितांत अभाव! no effort for adjustment no sacrifice - किसी भी तरह दूसरों पर…

अज्ञान व अचेतनता की निद्रा से जाग

हे मानव !आत्म-मंथन कर महामंथन प्रारम्भ हो चुका है। सम्पूर्ण सृष्टि के महासागर में भयंकर उथल-पुथल मची है। मानव के रूपान्तरण का समय आ ही पहुँचा है। सच और झूठ की खोज में सदियों से भटक-भटक कर अब मानव इतना तो समझ ही गया है कि सत्य को उसे अपना अंतर्मन मथ-मथ कर ही खोजना है। सत्य की वास्तविकता तक पहुँचना है। जो प्रभुता का बीज तेरे अंदर सोया हुआ है जिसमें प्रभु होने की संभावना छुपी है उसे ही सत्य प्रेम कर्म व प्रकाश की उर्वरा शक्ति देकर प्रस्फुटित करना है। इसके लिए बहु प्रचारित शब्दों सत्य प्रेम कर्म ज्ञान भक्ति मोक्ष निर्वाण आदि-आदि का सच्चा अर्थ सही संदर्भ में समझना होगा। विशेषकर सत्य प्रेम व कर्म का सही अर्थ समझकर साधना करनी होगी, अपने आप पर सत्यता से कर्म करना होगा। यही है समुद्र मंथन की प्रतीकात्मक कथा का सार तत्व। जब अरणि-सूखी लकड़ियों का घर्षण तीव्र वेग…

सब समस्याओं का मूल

हे मानव !सारी समस्याओं की जड़ है कलुषित, स्वार्थी मानसिकता और अकल्याणकारी अशुभ भाव। जुगाड़ व तकनीक से अपना स्वार्थ साधने की कला में पारंगत होने को ही मानव ने समझदारी व विवेक समझ लिया है। इस सबको सुधारने हेतु सत्यमय कर्मठ और ज्ञानमय विवेकी उदाहरण स्वरूप सही मानव का संग व दिशा निर्देश चाहिए न कि विकृत नेतागीरी, दंभपूर्ण लंबे-लंबे प्रवचन या धन दौलत के नशे में चूर, खरीदारों की भीड़ और बिकने वालों की लंबी-सूची! वैज्ञानिकों ने विज्ञान द्वारा समस्त सुविधाएं दीं पर उनके सदुपयोग की सही मानसिकता नहीं दी। दर्शनशास्त्रियों ने केवल ताॢकक बुद्धि और विकसित कर दी। दायित्व निभाने की कर्मठता नहीं समझाई। साहित्यकारों व लेखकों ने लेखन की समरसता व शब्द विलास की क्रीड़ा ही पाल ली क्रांति जगाने का पुरुषार्थ या दिशा निर्देश की प्रेरणा नहीं। प्रचार माध्यम ने भी व्यापारिकता को, सत्यकर्मों को सामने लाने की अपेक्षा अधिक महत्व दिया। वेदों पुराणों व…

सृष्टि की गणना

हे मानव !ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण व्यवस्था का सम्पूर्णता से संचालन प्रकृति के शाश्वत नियमों द्वारा ही हो रहा है। इन नियमों के विपरीत जाकर अपने कर्मों और भाग्य को दोष देना बन्द कर। सारी सृष्टि के साथ लयमान लयात्मक व गतिमान होने हेतु दिव्य प्रकृति के नियमानुसार चलना ही होगा। यही सच्चा धर्म है। जो दिव्यता और प्रभु की ओर ले जाएगा। प्रभु बना प्रभु से मिलाएगा। सृष्टि की गणना में ही पूर्ण ज्ञान समाया है। उसे ही तो जानना समझना गुनना व जीना है जो पूर्णता की ओर ले जाएगा। तब यह प्रश्न ही मिट जाएगा भगवान क्या है कौन है कहाँ है। सभी संशय व द्वंद्व मिट जाएँगे। मानव अस्तित्व का रहस्य उजागर हो जाएगा। ० शून्य- ब्रह्माण्डाकार सबका स्रोत अनन्य, पूर्णतया कर्ताभाव व अहंकार भाव रहित। 1. एक - एक केवल एक ही सत्य-सत्य। एक ओंकार एक ही परम शक्ति वान ईश्वरीय सत्ता एकात्मकता। 2. दो -…

प्रकृति का संविधान

हे मानव !ऊर्जा का सत्यमय खेल पहचान उसका ज्ञान विज्ञान व प्रभाव जानकर अपने ऊपर काम कर। सत्य पवित्र और शक्तिमान ऊर्जा की उसके आभामंडल की तो तुझे खूब पहचान हो गई है, पर उसके साथ न्याय कैसे करना है यह भी तो जान, इसका सटीक विधान भी तो समझ। ''ऊँ'' ब्रह्माण्डीय नाद से एकत्व का, ''गायत्री'' मंत्र का व ग्रहों नक्षत्रीय ऊर्जाओं व शक्तियों के आह्वान के मंत्रों के स्पन्दनों का वो महती तत्व जान जिनसे पोषित हों प्राण। जहाँ से ऊर्जा लेता है उसके गुणों का चिन्तन मनन व ध्यान भी तो कर। अपनी बुद्धि व प्रवृत्ति के कीटाणु मिलाने का मोह त्याग। परम से प्रवाहित नि:शब्द, नित्य निरन्तर प्रवाह के साथ-साथ बहना ही नियति है तेरी, उसी में छुपी है सद्गति तेरी। मनुर्भव : सही मानव बन सुमनाभव : सही मानसिकता जगा सरस्वन्तम हवामहे : समस्वरित हो एकत्व जगा मानवो मानवम पातु : मानव मानव को पोषित…

मुखरित हो मौन

अपने आप से कुछ बातहे मानव! प्रणाम में बहुत लोग आते हैं सुनते हैं गुनते हैं। कुछ लोग तो सालों से साथ हैं सीखते हैं समझते हैं बार-बार प्रश्न करते ही रहते हैं। बहुत अच्छा है। प्रणाम में उनका विश्वास भी है, आसपास रहते हैं, पूरी ऊर्जा लेते हैं। अपना काम सांसारी भी करते हैं, प्रणाम का भी कार्य करते रहते हैं। खूब ज्ञान-ध्यान लेते हैं बुद्धियों की तुष्टि, बुद्धि विलास में रमते ही रहते हैं। अपने अनुभव से प्रणाम का सच खूब समझते हैं प्रणाम को सही भी मानते हैं। अपने को जानकर अपना रूपान्तरण भी चाहते हैं, बहुत आदर मान भी दिखाते हैं, पर मन बहुत उदास सा हो जाता है कभी-कभी। मन का एक कोना बहुत रीता-रीता सा है मेरा। सबके बहुत से प्रश्न होते हैं-कभी भी ना खत्म होने वाले प्रश्न। जिनके उत्तर बस देते ही रहो। अपने पर काम करके जीकर उत्तर लेने का उद्यम…