भारत भाग्य विधाता कहां हो – भारत भाग्य विधाता कहां न हो

हे सनातन मानव ! तू कहां खो गया है इतनी गिरावट-अधोगति कि मानव त्राहि त्राहि कर रहा है मानवता घुट घुट कर दम तोड़ रही है। क्या ये पढ़े लिखे लोग हैं इनकी शिक्षा दीक्षा कहां की है। भाषणों का स्तर केवल अपनी ही आत्म प्रशंसा और बाकी सबकी भर्तसना पर ही ठकर गया है क्या कोई ऐसा आत्मवान-शक्तिमान मानव बचा ही नहीं भारत में जो उठे और इन महामूर्ख भ्रष्टाचारी नेताओं को ठिकाने लगा दे। जब कांग्रेस पप्पू और मिट्ठू बोलते हैं तो बीजेपी के ही नम्बर बढ़ा देते हैं और जब बीजेपी के पिट्ठू और टट्टू बोलते हैं तो कांग्रेस के नम्बर बढ़ जाते हैं। क्या ताजमहल क्या लालकिला क्या बहाई या क्या अक्षरधाम आदि आदि। ये सभी मध्य इमारतें क्या बिगाड़ रही हैं देश का मानवों का। जो इतना वाद-विवाद इन पर किया जाता है। जब भी देश में द्वेष घृणा हिंसा अराजकता और अभद्रता का विष…

अनुभूत ज्ञान

आज का ध्यान : मूलरूप ज्ञान - वास्तविक ज्ञानReal Original Gyan जो ज्ञान ध्यान में प्राप्त होता है उसी का प्रसार ही मानव को उत्थान व ख्याति के उच्चतम स्तरों तक पहुंचाता है। मानव जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करता है। संसार से सीखा जाना अभ्यास किया गया ज्ञान व्यवसायिक दृष्टिकोण से अच्छा सिद्ध हो सकता है। परंतु मानव के आध्यात्मिक उत्थान के लिए या मानव को उत्कृष्टता प्रदान कर उत्थान की चरम सीमा तक ले जाने में उसकी उपयोगिता कम ही होती है। रामायण रटने से या एकदम राम जैसा व्यवहार करने से कोई श्रीराम नहीं बन सकता ना ही गीता गुनने से कोई श्रीकृष्ण ही बन पाएगा। जो बनेगा केवल अपने बलबूते पर अपने ही सत्य की साधना से बनेगा। बड़ी-बड़ी बाते प्रवचन शास्त्रार्थ धरा का धरा ही रह जाएगा। हां भूतकाल के संदर्भ से ज्ञान प्राप्त कर उस पर चिंतन मनन कर भविष्य का मार्ग चुनने में सहायता…

देवउठावनी एकादशी : भारतीय तिथियों का विज्ञान

हरि ऊँ हरि रविवार : 14-11-2021चारों दिशाओं से धरती पर त्रासदियों से त्रस्त मानव दया व कृपा हेतु कर रहा प्रभु से करुण पुकार… मंगलवार 20-7-2021 देवशयनी एकादशी पर 4 मास के लिए विश्राम पर जाने से पहले श्री विष्णु ने चेताया :- श्री विष्णु उवाच हे मानव ! क्यों कर रहा करुण पुकार दया करो हे ! कृपा निधान तेरी कुबुद्घि का अब होना ही है निदान पांच हजार पांच सौ साल हो गए पढ़ाई थी तुझे पूर्ण ज्ञानमयी गीता जिसे तू अब तक न समझा न जिया रह गया रीता का रीता क्यों न बना तू सत्यमय कर्ममय मानव जो होता दैवीय सम्पदा से परिपूर्ण भुला बैठा अपनी ही मूल प्रकृति सत्कर्मों से जीवन सार्थक करने की रीति अब व्यवस्था मेरे हाथों से निकल गई है पांचों तत्वों के मध्य पहुंच गई है उन्हीं के तांडव से होगा छंटनी का महती कर्म अब तो समझ ले शिवशंकर के…

अपने मूल स्वरूप में परिवर्तित होओ

मानव ने अपने अस्तित्व का एक चक्र, सरल पवित्र शुद्घ आत्मवान और वास्तविक होने से लेकर चालाक पाखंडी धूर्त हेराफेरी और बुद्घि की जोड़ तोड़ से काम निकालने वाला होने तक का, पूर्ण कर लिया है। यह अनुभूत किए बिना कि इसमें उसने मानव जीव की प्राकृतिक उत्थान प्रक्रिया को कितना मलिन कर दिया है। वो मानव जिसे प्रकाश का ज्योतिर्मय पुंज, दिव्यता परिलक्षित करने वाला होना था वो मात्र बुद्घि की चतुराइयों और समायोजनाओं का उत्पाद बनकर अज्ञान के अंधकारमय कूप में गिरा हुआ यह सत्य भी समझ नहीं पा रहा है कि किस सीमा तक उसका पतन हो गया है। इस कारण अब प्रकृति ने अपने हाथों में नियंत्रण की रास थाम ली है। इसलिए या तो अपनी बनाई हुई अनभिज्ञता की खाइयों में विनष्ट हो जाओ या स्वयं पर कर्म कर शक्ति पाकर इनसे बाहर कूद आओ। मानव इतना उलझ गया है नीरस सपाट सीधी क्षितिजीय रेखा…

सत्य प्रेम व कर्म द्वारा आध्यात्मिक स्वास्थ्य

कलियुग में पार लगाने के सर्वोत्कृष्ट साधन सत्य प्रेम व कर्म है और सर्वोत्तम साधना है ज्ञान भक्ति और कर्म की। कर्म दोनों में है एक में आन्तरिक धर्म और एक में बाह्य कर्त्तव्य कर्म। सत्य निर्भय बनाता है प्रेम निर्मल करता है और कर्म पुरुषार्थ का मार्ग प्रशस्त करता है। सत्य प्रेम व कर्म की पूर्णता से वो ज्ञान जागृत होता है जो समस्त अज्ञान रूपी अंधकार को काट कर उस प्रकाश से प्रकाशित कर देता है जिसमें सच्चिदानन्द स्वरूप का दर्शन हो जाता है। सत्य प्रेम व कर्म के इस अलौकिक चमत्कार से आत्मसाक्षात्कार तभी संभव है जब कि शरीर मन व आत्मा में लयात्मकता व एकात्मकता हो। जब तक स्वयं से एकात्म न होगा तब तक बाहर भी एकात्म वाला भाव प्रसारित नहीं हो पाएगा। सत्य की सबसे बड़ी साधना है मनसा वाचा कर्मणा एक होना जो सोचो वही बोलो वही करो। सत्यनिष्ट मानव आत्मा के सभी…

हे मानव! तमस की निद्रा से जाग!

इतने सारे बुद्घिमान मानव होते हुए भी विश्व विवेकहीन महामूर्खों की बस्ती बन कर रह गया है। एक ओर महामारी कोविड-19 कोरोना से लड़ने हेतु अंधाधुंध व्यय कर रहा है। सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त कर आधी अधूरी व्यवस्थाएं कर रहा है। उनको बचाने हेतु जिनका कि शायद मानव समाज देश और विश्व हित में कोई भी योगदान न हो। दूसरी ओर अपरिमित धन व्यय कर रहा है युद्घ के लिए आयुधों पर उनको मारने के लिए जो हृष्ट पुष्ट हैं नौजवान हैं विश्व का भविष्य हैं। ऊपर से पर्यावरण का सत्यानाश। वाह रे मानव! बलिहारी तेरी दोगली नीति की। मानव का इतना पतन परम बोधि व प्रकृति को कभी भी मान्य ना होगा प्रकृति अब अपने हिसाब से छंटनी करके ही रहेगी। प्रकृति के इस प्रकोप कोरोना को कम करने की प्रार्थना करना तथा सावधानी रखने का प्रयत्न करना तो स्वाभाविक व उचित ही है पर इसके साथ ही इस साधना…

ऊर्जा के खेल का सत्य ज्ञान

हे मानव ! तू बहुत ही चतुर हो गया है।ऊर्जा कैसे ली जाए खूब जान गया है पर उसका समुचित व्यय और उसका हिसाब-किताब रखना एकदम भूल ही गया है। धन-दौलत केहिसाब में खूब पक्का होता जा रहा है वो दौलत जो शान्ति व सन्तुष्टि कभी नहीं खरीद सकती। संसार से बुद्धि से कमाया धन बुद्धि के अनुसार व्यय किया जा सकता है। पर प्रकृति से स्वत: प्राप्त ऊर्जा या जो प्रेम सहयोग व सहायता प्रभु कृपा स्वरूप अन्य मानवों से प्राप्त हो जाती है उसका प्रयोग बुद्धि के स्वार्थी खेलों या अपनी कुप्रवृत्तियों के हिसाब से व्यय करना ही दुखों का कारण बनता है। किसी ने प्रेम दिया ज्ञान दिया या सही मार्ग सुझाया तो उसकी ऊर्जा लेकर अपनी ही मन बुद्धि के रास्ते पर चलने से उस पवित्र प्रेममयी ऊर्जा का अपमान होता है। जो कि प्रकृति को कभी भी मान्य नहीं होता क्योंकि प्रकृति सदा अपने अनेकों…

मानव मंगल की ओर मानवता जंगल की ओर

हे मानव ! कलियुग में तूने अपनी बुद्धि का इतना विकास कर लिया है कि अपनी सब प्रकार की सुख-सुविधाओं के लिए अनेकों उपकरणों का आविष्कार किया और उन्हें अपनी इच्छानुसार प्रयोग कर अपनी ही अहम्तुष्टि कर रहा है। वैज्ञानिक और आर्थिक विकास तो ऊर्ध्वगति को प्राप्त हुए पर मानव मूल्य अधोगति को। मानव प्रकृति पर विजय पाने के सपने देख रहा है मंगल और चाँद पर भी नगर बसाने की संभावनाएँ खोज रहा है। पर अपनी ही धरती पर बसे बसाए नगर उजाड़ने में तुझे आनन्द आ रहा है। दूसरों के सिर पर पैर रख कर आगे बढ़ने को प्रगति मान रहा है। आज का युवा उदाहरणस्वरूप शोभायुक्त गरिमापूर्ण उत्कृष्टï व अनुकरणीय नेताओं के अभाव में भटक रहा है। युवाओं के अंदर कुछ कर गुज़रने का जो उबाल होता है उसे कौन दिशा दे पा रहा है आज के स्वार्थपूर्ण वातावरण में। चारों ओर केवल अपने लिए ही बटोरने…

सत्य निर्भय है : विजयी होगा ही- उजागर होगा ही

मेरा पूर्ण अस्तित्व मानव के उत्तरोत्तर विकास और भारत के भविष्य को सुदृढ़ करने हेतु कर्मरत है। भारत के गौरव के पुर्नस्थापन के लिए सही पृष्ठभूमि तैयार करने की सतत् साधना का ही परिणाम है प्रणाम अभियान। मेरा सब कुछ लिखना, स्वाध्याय, ध्यान, प्रणाम योग कक्षाएँ लेना, लोगों से सम्पर्क करना, हीलिंग-वेदना हरण स्पर्श देना व सिखाना, परामर्श करना, भारतीय सनातन सत्यधर्मिता से सब को अवगत करना। सभी प्रकार के माध्यमों से भारतीय व अन्य सभी मानवों को जागृत करने का निरंतर उद्यम करना। मानव की असीमित दिव्य शक्तियों को पूर्णतया प्रस्फुटित करना- श्रीकृष्ण के गीतोपदेश के आधार पर। इसी कर्मयोग की धारा को प्रणाम रूप में निरंतर गतिमान रखना ही मेरा धर्म-कर्म है। यही आने वाले कल की सुप्रभात की तैयारी है। पूरा है विश्वास- आयेगा ही वह स्वर्णिम समय, वो प्रकाशित पल जो स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद के सपनों को साकार करेगा। भारत के सभी उन्नत मानवों,…

जागो भारत जागो : प्रणाम का आह्वान

प्रणाम अभियान विगत कई वर्षों से इसी उद्देश्य के लिए कर्मरत है और निरंतर आह्वान कर रहा है कि कलियुग में केवल जागरूकता ध्यान व कर्म, आंतरिक व बाह्य दोनों ही, पार लगाएंगे। जागरूक होना है व चैतन्य रहना है उन सभी घटनाओं और विधाओं के प्रति जो प्रकृति विश्व देश व मानव के स्तर पर घटित हो रही हैं। सब कुछ परम बोधि-सुप्रीम इंटेलिजेन्स की सुनियोजित और सुनिश्चित व्यवस्था व अटूट कड़ी के परिणाम स्वरूप ही मूर्तरूप लेता है। तो यह प्रश्न करना कि ऐसा क्यों हुआ? या हो रहा है… सर्वथा व्यर्थ ही है। कलियुग में सत्य को केवल अपने सत्य पर पूरी निष्ठा व कर्मठता से टिके रहना होगा। जहां कहीं भी सत्ययोग व कर्मयोग का महायज्ञ चल रहा है वहां पूर्ण सहयोग की आहुति देनी ही होगी अन्यथा तटस्थता भी भयावह कष्ट का कारण बनेगी। सबसे सकारात्मक तथ्य यह है कि सत्य को झूठ से लड़ने…