गिर के सम्भलने का आनन्द
हे मानव! तू असफलता के भय से त्रस्त होकर पहले से ही पक्का इन्तजाम कर सफलता ही चाहता है। किताबी तकनीकी ज्ञान, प्रचुर मात्रा में धन व अन्य प्रकार के साधनों की इच्छा रखता है। शारीरिक स्वास्थ्य व बनावटी और दिखावटी, बढ़ा हुआ ऊँचा जीवन स्तर कायम रखने के लिए। वो जीवन स्तर जिसकी कोई सीमा रेखा है ही नहीं नित नया मापदण्ड। इसी उधेड़बुन के तनाव व समय के साथ भाग न पाने के भय में जीवन का स्वरूप व आनन्द खो ही गया है। विज्ञान पर अत्यधिक निर्भरता व आरामतलबी के उपकरणों ने मानव की, संघर्ष से जूझने की सोच को पंगु बना दिया है। बालक जब खड़ा होकर चलने की प्रक्रिया में बार-बार गिरता है इससे वो सीखता है कैसे हाथों पैरों व घुटनों का तालमेल बिठा कर खड़ा होना है अपने आप सम्भल कर खड़े होने पर उसे आनन्द की अनुभूति होती है। सोच व कर्मेंद्रियों…
