उत्थान हेतु पुरानी मान्यताएँ बदलो

पुरानी मान्यताएँ मापदंड बदलने होंगे उत्थान के लिए। भय को बदलो प्रेम में नाटकीयता को बदलो स्वयं सिद्धता में तथ्य सत्य में नियंत्रण को विश्वास में स्वयं की आलोचना को अपनी शक्ति में मानसिक शक्ति विज्ञान, ज्ञान को विद्वता में स्वतंत्रता आत्मनिर्भरता को एक-दूसरे की पूरकता में बदले को माफी में, आत्म-प्रताड़ना प्यार के ज्ञान, विद्वता में क्रोध को शक्ति में प्रेम की कमी को दिव्य ज्योतिर्मय प्रेम में घरेलू झगड़ों समस्याओं को ईमानदारी सत्य व्यवहार में अपनी बात मनवानी हो तो अपने में विश्वास रखो। सत्य जीओ ऊँ वाणी में सत्यता का बल शक्ति तभी आती है जब स्वयं सत्यरूप हो जाओ। नकारात्मकता को क्रियाशीलता में असहमति को कृतित्व में छवि को शक्ति में आंतरिक मूल्यांकन में जो तुम अपने लिए चाहते हो वही दूसरों के लिए चाहो और करो जो दूसरे तुमको समझते हैं वो उनकी अपनी आंतरिक झलक है दूसरे तुम्हें क्या समझते हैं इसी से उनका…

सबसे छोटा वेद

तुम कौन?… सत्य कैसे मानूं?… अनुभव करो अनुभव कराओ… अनुभव करने के पुरुषार्थ की क्षमता प्रकृति ने सबको दी है। जानो अपने सत्य से, पर जान लेने पर केवल सत्य के लिए और सत्यमय होकर ही जीना होता है। प्रणाम मीना ऊँ

बस दो दो दो…

क्षमादान जिसमें कुछ भीअभयदान खर्च नहीं होताप्रेमदान वही देनाज्ञानदान सबसे मुश्किल क्योंअहम् हाथ बढ़ाने ही नहीं देता ऐसे दान के लिए अहम् आत्मा की स्वतंत्रता में सबसे बड़ा बाधक है दो भई दो वही तो दोगे जो ऊपर से मिला है क्या जाएगा तुम्हारा सब ग्रंथियाँ स्वत: ही खुल जाएँगी खुल जाएँगे द्वार मन मस्तिष्क के यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

शरीर तंत्र ज्ञान

जितना शुद्ध होगा शरीर अंदर बाहर से उतनी संवेदनशीलता बढ़ती है। सबसे पहला पाठ यही है। पहले तन शुद्ध कर मन शुद्ध कर मस्तिष्क शुद्ध कर तभी प्रभु कृपा से ज्ञान आएगा इस मानव तनधारी शरीर में। अशुद्ध मन वाला अशुद्ध शरीर, विषाक्त शरीर कैसे करेगा अमृत पान पी प्रेमामृत बन बालक प्रभु का हो मनसा वाचा कर्मणा सत्य प्रणाम मीना ऊँ

विपरीत शक्तियाँ

ब्रह्माण्ड विपरीत शक्तियों का पुंज है तभी तो अविनाशी है नित्य है नित्य गतिमान है प्रगतिशील है। शैतान - भगवान राक्षस - देवता दुष्ट - सज्जन नर-नारी, मूर्ख-विद्वान निरंतर संघर्ष दौड़ होड़ लगी थी, लगी है और लगी रहेगी। पूरा ब्रह्माण्ड, फिर ग्रह फिर धरती फिर देश शहर समाज घर फिर तू बिंदु सा, उस घर का एक प्राणी मात्र फिर तेरे अंदर भी वही सब विपरीत शैतान अपने अंदर के शैतानों को पहचान, मार तब तू भगवान होगा। बाहर के शैतानों का ब्रह्मा स्वयं उत्तरदायी है, तू क्यों चिंता करता है? कहाँ तक पहचानेगा बाहर के राक्षसों को, कभी न पहचान पाएगा बाहर के शैतानों को। क्यों जीवन व्यर्थ करता है उनको समझने में, शैतानों को पहचानने में जीवन लगा दिया तो जो देवता आएँगे जीवन में उन्हें पहचान ही न पाएगा तू और वंचित रह जाएगा उन स्वर्णिम अवसरों से जो स्वयं ही स्वत: ही मनसा-वाचा-कर्मणा सत्यमार्गी मानव…

गुरु

सही गुरु या जो आपका गुरु होगा सही मायनों में वो कभी आपका साथ नहींं छोड़ेगा क्योंकि यह युग-युगांतर का साथ है। यदि साथ छूट जाए तो वह आपका गुरु नहीं। पर इसका यह अर्थ नहीं की वह गुरू ही नहीं। कुछ गुरु समय-समय पर अपना-अपना काम कर आपसे बिछुड़ते जाते हैं पर उनका अपना योगदान होता है। उनका अपना महत्व होता है, क्योंकि वो उस सीढ़ी का एक पाया बन जाते हैं जो उत्थान की ओर जाती है। उनका धन्यवाद जैसे यदि पहली दूसरी कक्षाओं के गुरु न होते तो बच्चा ऊपरी कक्षाओं में कैसे आता। वैसे तो जीवन में जो आता है गुरु होता है कुछ न कुछ सिखा ही जाता है। सबका अपना-अपना गुरु अवश्य होता है। ऐसे ही सबका अपना-अपना शिष्य भी होता है जो अपने-अपने गुरु का कार्य आगे बढ़ाता है पर होता है यह सम्बन्ध अविनाशी। यह आवश्यक नहींं कि गुरु साकार ही हो।…

मैं कौन हूँ, कुछ भी नहीं

सारी सृष्टि प्रभु का आँगन, खेलूँ वही जो वो खिलवाए जब मैं था तो हरि नहीं अब तो हरि ही हरि हैं मैं कहाँ वो ही वो है सर्वत्र मेरी इच्छा उसकी इच्छा उसकी इच्छा मेरी इच्छा प्रभु कृपा महान एक ऐसा पोला बाँस बना दिया सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से सम्बन्ध स्थापन कराए बाँटूं जो वो बँटवाए जहाँ बँटवाए, जिसमें सभी देवी-देवता अवतार आवागमन आना-जाना रखते हैं समय की आवश्यकतानुसार या लेने वाला जो सामने माध्यम है उसी के अनुसार ज्ञान देवें प्रभु अब तो मेरा कुछ भी नहीं जो बुलवाता है बोल देती हूँ जो दिखाता है देखती हूँ सामने वाले को जो चाहिए ये वो ही जानता है मेरे द्वारा वो ही भेजता है। मेरा पूरा का पूरा शरीर उसी परम की सेवा में लगा लिया प्रभु ने की कृृपा महान शरीर मेरा रिमोट नियंत्रण प्रभु का। सामने वाले की ट्यूनिंग, समस्वरित है तो पकड़ ही लेगा सही तरंगें,…

अहम्

छोटे-छोटे अहम् पाल अपनी छवि से स्वयं संतप्त होता है मानव। छोटे-छोटे झूठ अहम् के ही रूप हैं। अपनी प्रत्येक कला को ज्ञान को इस सम्पूर्णता तक ले आना कि अहम् अहम्ब्रह्म हो जाए और फिर अहम् ब्रह्मास्मि वाली स्थिति तक पहुँचकर भी उस अहम् ब्रह्मास्मि में भी रमना ना हो। उसका भी अहम् त्यागकर प्रभुमय हो यह कामना करना कि सब जन कष्टरहित हों सुखी हों...ऊँ यही परम धर्म हैपरमानन्द है अपने सबसे बड़े शत्रु अहम् का नाश करने की शक्ति जगाने का जतन कर मानव!इस अहम् में ''मैं'' कहीं नहीं उसमें उसका ''मैं'' का कोई स्थान नहीं इस परम अहम् में सब वो ही वो है वो ही है सर्वशक्तिमान जो तू हैयही है अहम् का सत्यरूप प्रणाम मीना ऊँ

प्रभु दर्शन

जब एक प्रेम पूरित श्रद्धालु का हृदय चीत्कार कर उठता है घोर अन्याय के विरुद्ध। पर नितांत असहाय होने के कारण सिर्फ अश्रु ही बहा सकता है। यही अविरल अश्रुधारा प्रभु दर्शन करा देती है। अविरल अश्रुधारा गंगाधार के समान सब पाप धो देती है और पवित्र हुआ निर्मल मन प्रभु को पा लेता है। दर्शन बड़ा व्यापक और गूढ़ अर्थवादी शब्द है। ज्ञान त्याग और संयम की सत्यता स्थापित करने को अंतर्मन में प्रभु का प्रकाश फैल जाता है, धर्म की स्थापना होती है। संतों को जब कोई रास्ता सुझाई नहीं देता, कोई बाहरी सहायता की आस नहीं रहती, सब रास्ते बंद हो जाते हैं, घोर अंधकार ही अंधकार छा जाता है तो जागरण होता है। सही मार्ग पर चलने वाले को जब बाहरी तत्वों से असुरक्षा उत्पन्न हो जाती है तो सही, सत्य धर्म और नियम पर चलने वाले की आस्था को डगमगाने से बचाने के लिए स्वयं…

छवि

ये छवि क्या है ! अहम् से उत्पन्न व्यक्तित्व का प्रदर्शन। लोगों को औरों के सामने अपनी छवि की इतनी चिंता क्यों रहती है! अपने रिश्तेदारों के सामने अपने दोस्तों के सामने अपने कार्यक्षेत्र में सम्पर्क में आए लोगों के सामने। कोई क्या कहेगा छवि न खराब हो जाए, यही चिंता रहती है। जितना ही प्रयत्न करता है जितनी ही चिंता करता है मूर्ख मानव, उतनी ही छवि की चिंदी चिंदी उड़ जाती है। जब ज़रा सी बनावट से कसी जिंदगी में ढील आ जाती है तो… तो… तो क्या बचता है! कुंठाग्रस्त जीवन तनावपूर्ण जीवन रोगी जीवन-विषाद असंतुष्टि तनाव और जीवन को अजीर्ण करने वाली व्याधियाँ। यही सब कुछ छवि को बचाते-बचाते, दूसरों की कसौटी पर खरे उतरने की मूर्खतापूर्ण चेष्टाओं की भूलभुलैया में वास्तविक आनन्द से दूर बहुत दूर हो जाता है बनावट की जि़दगी उधार की जि़दगी दूसरों से मनवाई हुई जि़दगी जीते-जीते मूर्ख मानव ! अरे…